शाम बिना कुछ कहे चली गयी। कुछ गहरे संवाद छूट गये। दो दिन के बाद जब धूप कमरे में आयी तब इतनी तेज़ थी कि काटती थी। मैने उसकी तरफ देखा नहीं, टिंटेड ग्लास चढ़ा दिए, कमरे में ट्यूबलाइट की रौशनी भली लगती रही, जाने कब बाहर अंधेरा छाने लगा ।

अरे! आज मुझे लालिमा दिखी भी नहीं, कमरे के भीतर इतनी कृत्रिमता भर गई की चारों ओर पसरे लालित्य के धीरे धीरे दूर जाने का आभास भी नहीं हुआ मुझे ।

डोर बेल बजी तो मालूम हुआ कमरा मैंने बन्द किया हुआ है, कोई आता कैसे, मुझे बताता कैसे कि देखो दृश्य जा रहा है, जिसे तुम खोजती रहती हो वह समय निकला जा रहा है, उठो , दरवाज़ा खोलो।

एक नन्हा बच्चा मुझे झकझोर झकझोर कर उठा रहा है। मुझे उठना था , कमरा समेटना था, साँझ बाती करनी थी, टन टन टन करती घंटी अपार्टमेंट के कोने कोने में बजानी थी। लेकिन कमरा बंद रहा, मैं लेटी रही , पढ़ती रही एक किताब, आज कोई नियम अपनी जगह पर नहीं था, आज सारे काम ध्वस्त थे। आज शाम हुई ही नहीं आज दोपहर के बाद रात हुई है।

Pragya Mishra
12 जून 2021
शनिवार