आज मैंने मेरा लेखन नाम तय कर लिया -पद्मजा

प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’ ।

जब मैं छोटी थी, एल. के. जी. से कक्षा तीन तक पटना गांधी मैदान के क्राइस्ट चर्च में पढ़ती थी। तब मेरा नाम “प्राची पद्मजा” हुआ करता था। यदि उस समय के मेरे मित्र आदिल, सनोबर, सबा, सदफ़, माज़िद, पल्लवी मुझे कभी मिलेंगे तो उनको प्राची पद्मजा ही मालूम होगी। यूँ तो उनका मिलना औऱ मुझे पहचानने की बात करना कोरी कल्पना है, फ़िर भी, मेरी तरफ स्मृति बनी रहती है। वे एक अधूरे छूटे बचपन की कड़ी थे, जिसको पूरा जीने की चाह में याद अटक गयी।

1994 में दिल्ली शिक्षा भारती पब्लिक स्कूल पालम हवाई अड्डा के कक्षा चार में बोर्डिंग स्कूल में दाखिला करवाया गया तब मुझे नया नाम दिया गया था – “प्रज्ञा झा”, जो स्काउट गाइड की बुलबुल प्रज्ञा झा थी। 1996 के बाड़मेर केंद्रीय विद्यालय जलिप्पा कैंट में कोई विशेष नाम नहीं दिया गया। 1998 से दरभंगा के केंद्रीय विद्यालय हवाई अड्डा में जेट फाइटर प्रज्ञा झा रही, यह नाम मनीष ने दिया था, मैं अधिकतर मूँह सड़ा के बैठी, बड़ी दीदी कोई लड़ाकू विमान किस्म की छवि में ही नज़र आती थी।

फ़िर साल 2010 में समय ने फिर मुझको के नयी पहचान दी – “प्रज्ञा मिश्र”।

सारे संस्मरणों को जोड़ दूँ तो लगता है “पद्मजा” जोड़ लेना बेवजह नहीं रहेगा कुछ अपना छूटा साथ चलेगा।

मिलिंद सोमन जिस उम्र में मेरे क्रश थे उस समय उनका एक गाना मुझे बहुत भाता था

यूँ तो प्यार के नाम पर ये सब हुआ है
अब ये प्यार भी हो जाये बस इतनी दुआ है

मतलब यही कि कुछ गंभीर लेखन अब हो भी जाये तो नाम रखने रखाने वाले टंटे-बंटेके साथ न्याय हो।

अपने बारे में बात करना आत्म श्लाघा होती है पर फिर मैं बूढ़ी होकर सब भूल गयी तो।ये सब कौन दर्ज करेगा यही सोच कर लिख लेना ही उचित है।

प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’