मैंने कहानी नहीं लिखी। निबंध भी खुद पर एहसान करने लायक लिख कर केवल परीक्षा पत्र भरे हैं। अभी शोध अपना किया नहीं। लेकिन करना है।

मैं अक्सर देखती हूँ, पीछे मुड़कर कि मैंने कहानी क्यों नहीं लिखी। क्योंकि मैनें कहानियां पढ़ी नहीं।

क्यों नहीं पढ़ी। क्योंकि साहित्यिक कहानियां मेरे भीतर का आक्रोश अपने सच के साथ ऐसे बाहर ले आती थीं कि मैं रुंआसा महसूस करती।

नई उम्र के दौरान मुझे लगता था ये मद्धिम पंखों का आर्ट फिल्म, ये सूती सारी के उजाड़ चूल्हे , मैली इमारतें, चुप्पी, बोझिल कथानक, टूटन ये बिखराव, अजनबीपन ये सब मेरे भीतर इतना है कि पढ़कर रुलाई ही आएगी।

मैं यह नहीं समझती थी कि वह सब साहित्य पढ़ने से बह जाएगा।

मैं इन्फॉर्मेशन तकनीक की यांत्रिकता में जिस एकाकीपन को ….”हे! या…वास्सप ..हाऊज़ यू ..एम फाईन” के टेक्स्ट एस एम एस में भुलाए का रही थी वह तो घर बना कर बस गया था।

वस्तुतः साहित्य को दूर नहीं करना चाहिये उसे जीवन से लगा कर रखना चाहिये। यही प्रवचन है, विद्वान का सान्निध्य है, विकार मुक्ति है।

साधारणीकरण और कुछ नहीं बार बार खुद को आइना दिखा के बह जाने की कला है। पात्र में खुद के पहलू देखे। एक रोज़ किसी दिन या कि बचपन में हुई घटना का उत्तर मिला, अपने भीतर गहरी सांस ली, हँस लिए या रो लिए, और ताज़ा हो लिये। मैं कोशिश करूँगी कि मैं भी कहानी लिखूँ।

एक शहर में अब कुछ नहीं , शहर शहर घूमने में बहुत कुछ है और उससे भी ज़्यादा बड़ा एक दिन एक गाँव का है।

सुख़नवर पत्रिका के अनवारे इस्लाम जी से एक रोज़ बात हो रही थी वो कह रहे थे, प्रज्ञा आपके पास तो मैथिली का लोक साहित्य है, जीवन वहीं है वहीं जाईये शुरआत लोक साहित्य से कीजिये, उसे पढ़िए, वहाँ शब्द हैं, बिंब हैं पहले उससे भरना है ।

पापा से, पूर्णियाँ में साल 2020 के नवम्बर में भेंट हुई थी, उन्होंने कहा बेटा राम चरितमानस पढ़ो। लिखना है तो ऐसे लिखो कि तुम्हारा भोगा हुआ यथार्थ अपने बिम्बों में हर किसी का जीवन छुए।

मैंने देखा है लिखने वाले सभी बड़े क्रांतिकारी हैं, उनके अपने बड़े उसूल हैं।

अभी मेरे उसूल बने नहीं।

मैं तो बस सब ठीक है अच्छा है, हम भी ठीक हैं तुम कैसी हो करती हूँ।

देखती हूँ। मेरे उसूल क्या हैं।

जैसे भगवान इतने चेहरों में हर चेहरा अलग बनाते हैं , वैसे मेरे भी भीतर एक अलग सिग्नेचर तो दिया होगा, जैसे बड़े चित्रकार के चित्रों में देखकर लग जाता है कि उनका सिग्नेचर है, कि वैसा कोई नहीं बनाता, ये उनकी ही बनाई हुई है , जैसे किसी बड़े कवि को पढ़ कर लग जाता है उन्होंने ही लिखी होगी। वैसे ही लिख कर जाना लगभग हर किसी का सपना होगा।

एक वड़े विचार तक आने के बाद

तीन बातें चाहिये:

इच्छा
शक्ति
और साहस

प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’

20 अगस्त 2021