सही मायने में हर व्यक्ति अपने आप में इस धरती पर अपने नाम का एक मात्र उदाहरण है। हमारी सोच की उड़ान हमारी मानसिक परतंत्रता रोके रखती है, बहुत कम लोग सही मायने में आज़ाद हैं। हम आप ऐसे मुट्ठी भर आज़ाद लोगों को देखते हैं विस्मयादिबोधक आदि वाक्यों व्यवहारों से उनकी प्रशंसा करते है। ऐसे लोगों की हर बात जुदा लगती है उनके शब्द पहनावा बातचीत पसंद नापसंद सब ट्रेंड सेटिंग जैसा। पर ये लोग बहुत सारा त्याग कर के और बहुत ध्यान केंद्रित कर के अपनी मौलिकता तक आते हैं यह आसान नहीं और ज़रूरी भी नहीं कि एक जीवन में मिल जाये। अपने मौलिक गुणों की पहचान एक निरन्तर प्रक्रिया है।

यूँ तो हम में हर कोई जो चाहे वो हो या पा सकता है, पर फ़िर भी न जाने क्यों सुविधाओं से लैस समाज में चहनाओं की बेल काट की जाने वाली परवरिश में संतति कमा खा ले कुछ बन जाये उतना ही काफ़ी है। लोगों को मौलिक होने के बजाय कमाऊ होने के लिए बाध्य किया जाना ऐसी परिस्थिति उत्प्न्न कर देना जिसमें केवल आर्थिक पर्तिस्पर्धा को जगह मिले ,यह बहुत ही घातक है शोध करने की प्रवृत्ति और वैज्ञानिक प्रगति के लिए।

अपने मतों और विचारों को लिखने के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, शोध करने में लगने वाले समय और संसाधन के जुटान से भय नहीं खाना चाहिए। हमने विश्व साहित्य पढ़ते हुए ऐसे कितने उदाहरण देखे हैं जो सैकड़ों वर्ष पहले लिखे गए, बहुत समय लेकर लिखे गए, भुला दिये गए, फिर वर्षों बाद किसी ने बड़ी दीवानगी से उसे खोज निकाला उन्हें पढ़ा दुनिया की विभिन्न भाषाओं में उन महान विचारों के अनुवाद शताब्दियों बाद पहुँचे। अपने आप से जो ईमानदार रहा वही मौलिकता का झंडा गाड़ कर धरती सूरज रहने तक अमर हो सका है। अपने सच को खोजने वाला यात्री इस दुनिया में अवतार के नाम से जाना गया है।

प्रज्ञा मिश्र