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“जब एक दिन हम बाहर निकले,
निकले बाहर लोकडौन में”
“अच्छा……

किसी दिन की बात है, हम लोग आपनी गाड़ी से थोड़ा सा बाहर निकले एकदम इत्तू सा। आगे मैं बैठी, अलोक गाड़ी चला रहे थे। मेरा चार साल का बेटा अंशु, नौ वर्षीय मोनू और भांजी छोटी, पीछे की सीट पर बैठे थे। रास्ते मे मंदिर आया , हमने अवचेतन रूप से, मंदिर देखते ही उंगली से माथा और गला छूने जैसा कुछ किया हम में से किसी को रियलाइज़ भी नहीं होता कि हमने मंदिर देखा और हम “प्रणाम” कर के निकलते जाते हैं। “कहाँ है कहाँ है ” पूछते जब तक अंशुमन समझा तब तक गाड़ी बढ़ गयी।

फिर गाड़ी J B Nagar, अंधेरी से निकली तो मोनू ने अंशुमन को मस्जिद दिखा कर बताया यहां मुस्लिम्स प्रेयर करते हैं, अंशुमन ने वैसे ही हाथ जोड़ा जैसे हम हिन्दू मंदिर में जोड़ते हैं। हम दो बड़े आगे बैठे इन सब बातों पर ध्यान भी नहीं दे रहे थे मुझे ड्राइव पर गाना सुनना था। आलोक को अलर्ट रहना था।

फिर गाड़ी अंधेरी के गिरजा घर के आगे ट्राफिक में रुकी तो आगे बैठे हम दो बड़े, बड़ी बोरियत में ठेले पर आम देख रहे थे कि हमें आम खरीद लेना चाहिये, मोनू ईसाइयों के तरीके में क्रॉस को ग्रीट कर रहा था। अंशुमन वैसे ही हाथ जोड़ के कार में प्रणाम कर रहा था जैसे हर मंदिर में करता है। गाड़ी के भीतर बैठे उसे सबसे ज़्यादा उत्साह उसे लंबे तिरछे एक्समस के पेड़ के लिये था जो बहुत ही विनम्रता में झुका हुआ बच्चे को खुद पर लटकने बुला रहा था।

अंशुमन और अभिज्ञान अभी जैन और बुद्ध धर्म नहीं समझते । बस इतना जानते हैं कि बुद्ध की मूर्ति कविता आंटी के ड्राइंग रूम में देखी है और सुमिता जैन मैम्म प्रिंसिपल हैं जो अंडा स्कूल टिफिन में मना करती थीं।

Pragya Mishra

शतदल