आज 13 जून 2021 को YQ पर मेरे 500 quote पूरे हुए। मैंने हिंदी में लिखा है। कभी कभी English भी कोशिश की है। अंग्रेज़ी में हॉलीवुड की फिल्मों का ज्ञान है मैने अंग्रेज़ी बोलनी वहीं से सीखी थी। लिखना सिखाये थे दरभंगा मिर्जापुर के दिब्यइन्दु बिस्वास सर। दोनों भाषा में लिखना आना चाहिये , कोशिश तो करनी ही चाहिये। शब्द ज़हन में होंगे तो भावनाएं खिलेंगी हम सब के पास बहुतेरे किस्म किस्म के अनुभव होते हैं।

Pragya Mishra Your Quote Link

लिखते लिखते मैने सीखा कि किसी बात या टॉपिक पर तो बहुत लोगों ने लिख दिया है ,ये लगता है कि अब हम ऐसा क्या ही लिख देंगे। गौरतलब है अपने अंदाज़ और शब्दों में अब तक हमने तो नहीं लिखा। जैसे दुनिया में अगणित चेहरे और सारे चहरे अलग वैसे ही लेखन में स्टाइल और शब्द स्वत: सबके अलग अलग।

YQbaba अपने writingyan में कहते हैं – अगर तुमको लिखने का मन है तो पहले ये तय कर लो कि तुम्हारे पास बताने के लिए कोई बात हो, फिर उसके बाद उस बात को कहने का तरीका।

मैंने जो तरीके गूँज पर, फेसबुक पर, सुने गए गानों, देखी हुई फिल्मों, पढ़ी गई किताबों, जिये गए अनुभवों, की गयी गलतियों, फिर दोहराई गयी गलतियों और दोस्तों से सीखे वे ही मेरी YQ उपलब्धि है।

ये जगह मुझे फिलहाल शांत और अच्छी लगती है। अगर कोई कहता है मेरे कोट्स पर आइये पढ़िए मैं उनके Quotes पढ़ती हूँ। सबके पास कुछ न कुछ टैलेंट होता है, मुझे किसी का लिखा खारिज करने का मन नहीं करता क्योंकि हर किसी के लिखे में एक कहानी एक बात मिलती है चाहे उसे पढ़ कर लगे कि इसे बेहतर लिखा जा सकता था तो भी जितना सम्भव हो आग्रह मान लेना चाहिये पढ़ के देखने का।

हिंदी हार्ट लैंड दुःखी होता है लेकिन सच यही है कि शायरी ने बचाई है हिंदी कविता और अज्ञेय उसके बाद पढ़े जाते हैं जब पटरी पर चल पड़ती है हिंदी कविता।

मुझे कविताओं की दुनिया बहुत पसंद है , इसलिए नहीं की शायरी कि वाह वाह उबाऊ है, दरअसल मेरा बचपन बाबा नागार्जुन सरीखे कवियों की हिंदी कविताओं को सुनते बीता था बस इसलिए।

आज सूचना प्रौद्योगिकी और कॉरपोरेट मे पल रहे माँ बाप, जश्नोजाम में कम से कम शाइरी पर आह वाह तो पढ़ते हैं, हिंदी हिदनुस्तानी से बची रहती है। कारपोरेट शामों और घरों की भावी नस्ल हिंदुस्तानी के दामन से हिंदी के हरश्रृंगार चुनती है तो कभी उर्दू नज़्में लेकिन सबसे ज़्यादा चुनी जाती है हिंदुस्तानी।

उर्दू भी आनी चाहिये, इश्क़ की ज़बान है। फिलहाल मैं हिंदी पढ़ रही हूँ। चाहती हूँ अच्छा लिखूँ दिल से लिखूँ और रचनात्मक लेखन के व्याकरण की ट्रेनिंग्स लेकर लिखूँ। हिंदी में कितनी विधा है जिसमें विधागत पाबंदियां हैं। व्याकरण ही अनुशासन है। दिल्ली दूर है अभी।

पापा की फाइलों में देखा था कभी वो उर्दू से डिप्लोमा थे और जनादेश में पटना में पत्रकार थे। तो मुझे लगता है कही न कहीं उर्दू भी मुझमें होगी लेकिन ढूँढा नहीं है अबतक , हाँ पर कोशिश शुरू की है, एक ऑनलाइन क्लास करी थी पिछले साल जिसमें फहाद सर थे और उन्होंने उर्दू डिक्शन सिखाया था। मज़े की बात तो ये की साल 2020 में मुझे अपने बारे में पता चला कि अब तल फूल और फल को मैं फ़ूल और फ़ल बोलती आयी थी। बहुत सी बातें हुईं वो कभी और लिखूंगी।

आज YQ में 500 quote हुए हैं, एक किताब भी YQ से प्रिंट करवाई है, कभी कभी उसको पलटना और खुद को पढ़ना अच्छा लगता है। हम मे से जो लोग लिखते हैं वे अगर कभी कभार अपने लिखे को अच्छा फील करें तो इसे आत्म श्लाघा का नाम न दें, आप याद करिये वो समय जब आप कृति की रचना में थे। तब आप आप नहीं थे, आप प्रबुध्द अपना सबसे ईमानदार रूप थे जो आपसे खुद भी नहीं मिलता, तो उस शख्स की तारीफ़ तो बनती है।

मुझे लगता है मैंने इन 500 कोट को लिखने में किसी को खुश करने और लाइक बटोरने का प्रयास करते हुए नहीं लिखा है, मुझे इनको पढ़ कर लगता है कि जो लम्हा नहीं लौटेगा वो डायरी में अब गुम भी नहीं होगा वो digitise होकर कागज़ पर भी उतरेगा मेरी उँगलियों से भी पलटा जाएगा, बीता लम्हा फिर आएगा।

मेरी YQ किताब