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तमाम तरकीबें आज़मा लीजिये
आँखें पढ़ने का दावा कीजिये
तिलिस्मी तहखाना है औरत का मन
जानने के लिए अनपढ़ ही मिला कीजिये

नमस्कार श्रोताओं , शतदल पर आप सबका स्वागत है। आज जो विषय हमने चुना है वो अपने आप में रोचक है इस पर  कला प्रेमी रचनातमक  कृतियाँ बनाते हैं,  भरपूर चित्रकला संसार है ,  नाट्य लिखे गए हैं , जो गीतों और कविता का मुखर स्वर भी है, मादक भी है, पवित्र भी, कोमल भी है, शक्ति भी लेकिन कमज़ोर हरगिज़ नहीं वह है –  #स्त्री

गुलज़ार साहब की एक बेहतरीन लिखी नज़्म है
“कितनी गिरहें खोली मैंने कितनी गिरहें बाकी हैं”

उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार प्रस्तुत हैं

अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी…

इसमें कोई शक नहीं की औरत धरती पर कोमलता , सौम्यता, सौंदर्य और शीतलता का प्रतीक रही है और आज भी है।
लेकिन इन सब कल्पनाओं से परे एक औरत को केवल औरत होने के नाम पर अपनी इच्छाएं , आकांक्षाओं की आहुति देनी होती  है समाज के नाम पर, परिवार के नाम पर , कुछ पौराणिक व्यवस्था के नाम पर।

बेटियां जब एक बार ब्याह दी जाती हैं तो जिस जगह को बचपन से अपना घर समझा उस जगह से पराई बन जाती हैं और कई दफा नए घर में बीसियों साल निकालने के बाद भी “हमारे में ऐसा नहीं होता ” का व्यंग्य सहती हैं। इस विषय पर हास्य कविताएँ बनती रही है लेकिन एक महिला का मानसिक उद्वेलन सोचने वाला विषय है।

उपलब्ध लेखों में मौजूद आंकड़े बताते हैं कि काम काजी महिलाएं कई दफा घर पर रह रही स्त्रियों से शरीरीरिक रूप से अधिक स्वस्थ होती हैं और उन्हें उनके हिस्से का आराम और अपने बारे में सोचने का समय भी अधिक मिलता है। पर काम काजी महिला हो जाना आसान बात नहीं कई विद्रूपताएं झेलनी पड़ती है।

घर रह रहीं स्त्रियाँ  नितांत बोझिल बिल्कुल नहीं वे भी  मित्रों के साथ आउटिंग, जिमिंग, अन्य होबिज़ को अपना कर अपने आप को तरो ताज़ा रख सकती हैं और रखती हैं।

एक स्त्री के लिए  स्त्री मित्र परम आवश्यक है क्योंकि हार्मोनल उत्तर चढ़ाव से होने वाली दिमागी खिटपिट केवल भुक्त भोगी ही समझ सकते हैं। होम साइंस ऐसा विषय है जिसमें इन सब बातों की जानकारी दी जाती है। ज़रूरी है कि स्कूल लेवल पर लड़कों और लड़कियों को एक साथ स्त्री हार्मोनल परिवतर्न से जुड़ी बातें बताई जायें। जिससे जीवन में आगे रिश्तों में खटास की वजहें कम हों और पुरूष स्त्रियों को अधिक समझें।

जब देखो तब चिड़चिड़ाती है।
पता नहीं बात नहीं कर रही
सोचती बहुत है
कहाँ की बात लेकर आ जाती है
किट किट होती है
तो देखिए की वे स्वस्थ तो हैं

प्रेग्नेंसी के बाद स्त्रियों में पोस्ट पार्टम डिप्रेशन की समस्या आम है वे छोटी बात या बिना बात रो दें तो नाराज़ नही होना चाहिए जीवन साथी को समझदारी से काम लेना चाहिए।

