कबीर : एक अमीर फक्कड़

कबीर मेरी ज़िन्दगी को जीने की एक प्रथा हैं ,मेरे विचारों के बांध है और मेरे लिए एक जीता जागता शास्त्र हैं वो ,जिनको जितना अंतर्निहित करूं, कम है जितना समझूं, पढूं पहाड़ के समक्ष चींटी सा ही रहा सा लगता है ।

प्रज्ञा-पुरुषो की परम्परा मे संत कबीर का व्यक्तित्व अत्यन्त अनूठा और रहस्यपूर्ण है। वे एकदम सीधे-सादे ओर बेपढे-लिखे हैं; वे फक्कड़ है उनके पास अपना कहने को कुछ नहीं है लेकिन सभी कुछ उनका ही है।
साधना और आध्यात्म की गहन अनुभूतियों की उन्होंने जो व्याख्या की है, वह वेदों और शास्त्रों की सूक्ष्मता को भी हिला दे और सुसंस्कृत अभिव्यक्ति वाले भगवान बुद्ध को भी चौंका दे।

कबीर बेमिसाल हैं, बेखौफ है ,कबीर बेजोड़ हैं, कबीर बुद्ध से ज्यादा सफल हैं अनुभव की व्याख्या में, वेद से ज्यादा सफल हैं। बुद्ध से ज्यादा बारीक बात उन्होने कह दी है।

बुद्ध के उपदेश हमें शून्य की ओर ले जाते हैं ,वो शून्य हो जाने को ही परम तत्त्व की प्राप्ति मानते हैं ,
लेकिन कबीर कहते हैं

सुन्न मरै, अजपा मरै ,अनहद हूं मरि जाए।
राम सनेही न मरै ,कह कबीर समुझाय।।

कबीर

कबीर कहते हैं सब कुछ नश्वर है सिवाय आत्मज्ञान और परमात्मा के ज्ञान के,ऐसी बात करके कबीर अबूझ और बेमिसाल हो जाते हैं , कबीर का दर्शन ,अनुभव का दर्शन है बस। कबीर की बात सारी अनुभव की बात है ,वो दिग्गज पंडितों को भी चुनौती देते दिखाई देते हैं,ऐसे निडर बेखौफ कबीर मेरे मन पे राज करते हैं
वो कहते है कि ज्ञानी ,पंडित सब सुनी या पढ़ी बात करते हैं किंतु कबीर की बात वही है जो उन्होंने देखी या स्वयं अनुभव की है –

तू कहता कागद की लेखी , मैं कहता आंखों की देखी

कबीर

सीधे सपाट ,शब्दों में कबीर अपनी बात रखते हैं ,जो सभी को उनसे जोड़ती है ।
कबीर की सत्य को बोलने की आकांक्षा इतनी प्रबल है कि कभी कभी वे बेहद खतरनाक भी सिद्ध होते हैं ,वो नही सोचते कि सच बोलने से क्या परिणाम होंगे वो बस अपनी बात रखते हैं _

करता था तो क्यों रहा,अब करिक्यों पछताय ।

बोए पेड़ बबूल का,तो आम कहां से खाय ।।

कबीर कर्मों के फल से ही जीवन के पल निर्धारित होने की बात बोलते है,बेबाक शब्दो में ,चाहे किसी को कितनी भी बुरी लगे ,बात है तो सौ प्रतिशत सच ही , इसलिए कबीर को कोई पसंद करे न करे ,नकार नही सकता है ।
कबीर एक अनपढ़ ,लेकिन अनूठे इंसान हैं ,उनके सामने उपनिषद फीके पड़ जाते हैं, वेद दयनीय मालूम पड़ते हैं चूंकि कबीर कोई ज्ञानी, पंडित नही हैं इसलिए उनकी बात विस्तृत नहीं है बल्कि सारगर्भित है, संक्षिप्त है ,बीज की तरह है उनकी बात ,जो ज्ञान रूपी वृक्ष को पल्लवित करती है ,बड़ी ही सरलता और गहनता से।


प्रेम के बारे में कबीर की बात न सुने और समझे ये असंभव सी बात है ,उनका कहना है कि प्रेम ऐसा भाव है जो परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग भी है,ज्ञान का मार्ग प्रेम के मार्ग से ही होकर जाता है ।पोथी पढ़ि पढि जग हुआ ,पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

पोथी पढ़ि पढि जग हुआ ,पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

जो व्यक्ति प्रेम नही कर सकता वो ईश्वर के करीब भी नही जा सकता उसका ज्ञान व्यर्थ है ,ये बात क्या हम सब अनुभव नहीं करते?


