वाट्सप एवं तमाम सोशल मीडिया जगहों पर उन बातों की पुनरावृत्ति होने लगी है जो कोरोना के हवाले से चले थे। मीम जोक कविताएँ आदि आदि। मुझे याद है मैं उन लोगों में हुआ करती थी जो जाती हुई जानें देख इन मीमों पर शर्म किया करती और खूसट बुढ़िया के जैसे फटकार पोस्ट दिया करती। पर जब मामले ने “कोरोना द फर्जीवाड़ा” का रंग लिया था तो मुझ परेशान आम आदमी को उसमे भी सच्चाई नजर आने लगी। अब तो मैटर और डर दोनों आये गए हो गये थे अब तो पकवान हावी था।

आज हमारे घर मफ़िन आयी। मैंने कहा लो खाओ लोकडौन की खुशी में। अब दिल को खुश रखने और घर मे बंद रखने के लिए बढ़ चुके वज़न को फिर बढ़ने दिया जाए तो क्या ही गम कूएँ में एक लोटा पानी से घटती बढ़ती होती है क्या?

अभी एक हफ़्ते पहले तक जब मर्ज़ी से हिलने डुलने की आज़ादी थी हमने सबने कभी कभी बाहर का ये सोच कर न खाया होगा कि अरे अब तो खुल गया जब चाहो खा लो। अब लो, जब बंद हो गया तो तसल्ली रखने के लिये मंगा के खाने की पुनरावृत्ति शुरू होगी अब। रौनक लगनी चाहिये।

एक साल के एक्सपीरिएंस होल्डर हैं हम लोग अब तो। हमारे पास भी टूल किट है । कैसे पोछा, कैसे झाड़ू, कैसे जलेबी, अतरंगी पकवान, कब कब, क्या क्या, कितना कितना, सबकी टूल किट है। फेसबुक मेमरी से सब याद दिला देता है न कसर निकली तो फॉरवर्ड् फौज भी हैं नोस्टाल्जिया पिला रहे हैं सभी क्या तो वो दिन थे। लो ऐसे बातें कर रहे कि कोरोना महाभारत दिखाए के लिये वेक्सीन के रास्ते फिर हमारे आपके बीच आ गया है।

अबके ईश्वर यूट्यूब से सीखने भर की बुद्धि दें और इस बार मुझे केक बनानी आ जाये। क़ई साल पहले पत्थर पकाया था सो तबसे हाथ नहीं लगाया। कल ही बेकिंग पाउडर फेकी और घाव ताज़ा हो गये। इस करोना में कुछ तो गजब करना है। जाने दूरदर्शन के क्या बचा खुचा है जो चलाना हो उसे, हां शांति , गुल गुलशन गुलफ़ाम, मालगुडी डेज़, हिपहिप हुर्रे चलें अबकी।

Pragya Mishra