पता नहीं क्यों पर अक्सर ऐसा होता रहता है, ऑफिस हो या घर, अपने दिमाग से भलमनसाहत से सोच कर लिया कोई निर्णय बड़ा बैक फायर कर जाता है। उसके ऐसे ऐसे परिणाम आते हैं जो सोचा भी नहीं होता और सामने वाला है कि लगा पड़ा होता है डाँटने कोसने में : “ऐसा सोचा कैसे” , “ये लिखा कैसे” , “ज़रूर ये चल रहा होगा” , “अच्छा बनने की कोशिश है सब” , “मेरे कहे कि बावजूद ऐसा किया कैसे” वगैरह।

फिर तानाशाही किस्म की प्रवृत्ति हावी हो जाती है, दूसरे के दिमाग से किया गया काम रद्दी है, ट्रेश है , सिखाने के नाम पर शुरू होता है तोड़ने का सिलसिला।

घरों में भी होता है, कार्यालय में भी होता है। डाँट डाँट के पहले आत्म विश्वास तोड़ते हैं फिर प्रेशर बनाते हैं कि यह भी नहीं हो रहा इतना भी नहीं हो रहा। फिर समूह के सामने हँस कर पहले मज़ाक बना कर अचानक डैमेज कंट्रोल की देखो मैं तो आपका भला चाहती/चाहता हूँ तो इसे अपने निजी/कार्यक्षेत्र में एक सीख की तरह लो।

माशा तोला व्यवहार जान लेवा होता है। जहाँ छोटी छोटी बातों को घर या कार्यालय में जीवन मरण का बना कर “हायराम यह क्या कर दिया तुमने” के हालात में रखा जाता है। यह व्यवहार दम घोंटू है। इसमें कोई मेटल ग्रोथ नहीं, मेंटल पीस नहीं। बस दिन काटना होता है। अधर में लटके वाला स्वाद सारे दिन मूँह में रहता है जिससे निकलने के लिए कभी कॉफी, कभी चाय तो कभी चॉकलेट। वज़न अलग बढ़ता हैं। बाल भी खूब झड़ते हैं।

कोरोनाकाल में जब अधिक से अधिक घर ही में रहना है ऐसा कुंठित अधर में लटका कर डाँटते धमकाते रहने वाला व्यवहार अपने परिवार के लोगों के साथ भी हो सकता है और एम्पलॉई – बॉस के बीच भी हो सकता है।

बार बार खुद को याद दिलाने की ज़रूरत पड़ सकती है। मज़बूत हो, सब ठीक है, पानी पी लो, यह भी गुज़र जाएगा, थोड़ा प्रेशर है , ठीक है , अब तुमने डाँट ही दिया है तो क्या कर सकती हो , जाओ गले लगा कर गोदी उठा कर प्यार करो। लेकिन ये दम घोंटू चक्र चलता रहता है क्योंकि कोई न कोई कहीं न कहीं किसी और का बनाया दबाव किसी और पर ज़ाहिर कर के आ रहा है।

Pragya Mishra