करीब चार पाँच महीने पहले एक व्यक्ति ने कहा वेक्सीनेशन बेकार है, न हम लगवाएंगे न हमारे घर पर किसी को लगाने की ज़रूरत है, आप भी न लगवाएं। उनके हज़ारों फेसबुक फॉलोवर है और सब उनकी बात पढ़ते हैं। कुछ समय के बाद फिर उसी व्यक्ति ने कहा कि कोविशील्ड या कॉवेक्सीन एक ही है कोई अंतर नहीं है सब चोंचले हैं कोई भी लगवाओ। बहरहाल ,कम से कम कुछ महीनों के भीतर वह राजनीतिक कमेंटेटर व्यक्ति यह तो मान चुका था कि वेक्सीन है और लगवानी है।ईश्वर से उनके लिए यही प्रार्थना है कि विज्ञान से सरोकार रखते हुए कॉवेक्सीन और कोविशील्ड में से जो भी वे लगवाएं , दोनों डोज़ किसी एक ही वेक्सीन की लगवाएं।

किसी सरकार की कुछ नीतियों का विरोध करते करते हम कब पूरी सरकार , फिर व्यवस्था, फिर देश की स्थिरता का ही विरोध करने लगते हैं इसमें बड़ा बारीक फ़र्क होता है। इस फ़र्क के बीच पिसते हैं आम नागरिक । उनको सरकार से भी निभानी, विरोध में बैठे यार से भी निभानी।
भारत मे हम जैसे आम नागरिक की सालों से यही नीति रही है “सुनो सबकी करो अपनी”।

राष्ट्रीय टीकाकरण अभियानों के विरूद्ध नहीं लिखना चाहिये, न बोलना चाहिये और न सुनना चाहिए, अगर आस पास ऐसे व्यक्ति है तो उनकी बात एक कान से सुनिये और दूसरे से बाहर करिये।जब मसला महामारी या युद्ध का हो, देश की सरकार का हाथ बनना ही नागरिक धर्म है। देश विदेश के वैज्ञानिक घास छील कर शोध नहीं कर रहे उनका सम्मान हो यह ज़रूरी है।

—–28 मई – टीके की पहली डोज़—-

28 मई को मैंने मेरी कम्पनी के माध्यम से कोविशील्ड वेक्सीन का पहला डोज़ लगवा लिया। दिए गए समय के मुताबिक करीब तीन बजे TCS bayan park पहुँची। सेंटर पर उस दिन 1000 से ज़्यादा लोगों की भीड़ थी। माथा एकदम से चकरा गया, आदत नहीं रही लोगों को देखने की । इतने लोग दिखे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि अब करना क्या है। सब दूर दूर अपने खेमे में चेयर पर ऐसे बैठे थे जैसे अब कोई मैच शुरू होगा । एकदम शांत प्रतीक्षारत एक हज़ार लोग।

गनीमत थी कि कुछ सोचना नहीं पड़ा। सामने एक कतार थी जिसमें कूपन दिया जा रहा था। मेरा नम्बर था 1654। लगा कि थोड़ा पहले आना चाहिये था पर अब क्या ही कर सकते थे।

सेक्युरिटी गार्ड ने लीड करते हुए हमें 1650 – 1700 वाली गैलरी में बैठा दिया।

अब यहाँ अगले दो घन्टे तक बैठी। गर्मी उतनी नहीं थी, बगल में घूमने वाली गर्दन का पंखा लगा था। एक हाउस कीपिंग स्टाफ पेन और राइटिंग पैड लेकर सारे कतारों में मदद के लिए पूछ रही थी। एक स्टाफ फॉर्म बांट रहे थे।
सामने के कृत्रिम झरने में कबूतरों की चहल पहल ने मेरा ध्यान खींचा तो देखा वहां आर्टिफिशियल फाउंटेन से सटे एक बड़ी मेज़ पर बिसलेरी की छोटी बोतलें रखी हैं और पार्ले जी के बिस्किट भी। दो घन्टे इस माहौल में बैठना आसान रहा।

