त्योहारों के देश भारत और गुम्फित कथाओं के देश भारत की मैथिल माटी का पर्व “चौरचन”भी आज ही मनाया जाता है, जिसमें हम चंद्रमा के कलंक का निवारण कर के संतति को दोष मुक्त रखने का उपाय करते हैं ।

मिथिला में गणेश चतुर्थी को चौरचंद के रूप में मनाया जाता है।इस दिन पूरे भारत मे लोग चांद नहीं देखते।गणेश जी के शाप के कारण।किन्तु मिथिला में हाथ मे दही और फल लेकर चांद को इस दिन देखने की परंपरा है।

स्कन्द पुराण के अनुसार एक बार भगवान कृष्ण को चतुर्थी के चाँद देखने पर झूठा कलंक लगा था। परंतु भगवान श्रीकृष्ण ने ‘सिंह: प्रसेनमवधिस्सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमार मन्दिस्तव ह्येष स्यामन्तक:।।’ इस मंत्र से चंद्र दोष से मुक्ति पाया था। एक अन्य कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश को देखकर चंद्रमा ने हँस दिया। जिस पर गणेश जी ने चंद्रमा को शाप दिया कि जो आपको देखेगा उसे कलंक लगेगा। इसके बाद चंद्रमा भाद्रपद (भादो) शुक्ल चतुर्थी पर गणेश जी की पूजा की। फिर गणेश जी ने उन्हें कहा कि अब आप निष्पाप हो गए। मान्यता है कि जो मनुष्य ‘ सिंह: प्रसेनमवधिस्सिंहो… इस मंत्र से चंद्रमा के दर्शन करता है उसे झूठे कलंक से मुक्ति मिल जाती है और सभी मनोरथ पूरे होते हैं।

चौरचन पूजा रोहिणी नक्षत्र में करना सबसे शुभ माना गया है।

रोसड़ा, बिहार से मेरी भांजी आराधना झा ने सुंदर छवियाँ भेजी हैं, जिनमें डाला सजा है, चन्द्रमा की प्रतीक्षा है, ननद किरण दीदी चन्द्रमा को दही फल आदि दिखा रही है , घर के सभी बारी बारी से दिखाएंगे, हाथ में फल लेकर देखना है, या नहीं तो दधिपात्र लेकर।

आलोक जी, मैंने और बच्चों ने मेरी सास को प्रणाम किया, उन्होंने चौरचन पाबैन का व्रत रखा हुआ था आज के दिन 2018 तक मुंबई में हमारे घर में रौनक रहती थी, पिछले तीन वर्ष से चौरचन गाँव में ही मन रहा।

आज दिल्ली से जेठानी जी आभा मिश्र, दिल्ली से ननद विभा दीदी, दरभंगा से ननद गीता दीदी, मुंबई से ननद सुषमा दीदी, उनके बेटे मिंटू , सहरसा से जैधी सोमा सबके साथ विडीओ कॉल पर कुशहर से चाँद देखा और मम्मी जी ने दोष निवारण की पूजा की।

हमारे हिस्से का सब कष्ट माँएँ हमेशा खुद ही उठा लेतीं हैं जाहे जीतवाहन का निर्जल व्रत हो, चाहे छठ की कड़ी तपस्या हो या चौचंदा। हर कथा और कथा सार में आया दुख दोष कष्ट या चिंता की रेखाएं माएँ खुद तक रोक देती हैं।

चौरचन गीत 1

मेघ दोग सँ हुल्की देथिन
रोहणि संगहि चान
चौरचन पाबनि केर विधान।

भरि मिथिला के पाबनि नामी
हाथ उठाबथि काकी मामी
अरिपन कलश और कुमुदिनी
माँड़ड़ के ओरियान
चौरचन पाबनि केर विधान।

भोगक खुब सनगर विन्यासे
खजुर पिरिकिया एक्कर खासे
ओलक चटनी भुजिया झिमनी
दही तकर प्रमाण
चौरचन पाबनि केर विधान।

देह समांग दियौ हे देवता
फल हाथे मणिकांतो देखता
अँगने अँगने सबतरि होबय
अपने के सम्मान
चौरचन पाबनि के विधान।

-मणिकांत झा, दरभंगा, १९-८-२०

तस्वीर – रोसड़ा से

चौरचन, रोसड़ा, बिहार

this is a maithili folk song written by maithil poet Manikant Jha. He lives in Dharbhanga, Bihar, India.

I have given my voice to the song and tune developed by Shri Manikant Jha. 

Image used in this podcast is taken during Chaurchan Festival 2021 in Rosra, Bihar. Photo has been clicked by my niece Aradhna Jha. In this photo my sister in law Smt. Kiran Devi is worshipping the tarnished moon for well being of progeny there by ensuring that no bad name ever comes on anybody in the family due to effects of tarnished moon ….its based on indian mythological stories.

Listen Podcast1

चौरचन गीत 2

भरि मिथिला के पाबनि चौरचन
अजगुत एकर विधान छै
सांझ पड़ैते पूजल जाइ छथि
उगल चौठी चान छै।

पान फूल आ फल सजल अछि
सुंदर बाँसक डाली
पाकल केरा नारंगी संग
सेवक देखू लाली
अगबे दुधक तस्मय बनलय
दही सर्व प्रधान छै
सांझ पड़ैते पूजल जाइ छथि
उगल चौठी चान छै।

मिठका पूरी ओ दलिपुरी
खजुरी और पिरिकिया
खोआ सुज्जी दूनू भरल
गूहल रहय औंठिया
अंकुरी फेंटल सागो बनलय
सबहक लागल ध्यान छै
सांझ पड़ैते पूजल जाइ छथि
उगल चौठी चान छै ।

पोखरि माँझक फूल कुमुदिनी
आनथि सब जोगाय
बीचहि आँगन पूजा होबय
मांड़ड़ सहित भंगाय
मणिकांतक नयना तिरपित
पूरल सब अरमान छै
सांझ पड़ैते पूजल जाइ छथि
उगल चौठी चान छै ।

-मणिकांत झा, दरभंगा, १७-८-२०


चौरचन गीत – भरि मिथिला के पाबनि
स्वर- स्वेता कुमारी
रचना – मणिकांत झा

चौरचन गीत 3

चौरचन के पिरिकिया
बनल छैक बेजोड़
साँझे उगलै चन्ना
सब दिस भेलै इजोर।

खजुरी टिकरी ओ दलिपुरी
सजबी दही भरि मटकूरी
अरिपन पारल गेलय
देखैत खूब बेजोर
साँझे उगलै चन्ना
सब दिस भेलै इजोर।

केरा पात पर तस्मय मांड़़र
अनमन जेना पड़लय पातरि
रोहिनी संगहि अयलनि
चंदा चान चकोर
साँझे उगलै चन्ना
सब दिस भेलै इजोर।

सेव समतोला केरा नारियर
साग गेन्हारी हरियर हरियर
मणिकांतक अत्मा तिरपित
मिथिलाक पाबनि शोर
साँझे उगलै चन्ना
सब दिस भेलै इजोर।

मणिकांत झा, दरभंगा, १६-८-२०२०

चौरचन गीत – चौरचन के पिरिकिया
स्वर- स्वेता कुमारी
रचना – मणिकांत झा