मुझे मेरी सास (मम्मी जी), और भांजी आराधना के साथ दीपावली मनाने की आदत है , इस बार भी दोनों ही नहीं थे, उत्साह में कोई कमी नहीं रही लेकिन मुंबई का एक छोटा सा घर इस दीपावली पर बहुत खाली लग रहा था। हमने दीपावली के सारे काम नियम पूर्वक वैसे ही किये जैसे करने चाहिए, फ़िर भी कमी लगी। कितने साल छठ भी मुम्बई में हुई, पर इस साल छठ कुशहर में ही होगी। मम्मी जी ने कहा है वे फरवरी में आएंगी। छोटी भी अगले हफ़्ते आएगी। कॉलेज जल्दी खुलें फिर मेरी छोटी बहन इप्सिता भी यहाँ से ही पढ़ेगी।

हमने हर बार की तरह हमारी क्लास बेंचमार्क में भी पूजा पाठ किया। क्लास के तरफ़ आलोक सर ने काफ़ी मेहनत की है, आस पास का इलाका साफ़ करवाया ताकि अपनी जगह पर अच्छा प्रभाव रहे। सामने के पीपल पेड़ को, ईंट से घेराव करा के मिट्टी डलवा डलवा के अच्छा भरा बनाये रखने की कोशिश भी कर रहे ताकि वहाँ लोग कचरा न डालें। वो वहाँ एक बोर्ड लगाएंगे।

“कचरा टाकू नए”

आलोक जी कविता नहीं लिखते लेकिन सब प्राणी की भाषा समझते हैं। उनको बड़ा दुःख होता है यह देख कि किस तरह ठाकुर व्हिलेज में पेड़ों के जड़ सीमेंट से पाट दिए गए हैं, ऐसे पानी नहीं पहुंचता और पेड़ खुद ही मर जाता है।

पेश है हमारे ट्यूटोरियल से कुछ तस्वीरें।

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आज दीपावली का भोग, गुलाबजामुन, चावल की खीर, मखाने की खीर, नारियल लड्डू।मखाने का खीर खास कर के। मखाना lotus seed को कहते हैं, लक्ष्मी जी कमल पर विराजित रहती हैं, कमल उनको चढ़ाया भी जाता है।

भोग प्रसाद