ओपीनियन #नहींदियाआपने

“क्यों मैडम आपको तो बड़ा सॉफ्ट कार्नर रहता है लिखीं नहीं कुछ .. फिलिस्तीन…इज़राइल… बैठ गया सब ओपिनियन”

हम्म…. एक एवरेज भारतीय इस विषय पर उतना ही पढ़ता है जितने में अपने देश में कम्पेटिटिव परीक्षा का इंटरव्यू निकल जाए और निर्धारित पदों पर नियुक्ति हो सके। इतने से में ओपिनियन बनाया नहीं बनाया ये मैटर नहीं करता।
बाकी रही बात कि इस तरफ़ हैं कि उस तरफ वाली तो इस समय सब अपने घर तरफ हैं।

यदि किसी ने तय कर ही लिया है कि वो अपनी अपेक्षाओं के पहाड़ पर चढ़ा कर आपको धक्का देंगे ही तो इसमें कोई क्या कर सकता है।

किसी भी लड़ाई में वही लुटा है जिसका हालात से कोई सरोकार न था और जो सबसे बेबस था। इसमें भी यदि तय करना पड़े कि हमें किसके साथ होना है तो ये आदमीयत के साथ गद्दारी है।

भूत में, भविष्य में, मौजूदा समय में जिस किसी पर भी गलत प्रहार हो रहा है उसे बचाया जाना ही ईश्वर और ईश्वर तुल्य महात्माओं का संदेश रहा है, जिसके लिए वे खुद सूली पर चढ़ाए गए तो फिर अदना आदमी की क्या बिसात।

हम जैसों का सच ये है कि हम वे लोग है, जो मरे हुए पर सच का दुःख व्यक्त करते हैं, लेकिन राजनीतिक सरोकार से मूँह मोड़ लेते हैं, एक मीम पर हँसते तो हैं, लेकिन हो रही आलोचना से डर कर पीछे भी हट जाते हैं और परिवार की ओट लेकर बैठ जाते हैं , हमें डर घर कर लेता है कि हम न रहे तो उनका क्या होगा । हम बहुत बड़ी जनसंख्या हैं, बड़े भूभाग में पसरे, अलग अलग धर्म , वर्ग , पंथ में पैदा हो गए इंसान, ज़्यादा से ज़्यादा मच्छर , कॉकरोच या चूहा मार लेते हैं। महामारियों , बमबारियों में मर जाते हैं, हमारे तो आंकड़े भी मैटर नहीं करते, ओपीनियन क्या ख़ाक मैटर करेगा।

Pragya Mishra