अनमोनीटर्ड_ज़िन्दगी

बढ़ रही उम्र, छूट रहे दोस्त और विलग रहे परिजन ये सीख दे रहे हैं कि हम आजीवन न सही होते हैं न गलत । हम केवल परिस्थिति के मुताबिक होते हैं। हर किसी का अपना फ्रेम ऑफ रेफरेंस है जो हर समय अपने मानदंड से जज करता चलता है। दुनिया नहीं मानती कि वो अभी-अभी जजमेंटल हो गयी।

जिन कारणों से कोई अच्छा लगा करता था उन्हीं करणों से अब कोई खराब लगेगा क्योंकि चोट बहुत गहरी किसी और के चेहरे में किसी और की याद दिलाएगी। अब कोई भरोसा नहीं करेगा।करेगा भी तो कसमें ले ले कर भरोसा चेक करेगा।

किसी काम को अंजाम देते , कोई मेसेज लिखते , कोई विचार रखते हुए , हमने , जिन ऐंगल्स और परिणामों के बारे में सोचा भी नहीं वो आपके सामने अचानक ऐसे रख दिये जायेंगे जो दूसरे के नज़रिए से एकदम गलत है, वाहियात है और कुछ तो शर्मिंदगी भरा भी। आप डिफेंड नहीं कर पाएंगे, प्रूफ क्या कीजियेगा कैसे कीजियेगा, कैसे बताइएगा की नहीं हमने तो ये सोचा नहीं, ” अरे नहीं तुमको गलत लग रहा” , ” नहीं ये तो मेरे ज़ेहन में आया ही नहीं”, “ओह ऐसा तुम सोच रहे हो”…. और क्या कहिएगा?

ज़्यादा से ज़्यादा सही होने पर आपा खो देंगे, लेकिन कितनी बार !…… मानलीजिए सच साबित हो भी गए तो धागा तो चटक ही गया न, आगे गांठे ही गांठे, न जाने डोर है या गाँठ की पुल।

मिसअंडरस्टेंडिंग एक बहुत अंडररेटेड परेशानी है जो रात की नींद, दिन का चैन खा सकता है । महीनों बेचैन रखता है। शक्की बना देता है फ़िर पागल भी। कभी-कभी यूँ भी होगा कि पुराने ज़ख्मों से उपजा एक बेबुनियाद शक तंग आकर खुद को अंजाम दे देगा। उसके बाद – “देखा मैं सही कह रहा था” । फिर दूरियां और दूरियां , रिश्ता ठप्प।

हम लोग अपने अपने इकोसिस्टम में अपने आपको सबसे अच्छा समझते हैं। लेकिन खुद की एक गैरमामूली भावुक पसंद को पूरा करने के लिए हमने भी कभी किसी की अनजाने में बली चढ़ा दी होती है। बली चढ़ने वाला सौ साल कुढ़ता है और एक दिन हमारी खुशियों पर ऐसे बरसता है जैसे हम सबसे सताए हुए हैं और हमारी कोई ग़लती कभी थी ही नहीं, जबकि इस हालात को पैदा करने में बराबर के हिस्सेदार रहे थे हम। बस मज़बूत ज़्यादा रहे और कद काठी में बोलबाला रहा तो मौके पर फायदा उठा गए ।

नाव इस डर से न निकाली जाए कि तूफ़ान आएगा तो कूंएँ में मेंढक की मौत मरेंगे लेकिन मरेंगे ज़रूर और तब भी कोई वाहवाही नहीं होगी। रिस्क लेने से डरता था, डरपोक, लोज़र, बड़ा आया था सेफ खेलने वाला, लोनर था, सेकलुडेड था, डिप्रेसड बेचारा और न जाने क्या क्या। निकल कर बीच तूफान में मर गए तो भी लोग कहेंगे बहुत चुल्ल मची थी, एक यही नौकरी मिली थी, बड़ा आया रिस्क लेने वाला, ऐसे लोगों के तो भूत सवार रहता है।

दोनों ही हालात में सुकून उसी को होगा जो अपनी मर्ज़ी से घर मे रहा या बाहर गया किसी के बोलने से नहीं आगे उसका जो हो लेकिन सुकून तभी जो सिर्फ अपने दिल की सुनो।

सुकून की दूसरी कड़ी ये भी कहती है कि आज़ाद रहो। ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन से सबसे पहले खदेड़ दो जो ये दावा करने लगे कि वो तुमको तुमसे ज़्यादा समझता है, कि तुम उसके मुताबिक नहीं इसलिये अपने जीवन में केवल गलत निर्णय लेते हो, की तुमने केवल सॉफ्ट टॉय की दुनिया देखी है और जीवन की असल दिक्कतों से तो तुम रूबरू हुए ही नहीं। तुम्हे उसके नज़रिए से ही सही गलत समझना होगा वर्ना तुम गलत ही गलत हो।

किसी को हक़ नहीं है कि कोई आये और कह जाए कि मेरे मुताबिक चलो तो तुम्हारा भला होगा वर्ना तुम बर्बाद हो। एक मैच्योरिटी के बाद माँ बाप भाई बहन पति पत्नी प्रेमिका या प्रेमी जिस दिन कहने लगे मेरे मुताबिक काम करो, मेरे मुताबिक जगो सोओ उठो, मेरे मुताबिक दोस्ती करो, मुझे सारा ब्यौरा दो, अभी यहाँ ऑनलाइन क्यों अभी वाट्सप पर अभी टेलिग्राम पर क्यों, इतने बजे से इतने बजे क्या किया, आज मुझे समय क्यों नहीं दिया, उस दिन इससे बात कर सकते थे तो तुमने मुझसे बात क्यों नहीं किया। मेरा कहा ये नहीं किया मेरा दिया ये नहीं रखा, उसका दिया रखा, मेरे मन की ये बात नहीं मानी मेरे मन की ये बात नहीं रखी। जस्ट कीप दिस ब्लडी बुलशिट मेंटेलिटी आउट इन नेम ऑफ लविंग रिलेशन बी इट बी एनी रिलेशन।

आग्रह करने और खुद को थोपने की रेखा इतनी महीन होती है कि निभाने में अक्सर दिखाई नहीं देती। यदि आप एक ऐसे रिश्ते में हैं जिसमे ये सब हो रहा तो फटाफट उस रिश्ते से निकलिए आप खुली ज़िन्दगी डिज़र्व करते हैं, अनमोनीटर्ड जिंन्दगी डिज़र्व करते हैं।

विराम।

Pragya Mishra