कम्पनी का सारा ऑफिस बियरर स्टाफ वहां उस दिन किसी जंग के मोर्चे पर तैनात टुकड़ी की तरह मुस्तैद था कि आगन्तुक को कोई परेशानी न होने पाए, न ही किसी तरह का नियम उल्लंघन हो और न किसी तरह की अव्यवस्था से क्रियान्वयन मे देरी हो । यही टाटा ग्रुप की पहचान है।

उस दिन लाउड स्पीकर खराब था। एक एच आर महोदया अपनी पूरी आवाज़ की ताकत लगा कर गिनती बोल रही थी ताकि लोग सुनकर भीतर आगे की प्रक्रिया में शामिल होते जाएं। अगले दो दिन उन्होंने गार्गल किया होगा।

जिनके बच्चे छोटे थे और घर पर रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी वे लोग अपने बच्चों के साथ आये। उस परिसर का विस्तृत वातावरण बच्चों के टहलने के लिए अनुकूल था और उनको दूर दूर रखने के लिए भी सारे प्रावधान थे।

परिसर में एक एम्बुलेंस भी था। टीका लगने के बाद हम सबको आधा घंटा रुकने कहा गया । उस दौरान सभी ने आधिकारिक सेल्फी पॉइंट पर अपनी अपनी तसवीरें लीं।

कॉफी वेंडिंग की व्यवस्था ने पूरे अवसर को किसी हैंग आउट टाइम में बदल दिया था।

इतने दिनों बाद घर से इतनीं दूर निकलना सुखद था। इस लोकेशन की रेजिस्ट्रेशन कराई ही इस मंशा से थी कि अपना ऑफिस तो देख लें।
ऑफीस में क़ई जाने पहचाने चेहरे दिखे लेकिन मास्क के पीछे आँख की भाषा से एडमिन स्टाफ और एच आर से हाई हेलो थोड़ी की जाती है, कोई दोस्त तो मिला नहीं।

अंक संख्या 1654 की अनाउंसमेंट के साथ मैं पैनकार्ड आधार कार्ड और नानावटी मैक्स का फॉर्म लेकर अपने ऑफिस वोलनटियर के सामने थी। उन्होंने पेपर वर्क वेरिफाई कर के आगे जाने बोला।

अगले स्टेप पर डॉक्टर ने जांच परख की दृष्टि से कुछ मूल प्रश्न पूछे और वेक्सीन लेने के बाद के एहतियात के बारे में बताया।

इसके बाद नानावटी मैक्स के वोलंटियर ने फॉर्म ले लिया, कंप्यूटर में एंट्री हुई , कोविन आईडी और पैन आधार वेरिफाई हुआ और मेरा नाम कन्फर्म केस में डाल दिया गया। इस बीच मेरे बगल की लड़की जो शायद क्रोमा की स्टाफ थी अपने घर फोन कर के दीदी , मम्मी, पापा को आधार की फ़ोटो या आधार कार्ड ढूंढने कह रही थी। उसका वेरिफाई नही कर रहे थे।

अपने ऑफिस के बाहर वेक्सिनेशन लगने की प्रतीक्षा में बार बार सोच रही थी , क्या मेरी सीट पर मेरा सामान यथावत रखा होगा, मेरे बच्चों की तस्वीर, नवांकुर की ट्रॉफी और सर्टिफिकेट वहीं डेस्क पर सजा रखा था जब 16 मार्च 2020 को अचानक छोड़ कर निकलना पड़ा। क्या सब कुछ अभी भी वहीं होगा! आलोक ने सुझाया ये जो अंदर बाहर कर रहीं है उनसे बात करके पूछ लो।मैंने ध्यान दिया जो अंदर जा रहीं थीं वो मनीषा थीं एडमिन डिपार्टमेंट से। जहां मैं बैठती थी उधर भी एक दूसरा वेक्सिनेशन केबिन बना था वह उसी की व्यवस्था देख रही थीं। मैंने मुस्करा कर इसी में सन्तोष कर लिया कि मेरे डेस्क का सामान कही न कहीं तो होगा।

क्रमशः