एक बहुत प्रेक्टिकल बात है कि जिस स्त्री से आप प्रेम करते हैं आपकी पत्नी हैं, प्रेमिका हैं या आप लिव इन में रह रहे हैं एक दूसरे को समय बे समय गले ज़रूर लगाएं , और शारीरिक नज़दीकी को बस sexual रिलेशन्स तक सीमित न रखें। यूँ ही  प्रशंसा करना , बिना बात के हाथ मे हाथ लेकर बैठना , कभी हल्के से बालों पर हाथ फेर कर घर बाहर की बात कर लेना और ज़्यादा से ज़्यादा समय साथ बिताना औरत के भावनात्मक वॉइड को भरता है।

आज कल लोग केवल आर्थिक सुरक्षा के लिए शादियाँ नहीं करते। शादी आज जीवन साथी की तलाश है जिसके कंधे पर औरत सर कर अपने जीवन के निर्णायक फैसलों का मूल्यांकन कर सके।

बच्चा होने के बाद कम से कम सात आठ माह तक उसे मायके यह बोलकर मत भेजिए की रात रात भर् तुम्हारी मम्मी देखेंगी। स्त्री पुरूष साथ रहें , समस्या में साथ हल निकालें , इससे बढ़ता है प्रेम । औरत अपने डिप्रेशन से लड़े , बच्चे को फीड कराये, देखभाल करे, और बदले में साथी बस कार्यालय में स्वीट्स at my desk डाल कर आराम की ज़िन्दगी बसर करते हुये बाद में अन्य मित्रों को पत्नी की शिकायत करते फिरें ऐसा कैसे चलेगा।

माताओं को चाहिए की वे अपने बेटों को पीरियड्स और गर्भावस्था की समस्या की बातों पर खुल कर चर्चा करें। उनके मतलब की बात नहीं कर रहस्य न रहने दें।
सम्मान का , बराबरी का पहला पाठ लड़के और लड़की  माँ-पिता से ही सबसे पहले सीखते हैं।

ज़िम्मेदारियों में घर ,बच्चे ,किचन के काम,  नौकरी, किराना, सब्ज़ी , घर की सफाई, हाउस मेड मैनेजमेंट, नाते , रिश्तेदार , त्योहार, मासिक धर्म, गर्भावस्था, शारीरिक परिवर्तन, अपनी चिड़चिड़ाहट , कैशियम आयरन की कमी के बीच सब संभालती औरतें नींव होती हैं घरों की ।

इस विषय से प्रभावित प्रस्तुत है मेरी एक कविता !

तुम इतनी ऊर्जा कहाँ से लाती हो
तुम्हारे अंदर ऐसा क्या है जो रंग हो जाता है
मैं शहर हो जाता हूँ तुम्हारी याद का
तुम क्या कर देती हो इन मामूली से दिखने वाले
मकान की दीवारों पर जो दिलों में घर कर जाते हैं,
अन्यमनस्क तुम्हारी चूड़ियाँ टिम टिम बजती हुई मुझे
बताती रहती हैं तुम आस पास हो और मैं अपने
मोबाइल लैपटॉप या किताबों में खोया हुआ
तुम्हारे होने को बीच बीच में देखता हूँ कि
कभी अलमारी के सामने हो
तो कभी बच्चों के पीछे
कभी पापा को दवाई दे रही हो
तो कभी तुम्हारे ऑफिस से कॉल आया
तो उसे भी निपटा लिया।
तुम बिसात हो मुझे अपनी चाल बना लो।
हमेशा जीतना चाहता हूँ।

