धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है ज़ुल्म
धीरे धीरे घटता जा रहा है डर
क्या कर लेंगे आखिर
ये हिन्दू मुसलमान की लड़ाई
तो कभी थी ही नहीं
तब भी नहीं
और आज भी नहीं
ये लड़ाई है
सत्ता में बने रहने की
अपना कर
अलोकतांत्रिक हथकंडे
जब तक चल सके
उतने दिनों तक।

सबसे मजबूर है आम आदमी
रखता है बांध कर उम्मीद व्यवस्था से
रुँधे गले से बोलता बताता है
आपना कुचला हुआ मन
मत संभालो उसे चीखने लगेगा
कभी भी रो पड़ेगा
तुम्हे पकड़ लेगा
बस मुट्ठी का भर का सीना है उसका
और घुटन नाक आँख गले तक।

-प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’