आप फ़िल्मों के दीवाने हैं तो आप हर तरह की फ़िल्म एक बार ज़रुर देखते हैं, मैं भी ऐसी ही हूँ, लेकिन लटको झटकों से इतर मुझे पुष्पा कुछ अन्य कारणों से अच्छी लगी, जिसका पूरा विवरण मैं यहाँ दे रही हूँ, आपकी भी राय कॉमेंट में ज़रूर रखें।

मुझे #पुष्पा #फ़िल्म क्यों पसंद आयी

जो काम हम स्वयं नहीं कर पाते या नहीं बोल पाते , वही दूसरे को पूरे साहस के साथ करते या बोलते देखने पर हमारे भीतर पूर्णता का आभास होता है। यही कारण है कि साउथ मुंबई का अल्ट्रा मॉडर्न हो या साधारण गाँव वाले हो दोनो पुष्पा जैसी फ़िल्म एक जैसे पसंद करने लगते हैं।

फ़िल्म का मुख्य पात्र “पुष्पा” निर्भीक है, अति साधारण है, जातिगत पहचान से मुक्त है, मानसिक रूप से आज़ाद है।

गौरतलब है कि उसका यह कहना कि “काम करने को पैसे देते हो या इज़्ज़त देने को” शायद कॉरपोरेट जगत के व्हॉइट कॉलर कर्मचारी भी कहना चाहते हैं, कारखाने का कारीगर भी कहना चाहता है, घर-कामवाली बाई भी कहना चाहती है और एक साधारण वाचमैन भी कहना चाहता है।

आज़ादी का मिथक जो हमारे समाज में घुट्टी बना कर हमें पिला दिया गया है वो आज़ादी वस्तुतः हमारे मन,प्राण,ऊर्जा को मिली ही नहीं है। हम सब डरे हुए हैं, तंत्र से डरे हैं। अंग्रेज़ी स्कूली पढ़ाई का डर, नौकरी का डर, अवैतनिक हो जाने का डर, कायदे का डर, कानून का डर , विजातीय करार दिए जाने का डर, समूह में जगह न मिलने का डर, महत्ता कम हो जाने का डर, पहचान खो जाने का डर , डर के गुलाम हैं हम।

पुष्पा का मनोविज्ञान सीधा आम आदमी को छूता है। डरे हुए बच्चे में अचानक आयी शारीरिक विकृति का दिखाया जाना जो उसका अपना काउंटर बैलेंस है, सर्वाइवल ट्रिगर मैकेनिज्म जो उसकी हैबिट और बाद में स्टाइल बन गया है…
विख्यात होने से शारीरिक अवस्थाएं भी स्टाइल स्टेटमेंट में बदलने लगती हैं।

एक अन्य दृश्य में, अपना नाम, अपना ब्रांड पूछे जाने पर “पुष्पा” बचपन में लौट वही दहशत जीता है, जो उसकी आँखों से साफ़ ज़ाहिर किया गया है कि कैसे एक गबरू जवान अचानक कमज़ोर बच्चा बन कर रोने के कगार पर आ जाता है।

उसके सौतेले भाई के रूप में बार-बार समाज का वो चेहरा सामने आता है जो पीड़ित आदमी (वो जो सामाजिक “नॉर्मल” में फिट नहीं होता) को अपने मौजूदा हालात से निकल पाने के सारे अवसर बन्द करता रहता है ताकि हार कर जान देने सिवा और कोई उपाय न बचे।

एक शोषक, शोषित वर्ग के नैसर्गिक अधिकारों छीन कर उसके आदमी कहलाने का हक भी समाप्त कर देना चाहता है। शोषक अपने सैडिस्टिक प्लेज़र के लिए शोषित आदमी को हर समय कष्ट में ही देखना चाहता है। मैंने समझा है कि यह मनोविज्ञान साउथ की क़ई फिल्मों में काफ़ी दिखाया जाता है।

लाल चंदन अर्जित श्रम है जिसका लूट लिया जाना और सिस्टीम का डर दिखा कर लूट लिया जाना एक सत्य है।

“पुष्पा” का पात्र कुचले हुए आदमी को अपने हक की मेहनत तंत्र से बचाने के लिए दिमाग लड़ा कर तरह तरह के प्रयोजन करने की प्रेरणा देता है।

यहाँ कहानी के रूप में परोसने के लिए ऐसे विषय को चुना गया है जो सत्तर के दशक से फ़िल्मों में हम देखते आ रहे है यानी पुलिस को चकमा देकर माल निकालने की तरकीब। यह हल्का जामा, दूसरी बात की ओर इशारा करता है कि सीधे नहीं उलझो पर अपने आप को बचाकर निकालने की कोशिश करो।

समय के साथ ऐसे कितने ही मामले होते हैं जिसमें नागरिक केवल अपने हक के लिए लड़ते हुए सरकार के हत्थे चढ़ते हैं और बलि का बकरा बनते हैं । ऐसी चूक समय समय पर विरोध का बैकग्राउंड तैयार करती है।

हिंसा, प्रतिहिंसा और मसाला से परे होकर फ़िल्म को देखने से कितने ही रूपक दिखते हैं, प्रतीकात्मकता युक्त क्षण हैं जिनसे आदमी के कमज़ोर जीवन पक्षों का साम्य उभरता है।

कोरोना में अपनी मर्ज़ी का जीवन नहीं मिल रहा। आम लोगों में कितनों को ढंग से जीने रहने कहीं जाने या मन मुताबिक कुछ भी करने को नहीं मिल रहा। रोडवेज़, फ्लाइट, हॉस्पिटल यहाँ तक कि लोकल सोसायटी भी सब पुलिसिया तंत्र अपनाए हुए हैं। एक तरह से हम सभी घटती आज़ादी के सताए हुए हैं।

ऐसे में एक फ़िल्म में आंखों के सामने समाज का सताया अति साधारण आदमी जबराट रूप में अपनी मर्ज़ी का करता दिखता है, भीतर से दर्शक को अपनी मंशा पूरी होती दिखाई देती है।

साधारण पैंट शर्ट वेशभूषा में नाचते गाते प्रेम में रमते व्यक्ति को देख कर भी कितने लोग अच्छा महसूस कर पा रहे होंगे , क्योंकि प्रेम पाने के हक को हमारे “नोर्मल समाज में” स्मार्ट लुक्स और बढियाँ एजुकेशन से जोड़ दिया गया है…. शायद यहीं पर पुष्पा जैसी फिल्में मास अपील करती हैं।

प्रज्ञा मिश्र