तुम और मैं बहनें हैं
मैंने कहा तुम क्रांति हो
तुमने मुझे, संज्ञा दी प्रेम की।

गूँज के दर्पण में
उभर रही थी कविता
हठात हुए आभास में।

अधरों की मुस्कराहट का सहारा था
एक कमरा तुमने मुझे दे दिया है
एक कमरा हमेशा तुम्हारा था।

मोबाइल की स्क्रीन रही होगी
छोटे शहर का सेट रहा होगा
एकतरफ़ा प्रेम की पिक्चर मे
स्क्रीनप्ले के राइटर ने
दर्द भरा अफ़साना पढा होगा।

कितनों को रास न आएगा
फ़िर भी सखी तुम्हारे लिए
हम जैसियों का वक़्क्त रुक जाएगा
क्योकि हम बहने हैं।

इक्कीसवीं सदी का छद्म
जाने कब से पालते आये हैं,
हकीकत यही रहेगी
हम सखियाँ एक दूसरे को संभालते आये हैं।

कोमल मन की औरत
न लाग लपेट न छद्म
तूम्हारी कांति से भयभीत
दुर्बलता घर में छुपी हुई है।


कायरता साध कर चुप्पी नहीं बोलती कुछ भी
न पक्ष में न विपक्ष में
न्याय के साथ अन्याय तटस्थता करती है
निर्भीक सहेलियां तुमसे पूरे मन से प्रेम रखती है।

रुकना, यहाँ से तुम जाना मत
तुमने कहा था अब आयी हूँ, न जाने के लिये।

सुनो! तुम हो तो जीवन है
तुम आयी हो नए सृजन करने के लिए
भोगे हुए से पार पाकर मुस्कराने के लिए।

मेरी दुर्गा पीतवस्त्र धारिणी वहिनी
बड़े कैनवास की औरत
विद्योतमा मुग्धा रति
कसमसाहट मन मे छड़ती सी
हे! शिव शम्भो
कौन है ये कौन है कौन है ये
उद्दाम गति सी ।

Pragya Mishra