ओडिशा

क्या हम इस बारे में पढ़ रहे हैं कि ओढिशा हर साल अपना 5km क्षेत्रफल समुद्र में गंवा रहा है, कि ओडिशा को अपना नक्शा फिर से बनाने के लिए तैयार रहना चाहिये!

इतना कुछ केवल जलवायु परिवर्तन के कारण!

एक विचित्र संरचना की ओर इशारा करते हुए
ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले के सतभाया गांव की निवासी प्रमिला बेहरा कहती हैं ,” यह 6 मीटर लंबा हैंडपंप समुद्र के बढ़ते प्रकोप का प्रमाण है।
पिछले एक साल में, बंगाल की खाड़ी ने तटीय गांव से जमीन के टुकड़े धो दिए हैं और अब पंप का पानी का सिलेंडर, जो ज़मीन के नीचे रहता था, समुद्र तट पर उजागर है।”

सतभाया निवासी का कहना है कि पिछले दो दशकों में बंगाल की खाड़ी ने उनके गांव में 10 ट्यूबवेल निगल लिए हैं। (क्रेडिट: आशीष सेनापति)

क्या हम उस पीड़ा को समझ सकते हैं जो एक ऐसी ज़मीन के कागज़ात पकड़ कर या टैक्स भरकर उतपन्न होती है जो अब है ही नहीं ?

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुस, चून।।

चेन्नई और पंजाब के वाटर टेबल समस्या को पढ़ते पढ़ते यह पीड़ा दायक प्रथा भी नज़र आयी जिसे कभी पहले एक डॉक्युमेंट्री में देखा था।

डेंगनमाल

महाराष्ट्र राज्य के एक गाँव में, कुछ पुरुष यह सुनिश्चित करने के लिए फिर से शादी करते हैं कि उनके घरों में पीने का पर्याप्त पानी है। ये महिलाएं, जिन्हें ‘वाटर वाइफ’ के नाम से जाना जाता है। पश्चिमी भारत के डेंगनमाल के सूखे गांव में नल नहीं हैं। पानी ढोने का काम इन औरतों का होता है।

तेलुगु कहानी “प्राणधारा” में भी पानी लाने वाली सभी औरतें ही दिखाई गयीं थीं।

इस विषय को अपनी एक कविता के चिंतन में भी रखा है।