तुम्हारी मादकता में
उमड़ते घुमड़ते हैं
जुलाई के बादल
मौसम हरा हरा सा है
सब कुछ ठहरा ठहरा सा है
लोगों ने पहरा बिठा दिया है
कितना सोच सकता हूं
क्या क्या चाह सकता हूं
इसपर बस नहीं रहने दिया है।

तुम जानती हो बैंगनी रंग
प्रणय निवेदन का द्योतक है
और लाल कामुकता के प्रतीक
इन प्रतीकों में घिरी तुम
मेरी किताबों के पन्नों में
और मेरी कलम में
अक्सर चली आती हो
सभी कहते हैं
क्या क्या लिख रहे हो आज कल
तुम बताओ ये मुझपर
क्या कर दे रही हो तुम आज कल

प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’