कुंभ में नो सोशल डिस्टनसिंग नो मास्क में नहा कर #कोरोनाबम लोग भारत के छोटे बड़े शहरों में , गाँव में हर तरफ़ जाएंगे। ऑक्सिजन सिलेंडर और वेंटिलेटर की क्या व्यवस्था है देख ही रहे हैं। बेहतर है दिल कड़ा कर के हर बाहर से आने वाले को आइसोलेट रखा जाए, हुलस के आह्लाद और आओ-भगत करने की कोई ज़रूरत नहीं है। जान रहेगी तो काम आइयेगा।

मूर्खता की चरम पर हैं इस समय चुनावी रैली और कुंभ का समर्थन और बचाव करने वाले।

Why modi cannot be held accountable for every damn disaster happening in country?

70 साल के बाद नेहरू पे लटकने से बाज़ नहीं आते हो सामने से जो आदमी आज ग़लती किये जा रहा है उसको धरने के लिए अगले सत्तर साल बाद बोलेंगे क्या?

देश में मेडिकल व्यवस्था नहीं है, लोग बीमारी से अकाल मृत्यु की तरफ हैं। संस्थानों में एक्सपर्ट लोग मर रहे जिनसे नोलेज रिटेंशन की क्षति है, घरों में कमाने वाले मर रहे। प्रेम और भावना की वंश बेल हमारे बुजुर्ग असमय मर रहे। वेक्सीन बाँट दी गयी दूसरे देशों को, दवा और वैक्सीन दिए जाने के नाम पर राज्य सरकारों से दुश्मनी निकालने के जैसे बिहेव हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे भारत मे बहुत सारे देश बन गये हैं। भाजपा ने एकीकृत करने के बजाय सबको बाँट दिया है। वैक्सीन प्रोडक्शन बढ़ाने के लिये पैसे नहीं लगा रहे, उनको मुगल शासक या पुरानी राजपाट वाली व्यवस्था के जैसे भव्य निर्माण कार्य कराया कर अपना नाम इतिहास में दर्ज करना है। आदमी का क्या है जो पैदा हुआ उसे एक न एक दिन मरना है।

बीवी बच्चों सहित तंगी में आकर परिवार के परिवार लापता हो रहे हैं। बेरोज़गारी अपने चरम पर है। ऑनलाइन पढ़ाई में बचपन तहस नहस हो रहा है। अध्यात्म के नाम पर लूट मची है। अच्छा खाना और ऑर्गेनिक खाना बहुत महंगा है। आदमी को मरना नियति मानने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

पुलिस का रवैया पक्षपाती है। मीम में मज़ाक के जैसे बड़ी बड़ी बातें कह दी जाती हैं, इसे हमें समझना चाहिये। पटना में एक इंटलिजेंट प्रोफेसर को कितना मारा था, लेकिन रैली करने के लिए देश के गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और राज्यों को करारा थप्पड़ कौन देगा? कौन इनसे जाती हुई जानों का हिसाब मांगेगा? कौन होगा एकजुट आर्थिक और व्यवस्था जनित बदहाली पर?

ग्रामीण ई शिक्षा कोरोना काल मे मज़बूत की जा सकती थी लेकिन कहीं कुछ नहीं है। मोबाइल भरोसे कैसे सोच रहे सबको शिक्षित करना, लैपटॉप इंटरनेट मुहैया कराना , शिक्षकों को रिमोट शिक्षा के मनोविज्ञान की व्यापक ट्रेनिंग लेना देना छोटे बच्चों के हैंडल करना सिखाना सब कहाँ आयोजित हुआ स्टेट लेवल पर सब प्राइवेट स्तर पर हो रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि मुसलमान से नफ़रत करा के रखना ही मोदी जी और अमित शाह जी की राजनीति है और शासन का तरीका है।जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए RSS बस लिप सर्विस देता है। ग्राउंड वर्क और आमूल चूल परिवर्तन फेसबुक पेज बनाकर सस्ता दोहा उलीचने से नहीं होता, सबको एक समान शिक्षा व्यवस्था का पार्ट बनाने से होता है। लेकिन जैसा कि जाहिर है औरत पर और कुछ वर्गों ओर नकेल कसने में शान समझी जा रही है ऐसा देश बनता जा रहा है भारत जिसके बारे में हमें मालूम ही नहीं था।

Pragya Mishra, मुम्बई