हम लोग केंद्रीय विद्यालय दरभंगा में हिंदी वाले सर को “महाशय” बोलते थे,यह शब्द हमारे दसवीं कक्षा के हिंदी-संस्कृत शिक्षक के लिए रूढ़ हो गया था। उनके अलावा कोई महाशय नहीं कहलाया।

शुरू में एक और हिंदी सर थे वो माइक से ऐसे उच्चारण में एनाउंसमेंट करते थे कि उनकी हँसी हो जाती थी, लेकिन क्या करें हँसना रोका भी नहीं जाता था।

” प्रार्थना के बाद सारे बच्चे पँक्ति बनाकर सीधे अपनी अपनी कच्छा मे जाएंगे, कोई कच्छा से बाहर नहीं दिखाई देना चाहिये नहीं बहुत डाँट पड़ेगी”

फिर आए थे रिटायरमेंट के एकदम करीब श्याम सुंदर शर्मा सर। sss उनका सिग्नेचर था। उनको केवल रिस्पेक्ट ही दी जा सकती थी। मुझे तो दादा जी का चेहरा नज़र आने लगता था उनको देख कर कोई मज़ाक नहीं उड़ा सकते थे।

फिर हमारी बारी आई महाशय से हिंदी संस्कृत पढ़ने की । सुपर कड़क। जानकारी दुनिया भर की, औरा ही अलग , मुस्कान एकदम जुगाडू परेश रावल वाली। नाक पर बीचों बीच बड़ा सा काला मस्सा।

हिंदी की कक्षा में महाशय के सामने अंग्रेज़ी को भी “आंग्ल भाषा” बोलते थे और बातचीत केवल “वार्तालाप” में होती थी। कक्षा के दौरान लौह पद गामिनी और गोल पिंड लम्ब दंड जैसी भाषा ही सुनाई देती थी, मने संस्कृत निष्ठ हिंदी। दोपहर को “शुभ अपराह्न” बोल कर सम्बोधन करना होता था। कोई मज़े नहीं ले सकता था। हिंदी बहुत गंभीरता से लेते थे महाशय। आज के मीमर देख के तो पाताल में धंस जाते सब तब।

एक बार उन्होंने कक्षा में मेरी तरफ देख कर पूछा, ए लड़की तुम बताओ
“तुम्हारी संज्ञा क्या है?”
मैनें बोला “मेरी संज्ञा प्रज्ञा है। “

फिर उन्होंने लड़को में से किसी को उठाया, पूछा
“तुम्हारी संज्ञा क्या है?”
अंजान बनते, सहपाठी ने, मुँह बना, भोली सी शक्ल में जवाब दिया:

“महाशय मेरी संज्ञा प्रज्ञा है”

आठवी नौवीं दसवीं में ये सब छूटकू मुटकू मस्ती बहुत हुई जिसे किसी गेट टुगेदर में याद करके हँसना है जो हुआ नहीं अब तक। अब आज कल की जेनरेशन बहुत मेच्योर हो गयी है हम लोग बहुत सीधे सादे थे।

महाशय का पसंदीदा वाक्य था “ए लड़का पिट्ठी तोड़ देंगे”, और वो अच्छे से लगा भी देते थे। गृहकार्य न करने पर और संस्कृत किताब मणिकर्णिका के सुभाषितानि याद न करने पर लड़कियों को मार नहीं पर झाड़ अच्छे से पड़ती थी। लेकिन मजाल किसी को बुरा लगे। महाशय सबको अच्छे लगते थे। डरते भी सब थे।

बहुत साधारण व्यक्ति ठेठ बिहारी, पूरी बांह की शर्ट, हाफ स्वेटर, स्लेटी बाल, चश्मा नहीं था, हट्टे कट्टे थे, पिद्दी बच्चे डरते थे तो कुछ गलत बात नहीं थी। हमेशा मुस्कराते थे छाती चौड़ी कर के बगल में कॉपी दाब के चले आते थे क्लास में। मफ़लर भी रहता था। मुझे ठंड के दिनों के महाशय याद आ रहे हैं क्योंकि गर्मी के दिनों में हिंदी का प्रेशर कम था, सर्दी में एग्जाम पास हुआ करते थे क्या पता इसलिए बहुत गौर से देख के सुने होंगे।

एक बार क्लास में मेरी किसी से जानी दुश्मनी टाइप लड़ाई हुई थी और मूँह तक न देखने तक बात गई । महाशय ने कोल्ड वॉर भांप लिया और बोले थे कि ऐसे नहीं होता है बात को हल्का रखिये, जीवन के किसी पड़ाव पर अचानक क्लास फेलो आमने सामने आ जाओगे तो लड़ाई याद करना है क्या, कि अक्छे से मिलना है।

2001-2 के दसवीं तक के बच्चे का क्षितिज बस स्कूल की गेट और छुट्टी की घन्टी तक था, “ज़िंदगी का मोड़, जीवन के पड़ाव” सब एक बाउंसर विषय था। फिर भी उनकी बात हमेशा के लिए बैठ गयी, आगे आगे डॉट्स कनेक्ट हो गए।

दिल्ली में कॉलेज के दौरान वही क्लास फेलो orkut के माध्यम से मिल गए, बात चीत में कड़वाहट रखने की कोई वजह नहीं थी। जीवन एकदम भिन्न थे और समय बहुत अच्छा। चेन्नई में जब जॉब ट्रेनिंग हुई तो पहली कमाई से दादी माँ या माँ के लिए जो सामान भिजवाए थे वो उन्ही के पिता जी के माध्यम से था।

फिर मुम्बई में नौकरी के दौरान एक बार टीटू भैया से मिलने माटुंगा गयी थी, पीसा जी आये थे। तब माटुंगा से लौटते वही क्लास फेलो अचानक बांद्रा के रेलवे स्टेशन पर मिले । सालों कोई कॉन्टेक्ट नहीं और ऐसे भीड़ भरे स्टेशन पर अचानक सामने मिल जाने पर आश्चर्य हुआ था, मैं ऑफिस की जल्दी में थी। हड़बड़ाहट में लेकिन ठीक से बात हुई फिर मैने अपनी लोकल पकड़ ली। मैं हमारे हिंदी शिक्षक आदरणीय “महाशय” सर को याद कर के मुस्करा रही थी।

जीवन के मोड़ ; कॉलेज, कोचिंग सेंटर, बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन, सोशल मीडिया, सालों सालों बाद कही भी आते रहते हैं, इसलिए किसी से भिड़ंत कर के बात नहीं छोड़नी चाहिये हमेशा अच्छे नोट पर फेयरवेल होनी चाहिये।

Pragya Mishra