लेखक – धर्मवीर भारती

मैने “#गुनाहोंकादेवता” storytel app पर सुन कर समाप्त कर ली है। कुमार विश्वास जी ने अच्छा पढ़ा है। लेकिन कहीं कहीं लगता था कि वाचन में भाग रहे हैं , क्योंकि #शर्मिष्ठा और #अक्टूबरजंक्शन इतने इत्मिनान औऱ स्थिरता से पढ़ी गयी थी कि वो वाचन नहीं नाट्य रूपान्तर लग रहा था। बावजूद इसके मन कहता है कि कुमार विश्वास जी ने अच्छा पाठ किया है।

कुछ समय तक मैं सुधा, चंदर, पम्मी, विनती के संवाद और उपन्यास में आयी कालजयी पसंदीदा पंक्तियों को लिखती रही। एक समय के बाद जब यह कहना मुश्किल हो गया कि कौन सा रूपक मुझे अद्भुत लगा और कौन सा साधारण तब मैंने किताब को केवल सुना और नोट्स बनाने छोड़ दिये।

सुधा की दयनीयता, विनती की अकुलाहट, प्रैक्टिकल पम्मी की माया और निर्मम अर्थशास्त्री चन्दर के प्रति आने वाली प्रेमवश झुंझलाहट किताब के समुंदर में गोते लगाते स्वाभाविक तौर पर आती है। प्रेम का औदात्य भाव इस किताब के बारे में की जाने वाली सबसे प्रचिलत चर्चा है। साथ ही स्त्री पुरूष सम्बन्धों का सरलीकरण सहज किया गया है।

1950 के दौर में लिखा उपन्यास यूँ तो दूसरे युग की बात है, लेकिन प्रेम के प्रति व्यक्ति की मूल संवेदनाएं रत्ती भर भी नहीं बदली इसलिये आज भी हर उम्र का व्यक्ति इस उपन्यास से कनेक्ट कर के रो देता है।

लेखक पचास के दशक के हिसाब से जिस उधेड़बुन में थे वो तो हमारे जीवन में अब भी है, नथिंग चेन्ज्ड। हर कोई इतना आज़ाद ख़्याल नहीं हुआ है। उसपर से अब तो भारत में और भी अलग अलग दो भारत हैं, सोच की खाई गहरा गयी है। टिकटोक कलयुग में इतना डूब कर , सोच की गहराइयों में लोग ऊंचा उठते नहीं। गुनाहों का देवता उपन्यास के कैरेक्टर कहीं ज़्यादा ज़हीन और गम्भीर अध्ययन करते हैं आज के एक एवरेज भारतीय के मुकाबले।

2021 में इस उपन्यास के लिए एक जैसे फ़ीडबैक की अपेक्षा अब हम नहीं कर सकते क्योकि हम में से सुधा कम ही बची हैं, जो हैं आई पिटी ऑन देम। गेसू के लिए दुःख हुआ, साथ ही ये भी लगा अब ऐसी प्रतीक्षा कोई नहीं करता। पर सुधा और चन्दर का प्यार , वे दो लोग जिनका एक दूसरे पर नैसर्गिक अधिकार हो ऐसा प्यार शाश्वत सत्य है, ये प्यार जिसके जीवन मे आया वो भाग्यशाली है। सुखांत हो न हो इसको जीना ज़रूरी है। प्लेटोनिक प्यार अलग अलग व्यवहार के साथ आज भी ज़िंदा है और यही किताब का सबसे अच्छा पहलू है। गति ने कल मुझसे कहा प्यार सही गलत नहीं होता डरपोक, कायर या बहादुर होता है। कैलाश पर भी नाराज़ हो उठता है मन लेकिन सुधा के पिता अपनी बेटी को समझ नहीं सके इसपर ज़्यादा तरस आता है।

आज के समय में पम्मी के शब्द की कम उम्र में लड़की निर्णय नहीं ले सकती, खुद को संभाल नहीं सकती, भटक जाती है, उसे बंधन में रखा जाना चाहिये, जीवन चौपट कर लेती है, ये सारा संवाद दिमाग एक सिरे से खारिज कर किताब के पसंदीदा पक्षों पर ही गौर करना ज़रूरी समझता है क्योंकि दुनिया वैसे भी स्त्री दृष्टि से दोबारा लिखी जा रही है और कहीं कुछ दकियानूसी लगा भी तो इतना बड़ा हमारा दिल है कि उसके पीछे नहीं पड़ते हम बल्कि आगे देखते हैं। हमें छाँट कर अपने लिए ज़रूरी बातों जो सहेजना आता है।

दुखांत उपन्यास में कितने ही ऐसे क्षण आये जिनमें रोना आ जाता है। हर तरह का रस जगा कर ऑडियो उपन्यास श्रोता को एक चलचित्र में रखता है। शब्दों का सम्मोहन और उनसे उठा बिंब मानस पटल पर चित्रित होता रहता है। शाम कैसी, रात कैसी, दिन कैसे, नायिका के गाल कैसे, सौंदर्य के सभी उपमान, शारीरिक बनावट के विवरण, स्थानों का विवरण, रसों के अनुभव, कामुकता की सहज अभिव्यक्ति लेखन की अद्भत मिसालें हैं।

Pragya Mishra

“मुर्दा चाँदनी में दोनों छायाएँ मिलती-जुलती हुई चल दीं. गंगा की लहरों में बहता हुआ राख का साँप टूट-फूटकर बिखर चुका था और नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो.”

उपन्यास से मेरी पसंदीदा पँक्तियाँ

💠अगर सभी मंदिर के कँगूडे का फूल बनने की कोशिश करने लगे तो नींव की ईंट और सीढ़ी का पत्थर कौन बनेगा। अर्थशास्त्र वह पत्थर है जिसपर समाज के सारे भवन का बोझ है।

💠उसने देखा उसके जितने भी दोस्त राजनीति में गए वे बहुत प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा पा गए पर आदमीयत खो बैठे।

💠उसकी बेतक्कलुफी में भोलापन यो नहीं है पर सरलता बहुत है।

💠जब भावना और सौंदर्य के उपासक को बुद्धि और वास्तविकता की ठेस लगती है, तब वह सहसा कटुता और व्यंग्य से उबल उठता है।

💠बुद्धि और शरीर बस यही दो आदमी के मूल तत्व हैं। हृदय तो दोनों के अंत:संघर्ष की उलझन का नाम है।

💠मनुष्य का एक स्वभाव होता है। जब वह दूसरे पर दया करता है तो वह चाहता है कि याचक पूरी तरह विनम्र होकर उसे स्वीकार करे। अगर याचक दान लेने में कहीं भी स्वाभिमान दिखाता है तो आदमी अपनी दानवृत्ति और दयाभाव भूलकर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है।

💠अगर आप किसी औरत के हाथ पर हाथ रखते हैं तो स्पर्श की अनुभूति से ही वह जान जाएगी कि आप उससे कोई प्रश्न कर रहे हैं, याचना कर रहे हैं, सांत्वना दे रहे हैं या सांत्वना मांग रहे हैं। क्षमा मांग रहे हैं या क्षमा दे रहे हैं, प्यार का आरंभ कर रहे हैं या समाप्त कर रहे हैं? स्वागत कर रहे हैं या विदा दे रहे हैं? यह पुलक का स्पर्श है या उदासी का चाव और नशे का स्पर्श है या खिन्नता और बेमनी का?