तुम्हारी जीत भरी मुस्कराहट
देख कर ऐसा लगता है
मुश्किलें अपनी सैंडल से मसल कर
कभी धीरे तो कभी तेज़ चकलर
कितनी गिरहें तोड़ती आयी हो।
हाथ कमर पर
होठों पे हँसी
जैसे झंझावातों का
शो बिज़
करती आई हो।
“आई एम हियर टू स्टे!”
आईने को बोला कितनी बार ।
आँखों की कोर
को ज़िद बना कर
हँस के पोछा कई बार।
बोलती कुछ नहीं
आँखे ज़िद्दी बहुत हैं तुम्हारी
सुनाने कुछ नहीं देता
स्वाभिमान भी तुम्हारा।
कितनी सादा हो
कितनी खूबसूरत
तुम्हारे माथे पर
जो बल पड़ा है
सोचता सा मन
तुम्हारा सिंचित प्रेम
हैं सब ।
अपने अनवरत होने को
अपनी निरन्तरता
में सोचती नहीं होगी तुम
बस करती रहती हो
ज़रूरी सारे काम
खुद को भूल के हरदम।

परंपरागत भारतीय परिवार की प्रगतिशील महिलाएँ अद्भुत होती हैं, वे हँसते हँसते समय से लोहा लेती है। एक संकुचित समाज में, समय से बहुत आगे की सोच रखने वाली महिलाएं जब जब जन्म लेती हैं तब तब समाज करवट लेता है।

खुद को बहुत साधारण लगता है, हम सोचते है , हमें ज़िद थी इसलिए हमने पढ़ाई की या हमने लीक छोड़ी। पर यही लीक छोड़ कर चलने वाले नए मार्ग का निर्माण करते हैं। कितनी सशस्क्त, कितनी समझदार स्त्रियाँ।

यदि हमारे घर आँगन में ही ऐसी स्त्रियों का सान्निध्य हमे मिला हो जो किताब प्रेमी हैं , प्रतिदिन पढ़ती हैं तो हँसी हँसी में कही जाने वाली इनकी ज्ञान सूत्री बातें कान में आजीवन आती हैं।

मेरी दादी माँ हमेशा कादम्बिनी पढ़ती थीं।  परदादी हमेशा रामायण , गीता का नियमित पाठ करती रहती थी। मेरी माँ हिंदी संस्कृत होम साइंस की शिक्षिका थीं। दादी माँ की मौसेरी बहन ने सत्तर के दशक में ज़िद कर के पढ़ाई की , संस्कृत की स्कॉलर रहीं। घर के बच्चों पर ज्ञान का प्रभाव पड़ता रहा, पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ पड़ रहा है।

बचपन की छवि ही अवचेतन है। मैं भाग्य शाली हूँ मेरे अवचेतन में औरत का स्वरूप भव्य है, आत्म निर्भर, निडर, कंधे तने हुए, अपने लिए आवाज़ बुलंद करने वाली औरतों का रहा हैं। वे अन्जाने ही घर के बच्चों की प्रथम शिक्षकाएँ बन जाती हैं, बेहद अनुकरणीय।

पढ़ो खूब सारी किताबें,
कला और इतिहास की
देश और समाज की ,
समझो सारी कड़ियाँ
जिनसे होते हुए
तुम्हारा आज बना है
एक स्त्री के लिए
क्या और क्यों
निर्धारित परिवेश बना है।

और बुलन्द करो आवाज़
बोलो , लड़ो ,बढ़ो
न  सहो बेबुनियाद
वे रीति रिवाज़
जो तुम्हारी पह्चान
फलाने की बहू
से इतर निकलने नहीं देते।

प्रश्न करो स्त्रियों से
पुरुषों से रूढ़ियों से
तोड़ तो मनु के बनाये
वे नियम और समाज
का घुटन भरा ढाँचा
जो विवाहोपरांत
तुम्हारे अंत: का संगीत
जीवित रहने नहीं देते।

*ये औरत की स्वन्त्रता का
नया स्तर होना चाहिए।*

शूक्रिया दोस्तों तो ज़रूर बतायें कैसा लगी आज की कविताएं क्या कुछ जुड़ता है यहाँ आपकी ज़िंदगी से । शतदल को अपना प्यार दें , लाइक शेयर subscribe ज़रूर करें।
शुभरात्रि!