हम एक ही समय में कुरूप और सुंदर दोनों होते हैं। हम जिस तरह के लोगों से मिलते हैं और जिन स्थानों पर गमन करते हैं, उनके साथ हमारे सम्मिश्रण के आधार पर हमारे व्यक्तित्व में बदलाव आता है। सच्ची प्रकृति जैसा कुछ नहीं है क्योंकि हर प्रकृति के व्यक्ति से कोई न कोई प्यार करता है। व्यवहार सापेक्षिक है।

हम बेवजह आरोप लगाते हैं, अनावश्यक रूप से सलाह देते हैं, उन परिस्थितयों में भी लोगों को कुरेदते रहते हैं जिनमें उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाना चाहिए। कोई प्रिय किसी के जीवन में प्रासंगिकता क्यों खो देता है, जो व्यक्ति एक बार बहुत महत्वपूर्ण था किसी समय ब्रह्मांड का केंद्र था , वह अचानक गौण क्यों हो जाता है।

क्या वे कोई अनुचित मांग कर रहे थे, या झूठ बोल रहे थे, या बहुत सारे सवाल कर रहे थे, जिनकी वास्तविकता में कोई जड़ नहीं थी, या फिर बहुत कम समय दे रहे थे या तो वे अपने मन से आपके प्रति धारणा बना रहे थे, तथ्यों को कल्पना से उजागर कर रहे थे या दूरी से जन्में पास आये रिश्तों में सच्चाई को समझाने का कोई निर्थक प्रयास ही हो रहा था।

जो कुछ भी मूल कारण विश्लेषण रहा हो , ऐसे क्षण सबके जीवन मे आते हैं जिनमें हम संतुलन खो देते हैं। हमारे भीतर का सामाजिक प्राणी खो जाता है और अनियंत्रित जानवर हावी हो जाता है, जानवर केवल लड़ते और एकदूसरे को पंजे मारते रहते हैं, वे बिल्कुल भी समाधान की तलाश नहीं करते, क्योंकि मन के इस क्रूर रूप का वास किसी सीलन भरी गंदी कोठरी का एक भूत है जो चीथड़ों से भरा हुआ है। भीतर का पशु दुविधाओं को और बढ़ाता है, घृणा को ही अपना भोजन बना लेता है जिसके असर में मौखिक दुर्व्यवहार पाचक की तरह लगने लगता है । पता ही नही चलता है कि रुकना कहाँ है। इन कुंठा से भरे सड़े गले शब्दों को विचारों को कूड़ेदान में फेंक दिया जाए। यह अवस्था एक माइंड गेम है।

विराम

प्रज्ञा मिश्रा
02032021