कबीर का लिखा एक एक शब्द हमें कहीं न कहीं खुद से जुड़ा हुआ और खुद का जिया हुआ महसूस होता है ।
कबीर का ज्ञान पलायन का ज्ञान नही है ,कबीर ने जो जिया है , अनुभव किया है वही लोगों को बताने का प्रयास किया है कबीर ने इसी जगत में ,लोगों के बीच रहकर ईश्वर की सत्ता उसके प्रेम को पाया है ,उनको साधू बनने के लिए संसार से वैराग्य लेने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी ।


कबीर एक फक्कड़ संत थे उनके पास खोने को कुछ था ही नहीं ,कुछ छोड़ने को था ही नहीं इसलिए उनके कुछ न पाकर भी सब कुछ पास होने की संतुष्टि को हम अनदेखा नहीं कर सकते।


बुद्ध कहते हैं कि मुक्त हो जाओ , शून्य हो जाओ ,ये संसार दुख से भरा है ,
कबीर भी दुखो का सामना करते हुए हो जिए लेकिन उनकी शिक्षा है कि सुख हो या दुख हमे उससे जुड़ने या बचने का क्रमशः , प्रयास नही करना चाहिए, सिर्फ़ साक्षी भाव से रहिए ,हर क्षण हर अहसास को बीत ही जाना है ,वो अच्छा हो या बुरा ,कितनी सही बात है ये ।
कबीर समाज में रहकर समाज की बुराईयों और समाज के ठेकेदारों से तार्किक लहज़े में बात करते हैं कि कोई जन्म से शूद्र या ब्राह्मण कैसे मान लिया जाता है ,वो कहते हैं –जो तू बांभन, बंभनी जाया ,तो आन बात ह्वे क्यों नहिंकराया ।
जो तू तुरक, तुरकनी जाया , तौ भीतर खतना क्यों न कराया ।।

जो तू बांभन, बंभनी जाया ,तो आन बात ह्वे क्यों नहिंकराया ।
जो तू तुरक, तुरकनी जाया , तौ भीतर खतना क्यों न कराया ।।

वो अपनी बात कहने में दो बार नही सोचते , क्योंकि उनकी कही हुई हर बात वास्तविकता से जुड़ी हुई है ,उनके अपने अनुभव से ही सीखा है उन्होंने ,उनकी एक भी बात काल्पनिक ,या कहानी की बात नही है।
कबीर की वाणी , आम मनुष्य की वाणी है उन्होंने मानवता से परे कुछ देखा ही नहीं और न ही देखना चाहा

जो मोहि जाने, ताहि मैं जानौ लोकवेद का कहा, मै मानौ ।

कबीर ने शाश्वत मूल्यों पर ज़ोर दिया है , निष्पक्षतापूर्वक सत्य का उद्घाटन किया है ,प्रेम का संदेश देते हुए कबीर कहते हैं मेरा अनुयायी वही व्यक्ति हो सकता है जो सब चिंता, वासनाओं और देश ,द्वेष को छोड़कर मस्ती में झूम सकता है ,जीवन को अपने अनुभवों से सजा कर उसे खुद की ही शिक्षा से सुन्दर और सफल बना सकता है ,वही मेरा सच्चा शिष्य है ,वही सच्चा ज्ञानी है —

“कबिरा खड़ा बाजार में ,लिए लुकाठी हाथ ।
जो घर फूंके आपना,चले हमारे साथ “।।

कबीर की इन्ही सारी विशेषताओं और उनकी वैयक्तिक विशालता और सरलता की कायल हूं और उनके कहे हुए हर शब्द को स्वयं से जुड़ा हुआ पाती हूं ,कुछ कर पाऊं या ना कर पाऊं कबीर को प्रेम करने वालों की फेहरिस्त में शामिल होने पर गर्वित जरूर महसूस करती हूं ।

“सब धरती कागद करूं , लेखनी सब वनराज ।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए”।।

कबीर का साहित्य असीमित है , अपरिमित है ,कितना भी पढ़ें ,कितनी भी पुस्तकें इकठ्ठी कर लें , अछूता सा ही रहता है ….

वसुधा

Vasudha Mishra , Noida

Vasudha Mishra is based out of Noida and is well known for her literary initiatives in Radio Playback India and other book lover communities. She is a child psychology expert and a fitness enthusiast. Loves pouring out her heart on art and literature. To connect with Vasudha Mishra click here