जिससे हम ये सोच कर के प्यार कर बैठते हैं कि इसके पास हमारी बेचैनी दूर होती है, उसके साथ कुछ दिन बिताने के बाद ये मालूम होता है कि अब वही हमारी घुटन का कारण बनता जा रहा है।

सामने वाला हमारे सिवा सारी दुनिया के साथ हंसता है, बेपनाह खुश रह सकता है, बस हमसे ही उसके गिले शिकवे शुरू होते हैं और तुम सबसे अपने हो कह कर वो पहलू में आकर रोते हैं।

अगले की कहानियां, उसकी बातें सुनते सुनते रिश्ते का दूसरा छोर खाली होने लगता है। जिस साथ की वजह अकेलापन हो उस साथ से भी अकेलापन ही मिलता है।

सोशल मिडियाई प्रेम संबंधों की सांझ एक दिन का सूरज डूबने के साथ ही होने लगती है। सबसे भारी होती है झट बनाए गए रिश्ते की पाल पोस।

कितनी उम्मीद हो कितनी नहीं हो ये सब मालूम नहीं होता और चाहतों की बंद किताब सीने से लगाए एक बार फिर कलम है और तुम हो, नींद कहीं नहीं है।

अक्सर जो तुमसे बेहतर मिला उसी को कम आंक लिया झगड़े किए, नीचा दिखाया, बदगुमानी में दूर हो गए और जब कोई खुद अपने आप सा मिला उसे देखा, खीझ सही, गुस्सा पिया पर गालों पर हाथ रख कर थपकी देदी, की इट्स ओके हम एक ही जैसे हैं।

हम खुद को कितना भी नापसंद करें हमें अपने साथ ही रहना है एक शरीर में, एक दूसरे का होकर, इसलिए बेहतर है ख्याल ही रखा जाए। कहते है खुद को पसंद करने से दुनिया की पसंद बनने का हुनर आता है।

प्रज्ञा मिश्र