मैं बेलूर मठ जून 2010 में गयी थी। लेकिन उस समय मुझमें वैसी गम्भीरता या समझदारी नहीं थी कि “यात्रा वृत्तांत” आदि कुछ लिख कर सहेजा जाए बस आलोक जी के साथ देख आयी थी, अच्छा लगा था, पिक्स क्लिक कर लिए, मठ में ऊपर नीचे टहल लिए, नदी किनारे बैठ लिए, कोई किताब सबसे पतली वाली खरीद लाये, कोई माला, चाभी छल्ला मिला तो और ज़्यादा चाव में खरीद लिया, उस समय यही मेरी समझदारी थी।

मुझे मालूम ही नहीं था कि मैं इतनी महान ज़मीन पर हूँ तो इस मोमेंट का दस्तावेज सहेज लूँ । तब यूनीकोड हिंदी भी नहीं थी कि चार लाइन फेसबुक पर भी लिख कर सहेजी हो। हां पर यह याद है कि वहाँ का वातावरण अद्भुत था। ठंडा था। कमरों में बहुत कुछ यथावत रखा हुआ था जिसे देख देख अचरज में थी। अब तो फिर जाना होगा।

बचपन से जिन स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श माना है उनके जन्मदिन पर उन्हें प्रणाम। स्वामी जी की तस्वीर पटना में मेरे बचपन वाले घर में बाहर ड्राइंग रूम की खिड़की के बगल टँगी रहती थी, वह छवि मेरी आँखों के सामने मेरे बचपन के दौर में 24 घन्टे रही क्योंकि हर समय बिजली नहीं रहती थी, डीडी के कार्यक्रम जब अच्छे वाले आते थे तब लाइट चली जाती, और डीडी2 या ज़ी टीवी भी नहीं था ले दे के दीवार देखने से बेहतर स्वामी जी की तस्वीर देखना था, भव्य छवि जिसके प्रति मन मृत्यु पर्यंत श्रद्धा से भरा रहेगा। इससे इतर मैं तीन कमरे में घूमती रहती, घर में बहुत किताबें थीं, दोपहर में खिड़की से हाथ बढ़ा कर क्वालिटी ओरेंज कैंडी मिल जाना दूसरी अच्छी बात थी।

प्रज्ञा मिश्र
१२-०१-२०२२