समय की रेस ट्रैक पर
निरन्तर भाग रहे हैं लोग,
खुद से, एक दूसरे से
और न आये बसंत से भी।

दूर कर दिए सवाल सारे
कभी नज़र फेर कर या
लाकर ज़रूरी कोई बात
जिनका रिश्ते रूहानियत से
ताल मेल कत्तई न हो।

हेरी कहाँ पलक चेहरे पर
ठहरे तो ज़माना हुआ
एक घर में रहते हैं निकले
ज़िन्दगी से हमको ज़माना हुआ।

सुकूंन जाने किसे कहते होंगे
कंक्रीट के जंगल में ,
तितलियों के पंख
काले उजले रहते होंगे।

बजा नहीं सितार
फरवरी आयी गयी मिली नहीं
बोगनविलिया के फूल
बिल्डिंगों के गेट पर
उगे लुढ़के गिर गए
पीली स्कूली गाड़ियों ने अबकी
कुछ तो देखा नहीं।

बसन्त तुम्हारे पदार्पण का
संज्ञान बचपन ने भी लिया नहीं

Pragya Mishra

13 फरवरी 2021
4:24 am