साल ख़त्म हो रहा है, उम्र निकल रही है, नया दिन आ रहा है, वक्त चला जा रहा है, जिनको रुकना चाहिए था उनका भरोसा टूट गया, जिनको नहीं होना चाहिए था वो जम गए, जिनसे कोई मतलब नहीं बातें उनसे होती रही, जो सबसे पास होने थे वो सबसे दूर चले गए, क्या जाने वहाँ से कोई देखता है भी या नहीं या कि वहम की बातें हैं।

सोचा कि सब नियम से करना है , नियम से उठना सोना और एक दिनचर्या बनानी है कि तभी हवा में मरघट की ठंडी सनसनाहट सी दौड़ गयी हमने सबने परिजनों के हाथ पकड़ लिए यूँ ही घर घर चाय बनती रही, लोग आते रहे, बिना संवाद गहरी गहरी साँस लेकर जाते रहे जाने क्या मसला हो किसकी ज़िन्दगी में, कोइ पूछता नहीं, कोइ बताता नहीं। दिल सबके एक से भारी थे। माहौल एक सा भारी था। मदद करना भी गुनाह था। न करना भी गुनाह था।

जश्न मनाए गए, शादियाँ हुईं, जन्मदिन हुए, कहीं कहीं तो कुछ हुआ ही नहीं, कहीं कहीं कुछ बचा ही नहीं । इतनी विषमता कि कोई अमीर होकर विदेश चला गया कोई पागल होकर सड़क पर आ गया। लक्ष्मी किसी के घर रच बस गयी किसी के घर काम करा करा कर मार दी गयी।

आदमी घर पर ऐसे जीने लगा है जैसे हाइवे पर रात में बैठकर समय गुज़ारता था, एकदम खाली! दिमाग बैंकएकॉउंट जेब पर्स, पर्स का हर पाकिट, सब खाली , खड़े खड़े खुद के होने का प्रमाण ही टोटल लेता है अब। सामने फटाक से जाती गुज़रती गाड़ी को देख कर गर्दन घूम कर बच्चों पर लौट आती है।

कहने को नहीं है कुछ, कोई आश्वासन नहीं है, यह युद्ध कौन किससे लड़ रहा है, बात बात से लड़ रही , या बतंगड़ बतंगड़ से लड़ रहा है। बात तो अच्छी होती है, बुरे होते हैं बातों के बतंगड़। इसमें कोई दुविधा तो नहीं लेकिन हम सभी जो खाली समय के बर्तन बनते जा रहे हैं हमारे अध्यात्म के घुन पर कौन सा पेस्ट कंट्रोल ऑर्डर होने वाला है और कौन ऑर्डर करने वाला है , नहीं शायद नया वर्ल्ड ऑर्डर और इसका आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस मेरा तुम्हारा हमारा सब कुछ तय करने वाला है।

किस बात कि शुभकानाएं दूँ, रिश्ते टूटे हैं, दिल टूटा है, घर टूटे हैं, लोग अकेले नहीं अधमरे हैं, बिस्तरों पर गलतफहमियों की कहानियाँ हैं, पर्दों में दबी चीख है, भीतर गुबार भरा है क्या ही साल गुज़रा है। कोई हर बात में मध्यमवर्गीय होकर
” हाँ जी बेटा जी बहुत अच्छे और सब ठीक मम्मी ठीक जी पापा ठीक जी भैया बाहर गए हां दीदी डॉक्टरी कर रही वाह वाह बच्चे बहुत अच्छे ” यह सब कब तक करने का माद्दा रखता है। कभी तो सचमुच मुझे अकेला छोड़ बोलने का मन करता है। करता है , हम्म।

जाने वाले साल , तुमको शुक्रिया ,अच्छा बुरा जो दिया अब तो बीत गयी सबने झेल लिया अब तुम कर भी क्या सकते हो, तो तुम जाओ। बाई।

अलविदा २०२१
प्रज्ञा मिश्र