शहीदों के मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले… वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा…
13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले को याद करते हुए..

मैं 10 वीं में थी .. दरभंगा में हराही पोखर के पास रहती थी। उस दिन Mishra सर की मैथ क्लास से लौटी ही थी, हमारी क्लासेस एकदम ठिठुरती ठंड में शुरू होती ।

उस दौरान केबल टी. वी. में मुझे बस न्यूज़ चैनल देखने चलाने की अनुमति थी… यूँ ही टी वी ऑन था .. मैं घर ठीक ठाक कर के बस ऐसे ही कुछ कर रही थी कि अचानक अरुण अंकल बाहर से दौड़ते घर में आये, उन्होंने कहा न्यूज़ खोलो कुछ तो हुआ है, उनको हड़बड़ाया देख मैने भी टी.वी. की तरफ देखा भीतर तक सहम बैठ गयी, हमारे देश में संसद भी सुरक्षित नहीं थी।

संसद भवन में चल रहे हमले का एक चौंकाने वाला लाइव टेलीकास्ट था … यह एक आतंकवादी हमला था, मुझे समझ आया कि हमारे भारतीय गार्ड बहुत कम हथियार लिए हुए थे , फ़िर भी एड्रीनलीन रश में वे बहादुरी से लड़े पूरे प्लान जो विफल कर दिया , शहादत से पीछे न हटे न डरे न भागे उन्होंने उन लोगों को बचाया जिनसे उम्मीद है कि एक दिन भारत का भाग्य बदल देंगे।

उस दिन के बाद मुझे आतंकवाद पर लिखे सारे निबंध खोखले लगने लगे थे। यह गरीबी और बेरोजगारी के कारण नहीं बढ़ती, यह राजनैतिक लोभ सत्ता हरण के लिए बढ़ती है। फिर मैंने परीक्षा में ब्रेन ड्रेन या त्योहारों पर निबंध लिखा लेकिन आतंकवाद पर लिखना छोड़ दिया क्योंकि उस उम्र में यह समझ आ रहा था कि जो दिखाया जाता है वह सतही है और धोखा है। सच सिर्फ़ ये है कि किसी भी हमले में जान उसी निचले आदमी की जाएगी जिसपर पूरा परिवार निर्भर होता है।

प्रज्ञा मिश्र