मन की पटरी से

मैं शायद दिमाग से खूसट बुढ़िया हो रही हूँ मुझे इतने सजीले होनहार नौजवानों को रील और टिकटोक सरीखे प्लेटफॉर्म पर सारी ऊर्जा खर्च करते देख इतना अच्छा भी नहीं लगता। BPO, MBA ठीक है पैसा कमाने देते हैं, लेकिन होनहार लड़के लड़कियों पूरा वाणिज्य पढ़ कर, लॉ कर के अच्छे अर्थशास्त्री और वकील बनो न, कितने लोग दुखी है सिस्टम की इररेगुलेरिटीज़ से NGO चला दो, बस मुनाफा न देखो, पॉलिटिशियन बनो न ईमानदार वाला जैसे क़ई बाहर के देशों में होते हैं। बस पढ़ लिख के संसद में जाने वाला देश बनाओ । देश को अच्छे अर्थशास्त्री, वकील और पोलिटिकल लीडर चलाते हैं और दोनों की बड़ी किल्लत है। लीडर तो सारे मर गए जैसे। रिसर्च और थिंक टैंक नहीं प्रोत्साहित हो तो ये खुद करना होगा।

जिनके पास अभाव नहीं वे नौजवान केवल Mac D में जन्मदिन मना कर क्यो खुश है? हम इतने पिछड़े हैं, हमारे देश में अच्छी माइक्रो चिप नहीं बन सकती, साफ पानी के लिए चीन हमको गुलाम बनाना चाहता है। हम इतने पिछड़े हैं कि चीन के सायबर अटैक से हम अचानक पंगु होकर बैठ जाएं । ट्रांसपोर्ट, कंस्ट्रक्शन, टेक्सटाइल, फूड, वाटर ,डिजास्टर मैनेजमेंट , मेडिसिन हर क्षेत्र में कहीं भी हम दुनिया में बेहतरीन और स्मार्ट प्रस्तुत करने से क़ई देशों से पीछे हैं।

पहले माँ बाप के घर अभाव था बच्चा सोचता कम्पेटिटिव निकाल कर बड़ा करना है। अब वैसी किल्लत अभाव की ज़िंदगी नहीं है तो बड़ा करने की प्यास भी नहीं है। मोबाइल ने भी बहुत हद तक कंप्लेसेन्ट कर दिया। अल्टरनेटिव सोच बुरी बात नहीं है । पर अल्टरनेटिव सोच स्थिर रचनात्मक कला में तब्दील होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करती रहे तो बात बनती है। जिस पैशन और स्किल से अंत में बस दिखावे वाली प्रवृत्ति बढ़ती जाए, खालीपन बढ़ता जाए वो कितना भी ग्लिट ग्लैमर वाला ही क्यों न हो अल्पायु है।

इंडियन आइडल आया तो गाना जोर जकड़ा। डांस कॉपीटीशन आया तो डांस जोर पकड़ा। ये अच्छा लगता है कि गली नुक्कड़ के बच्चे ऊर्जा मार पीट में लगाने बजाय बड़ा डांस ट्रूप से नाम किये, कोई गरीब गायन के सहारे बड़ा बना।कोई कॉमेडी से। लेकिन बड़ा बन के बहुत चिप्पड़ सा बाल रंगा लिए, आँख नाक होंठ बदलवाने में जुट गए। जीट जाट में जैकेट डाले और खुद ही फिर कमती आदमी से रौब जड़ते गये। काहेक बड़ा।
क्यों पूरा बड़ा नहीं हो पाता कोई, बीच में लसक जाता है बड़ा होना। मेहनत है, लगन है, “मैं करेगा”, “बिग करेगा” लेकिन उसको मेंटेन कइसा करेगा इतना सोचने का ताकत नहीं।

“जंगल में मंगल” छोटे छोटे घर मे LED TV लगा के, फ्रिज लेके सुखी हैं। सब कमरे में Dish लगा, छोटा TV लगा, सब कम्प्लासेंट सुखी है। किसी को नहीं पड़ी इससे आगे की। डेली सोप के चरस के बाद 24*7 का चरस है। खड्डे में बंटी जाते रहते हैं, अब हाथी भी जाने लगे। सब खड्डे में जाता है, सेना जुट जाती है, मेला लगता है डाइनिंग टेबल तक।अब दुख भी कस्टमाइज़्ड हो गया है, मीम पर हँस देता है, मौत पर रो देता है।

Pragya Mishra