अंधकार का आदिम भय
अनुवांशिकी में बसा होता है
लेकिन जिजीविषा को अंधेरे से
लड़ने का अभ्यास होता है।
ऑक्टोपस सा पसरा अंधेरा
हमारे भीतर से होता हुआ
वस्तुतः पूरे ब्रह्मांड को हर लेता है।
यूं तो तिमिर के सामने प्रकाश
केवल दीपक की लौ
जितना प्रबल होता है लेकिन
काली रात की गोद में बैठा दिया
जीवन की लौ का घोंसला होता है।
और जीव-नदी उस योद्धा का
साम्राज्य होती है
जो समूचे व्योम का तमस
अपने वश में कर लेता है।

-प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’

१२/०७/२०२२