गत दो दिनों में मैंने समय का भारी सदुपयोग किया है। मैने अणुशक्ति सिंह की “शर्मिष्ठा-कुरु वंश की आदि विद्रोहीणी” ऑडियो बुक सुनी है।

किसी किताब को पढ़ना , पढ़ते हुए थोड़ी देर सीने से लगा लेना, फिर घूमते पंखे और छत को देख पात्रों एवं घटनाओं के बारे में सोचना एक सुख तो है पर मुझे लगा जैसे बोलते शब्दों में लिपटे एहसासों को कहानी की ज़बानी सुनते जाना अधिक आनंद है। स्टोरी टेल पर वाचक हेमा निकम की आवाज़ में पात्र जीवंत होते गये, या फिर कह सकते हैं कि मैं बायस्ड हूँ क्योकि मैं रेडियो स्टेशन में पली हूँ ।

आँखें बंद कर के देवयानी , शर्मिष्ठा, वृषपर्वा, कच , शुक्राचार्य , ययाति, कुटिल देवराज, प्रासाद, पर्ण कुटीर, सरोवर,हस्तिनापुर नगर सब दो दिन में जिया मैने।

सरसराती बहती हवा सी कहानी और संस्कृत निष्ठ हिंदी मुझे 1995-2000 के दौर में ले गए

कहानी का वर्णन मुझे सुखद स्मृतियों से भरता गया, वो दौर जब हम महाभारत देखते थे। शर्मिष्ठा इस तरह अच्छी लगेगी इसका भान मुझे नहीं था।

केंद्रीय विद्यालय दरभंगा की पढ़ी बंद संदूक के जीवन की चिड़याँ थी मैं। हिंदी मेरी सबकुछ थी। संस्कृत निष्ठ हिंदी से बाहर मुझे सचमें दुनिया मालूम नहीं थी और जब हिंदी पढ़ने का होश संभाला तब तक नई वाली हिंदी का दौर सुनने में आ चुका है। आज के दौर में शर्मिष्ठा सुंदर संग्रहणीय पौराणिक कथा उपन्यास है। एक अलग प्रयोग।

शर्मिष्ठा की पूरी कहानी चलती रहती है और समानांतर पाठक क्रमवार वे सभी घटनाएं स्मरण करने लगते हैं जब स्त्रीजीवन के विभिन्न चरणों में लिंगभेद को सामान्य मानते हुए प्रतिष्ठा के नाम पर पक्षपात का शिकार होती रही स्त्री। दलित और योद्धा दोनों ही है वो स्त्री जिसका संघर्ष, देवयानी शर्मिष्ठा, चित्रलेखा की कथाओं में दिखते गए।

किताब में क़ई ऐसे क्षण आते हैं जब स्त्री पाठक स्वयं से प्रश्न करने लगती है कि सचमें “क्या दोष था मेरा” । पात्रों का आलाप उनके अपने परिदृश्य से सही ही लगता है । पाठक, गलत सही के निर्णय में ठीक उसी प्रकार जाने लगता है जैसे जीवन की कोई घटना हो। एक घटना के हमेशा तीन सच होते हैं। एक जो नियति ने रचा और दो जो भुक्त भोगियों द्वारा समझी गयी। किताब बाँध कर रखती है।

किताब में ऐसी कितनी ही पंक्तियाँ हैं जिन्हें मैने रिवाइंड कर के सुना, क्योंकि स्त्री मन की उपमाएं शब्द में पढ़ना अबुझ पलों के उत्तर मिलने जैसा होता है।

मैने किसी जगह कहीं पढ़ा है कि जब सच्चाई को निर्वस्त्र बीच चैराहे में सबके सामने उजागर कर दिया गया तो नगरवासियों ने उससे आँखें फेर ली उसे नकार दिया उसकी तरफ देखा तक नहीं। लेकिन फिर एक कहानीकार ने अपने शिल्प कौशल से सच को कहानी के वस्त्र में डाला, उसमें रहस्योदघाटन के आभूषण बाँधे, “कहानी-श्रृंगार” के रस में सच्चाई दमक उठी, सुनी गई, समझी , गयी, लोगों की चेतना तक को छुआ उसने और कुछ के आँख भी भर आये । इतना भीतर बैठी कहानी की लोगों ने शून्य में देख कर अपना मूल्यांकन भी करना शुरू किया। अणुशक्ति सिंह वो ही कहानीकार है।

कहानी जब तक मेसेज न छोड़े पाठक को भीतर से उसे पढ़ कर संतुष्टि नहीं मिलती। शर्मिष्ठा उपन्यास, पग पग पर स्त्री की अवहेलना और स्त्री द्वारा स्त्री को दिये संतापों का आईना है।

इक्के दुक्के हिम्मती लोगों को छोड़ दीजिए। हम एक समाज की तरह स्त्री लिंग के प्रति नॉर्मल मान लिये गए दुर्व्यवहार और पक्षपात पर प्रश्न करना कब शुरू करेंगे?

मुझे लगता है सबसे पहले स्त्री को ही इसकी शुरुआत शर्मिष्ठा पढ़ते हुए , करनी चाहिये। स्त्री बदलेगी युग बदलेगा।

Pragya Mishra