आलोक धन्वा जी की एक कविता पढ़ी उसमें उन्होंने अंतिम में लिखा है :
“मैं जानता हूँ, कुलीनता की हिंसा”

कुलीनता की हिंसा और कुलीनता के डर ने हम सबको पूरा व्यक्ति होने से रोक दिया है। हमारे सोच की उड़ान रोक दी है। नहीं अविष्कार नहीं रुके। कविता लिखना अब बंद है, ग़ज़ल कोई कह नहीं सकता, कुलीनता बुरा मान रही है। अब यह कुलीनता की हिंसा इतनी तीव्र और इतनी विकराल हो चुकी है कि इसमें प्रजातियो का दम घुट जाएगा।

जब सारा शोर समाप्त हो जाएगा तब फिर नई सभ्यता बननी है शायद। एक नया भागीरथी , एक नई गंगा , और नए मैदान बनाये जाने हैं। लेकिन फिर कोई तय कर देगा गंगा पवित्र है, फिर कुल निर्धारित हो जायेंगे और पानी को पानी समझ कर साफ रखने वाले को फिर से कुलीन लोग भ्र्ष्ट बोलेंगे क्या पता उसकी ज्ञान सम्पदा कुल सम्पत्ति भी जब्त कर लें। फिर कुलीनता रिसाइकिल हो जाएगी। कुलीनता के आगे विविधता दोबारा घुटने लगेगी।

प्रेम रिसाइकिल नहीं होगा।

छोटी छोटी कोंपलों में तुलसी के पौधे जैसा फूटेगा और ज़रा सी अवहेलना पर सूख जाएगा।

प्रेम को भी कुलीन हो जाना चाहिये, फिर प्लास्टिक की तरह मिट्टी मे, समुद्र में, नदी में सब जगह जीवेत वर्ष शत: आसन्न रहेगा। छुड़ाते रहो मिटाते रहो निजात न मिलेगा उससे। कुलीनता ऐसा ही दम घोंटू प्रेम नाक पर डाल दे, निजात न मिले जिस प्रेम से ऐसा प्रेम हो जाये सारे कुलीन लोगों को।

Pragya Mishra