Happy Father’s Day

मेरे पिता डॉ प्रभात नारायण झा की कुछ तस्वीरें।

एक समारोह के दौरान मेरे पिता

पापा को सादर प्रणाम। सुबह ही बात हुई। आज कल वे स्वस्थ हैं। मेरे लिए पापा, व्यक्ति से ऊपर एक भावना हैं जो हमेशा रहेंगे। मेरी सहित्यिक अभिव्यक्ति जब धीरे धीरे और प्रबल होगी तब मैं पिता जैसे विराट शब्द पर एक कविता भी लिख सकूँगी। आज इच्छा है अनुभूति के कुछ शब्द कलमबद्ध करूँ।

अपनी अपरिपक्वता में मैंने, स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझा और पापा के सभी आदेशों को पहली बातचीत में खारिज किया।

ईश्वर की कृपा से मुझे अपनी गलती का एहसास भी होता है इसलिए पापा के कहे का अनुसरण ही जीवन भर किया क्योंकि जीने की और कोई पद्धति मुझे उचित लगी नहीं।

कुछ बातें जिन्हें मानने का मन बिल्कुल नहीं करता था उनको उनके डर से माना जिसका परिणाम मेरी सफलता ही रही।

उनका कोई व्यवहार जिसे मैंने निष्ठुरता और बेपरवाही समझी उन सब बातों ने मेरे व्यक्तित्त्व का सघन विकास किया।

पापा कभी आगे आकर उठाने नहीं आये, दूर से देखते रहे कि जहां एकदम कुछ नहीं कर सकेगी वहाँ सहारा देना है इससे मुझमें गुस्सा भी भरा था लेकीन बाद के सालों में मैंने अपने चिंतन के स्तर और बात को समझने की गहनता को पहचाना तब पिता का कुम्हार कर्म और उनके प्रत्येक व्यवहार का मर्म समझ आया।

परीक्षा के दिन चल रहे थे लेकिन “डैडी” फ़िल्म साथ में देखने बोले पापा। इस फ़िल्म का कक्षा आठ नौ के दिनों में मेरे ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा था।

मेरे लिए कभी भी पापा साधारण व्यक्ति नहीं रहे हैं। उनका व्यक्तिव इतना भव्य रहा है कि समय समय पर उनसे मिलने पर उनको उम्रदराज़ होते देखने से मेरा दिल बैठ जाता है। यह वही एहसास है जैसे कुछ कुछ समय बाद दादी माँ को पकड़ कर होता था। समय के आगे बढ़ने का भारीपन।

पापा ने जीवन में जो किया किसी आकाशवाणी को पूरा करने जैसा अतुलनीय किया जिसके आधार पर उन्हें सुख और दुख दोनों अतुलनीय मिले होंगे।

बहुत सारे व्यक्तित्व का वास है उनके भीतर। उन्होंने लीक छोड़ कर जीवन जिया।

मुझे हमेशा ऐसा प्रतीत हुआ कि एक समय के बाद सब कुछ समेटने के लिए वे बाँध बन गए और इस प्रक्रिया में उन्होंने खुद के बहाव और फैलाव दोनों का परित्याग एक पारिवारिक जीवन के लिए किय्या है। यह बहुत बड़ा त्याग है।

वे चाहते तो केवल अपने जीवन का निमित्त खोजने की यायावरी अपना सकते थे परन्तु इससे इतर उन्होंने रामचरितमानस को ओढ़ लिया और परिवार समेटने के चिंतन को ही हमें भी समझाया। हम सभी उनका अनुसरण करते हैं।

यह कत्तई आवश्यक नहीं कि एक व्यक्ति जो पिता है वो स्वयं को वैसे ही देखे जैसे उसकी कोई संतान उसे देखती है। यह भी कत्तई आवश्यक नहीं कि एक संतान जैसे अपने पिता को देखे पिता के व्यक्तिव को उसके अनुकूल होना चाहिये। किसी भी व्यक्ति के भीतर का इष्ट हम चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी तरह का होने के लिए स्वतंत्र है।

सोच की सारी स्वतंत्रताएँ
मेरे पिता ने मुझे दी
और कहा है
कि देखो खुले आकाश के नीचे
खुद को समेट पाओ
तो और अच्छा लगेगा
एक पूरा शहर बसाओ
औरों की दुनिया भी सजाओ
तो और अच्छा लगेगा
तुम्हारा पढ़ना लिखना
तुम्हारे सुंदर परिवार
औऱ बच्चों की परवरिश में भी
काम लाओ तो और अच्छा लगेगा
आगे तुम्हारी मर्ज़ी।

एक बार में एक ही साध करना क्योंकि
एकय साधय सब सधै सब साधय सब जाय।
जीवन में कोई बात जो तुमको लगे कि
छुपानी पड़ेगी वह कभी मत करना
ऐसे ही गलत और सही में अंतर पकड़ना
लिखने से पहले हर बार सोचना कि कहीं!
तुम कविता लिखने की फैक्ट्री तो नहीं बन रही
औऱ पढ़ना सामने आई हर किताब
कोई भी अख़बार प्रचार और पेम्फलेट भी
हर तरफ भरा मिलेगा सामान्य ज्ञान
क्योंकि तुम्हारी अवलोकन क्षमता
तुम्हारी बुद्धि से होनी चाहिये अधिक प्रबल
सुनना सबकी निर्णय अपने लेना
सबके हित में लेना
खुद को भी प्राथमिकता देना
तुम्हारे शार्ट टर्म गोल्स
तुम्हारे लांग टर्म गोल्स
सब लिख लेना ,
लेकिन एक बार रोज़ हिंदी में
डायरी ज़रूर लिखना
छूटनी नहीं चाहिये पकड़ देवनागरी पर
दिमाग को आगे भी
आते रहना चाहिये
लिखना हिंदी अक्षर
वही तुम्हारी पहचान होगी
नितांत नए परिवेशों में
सुंदर बिम्बों के लिए
रामचरितमानस पढ़ना
कोशिश करो और सीखो
हिंदी गीत लिखना
सीखो परिवार को
सुंदर अनुशासित जीवन देना।

Pragya Mishra

मुम्बई , 20 जून 2021

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