धन आवश्यक है और इसे केवल रुपए पैसे से नहीं आंका जा सकता। धन के अभाव में व्यक्ति की मृत्यु निश्चित है और यदि जीवित भी रहता है तो उसे बहुत से कष्टों का सामना करना पड़ता है। धन हमें सभी आवश्यक चीजों को खरीदने के योग्य बनाता है और पूरे जीवन भर हमारी मदद करता है। यदि हम जीवन में धन के महत्व को समझ जाए तो हमें कभी भी धन को बिना किसी उद्देश्य के व्यय या दुर्पोयोग नहीं करेंगे। भारत में धन की देवी को लक्ष्मी कहते हैं हम, आइए पढ़ें अनुपम चितकारा जी का यह आलेख और जानें लक्ष्मी के विभिन्न प्रकारों के बारे में। एक समृद्ध जीवन की ओर अग्रसर रहने का उपाय हैं स्थिर लक्ष्मी।

आदि लक्ष्मी

प्रकृति जो हमारा पोषण करती हैं वह आदि लक्ष्मी का प्रतीक हैं, खाद्यान्न, उद्यान, जल संसाधन, धातुएँ, खनिज, पेट्रोल, जो भी हमें पुष्ट करता है या हमारे जीवन को सुगमता से चलाने में सहायक होता है। माँ जो हमें अपने शरीर में नौ महीने रखती है, फिर अपने दूध से पोषित करती है वह भी लक्ष्मी स्वरूप ही हैं।

सौभाग्य लक्ष्मी

जो हमें परिवार विशेष में पैदा होने के कारण धन सम्पदा विरासत में मिलती है। अच्छा परिवार, जीवनसाथी, अच्छे मित्र जिनके साथ हम जीवन में आगे बढ़ते हैं। या फिर वह लोग जो हमारी तरक्की का जाने अनजाने हिस्सा हो जाते हैं। वह सब हमारा सौभाग्य ही हैं। जितना मर्ज़ी कर्मवाद के गुणगान कर लिया जाये पर जीवन में अच्छे लोग सौभाग्य से ही मिलते है। कहीं ना कहीं कोई शक्ति है जो हमें उन तक या उनको हम तक पहुँचा देती है। इसके बारे में सुंदर कांड की एक चौपाई याद आती, जब रावण की सभा से विभीषण निष्कासित होते तो उसपे गोस्वामी जी लिखते हैं


“रावन जबहिं विभीषण त्यागा ।
भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।”

रामचरितमानस

विभीषण को त्यागते ही रावण का वैभव ख़त्म हो गया। इसको थोड़ा सही से समझें तो सज्जन या अपने हितेषी का स्वेच्छा से किया गया त्याग या उसको दिया गया कष्ट सौभाग्य कम करता है।

विद्या

लक्ष्मी के इस रूप को समझने के लिए हितोपदेश के श्लोक में जैसा कहा गया है कि:


विद्यां ददाति विनयं,
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति,
धनात् धर्मं ततः सु

श्लोक


विद्या से विनय की प्राप्ति होती है, विनय से हमे पात्रता की प्राप्ति होती है, पात्रता से हमे धन की प्राप्ति होती है, धन से धर्म की प्राप्ति होती है और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है । विद्या को सिर्फ साक्षरता या डिग्री तक सीमित नहीं रखा जा सकता, विद्या वही भली जो तर्क करना सिखाये तो सामने वाले के विचार को मान देना भी सिखाये। हमें अपने से छोटे से भी कुछ ग्रहण करने की विनम्रता दे। ख़ुद भी विद्या प्राप्त की जाए और अपने ज्ञान धन को दूसरों में भी बांटा जाये ताकि ज्ञान का प्रचार प्रसार होता रहे। (until intellectual property rights issues are not there)

अमृत लक्ष्मी

दान धन की उत्तम गति है, जैसा कि मानस के उत्तरकाण्ड में कहा गया है
“सो धन धन्य प्रथम गति जाकी”। दान वही जो प्रचार प्रसार के लिए नहीं सच में किसी के हित के लिए किया गया हो वही उत्तम है।

सत्य लक्ष्मी

अच्छे बुरे वक्त में हम कितना अपने सत्य पर टिक पाते हैं। विवेकशील होकर किसी और के साथ अपनी सच्चाई से तब दे पाते हैं जब दूर तक उम्मीद की कोई किरण ना दिखती हो। सत्य पर दृढ़ संकल्प रहना भी लक्ष्मी की ही साधना है।

काम लक्ष्मी: इच्छाएं जो हमें मेहनत करने का प्रोत्साहन देती हैं। घर, कपड़े, गहने, ब्रांडेड stuff या कुछ भी जो हम कमा कर भोगना चाहते हैं। हमारा कार्यक्षेत्र, वहाँ पर किए जाने वाले प्रयास, पद प्राप्ति हो या ख्याति प्राप्त करना हो, सब लक्ष्मी के इसी स्वरूप का विस्तार हैं।

भोग लक्ष्मी

जीवन में साधन तो मेहनत से मिल जाते है पर उनको भोगने के समय नहीं मिलता, या जब समय मिलता तब भोगने की इच्छा या क्षमता समाप्त हो जाती। मधुमेह में मिठाई के जितने भी ढेर सामने हों, उनका कोई औचित्य नहीं। अपने कमाए धन से हम कितना संतुष्ट होते हैं, परिवार के साथ कितना समय निकाल साधनों का उपभोग कर पाते हैं। सन्यास के परिपेक्ष्य में भोगों को तर्कहीन, “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” के संकल्प पर अटल रहना सही है, पर गृहस्थी में रहने वालों के लिए लक्ष्मी के इस स्वरूप की उपयुक्तता कभी कम नहीं हो पाती।

योग लक्ष्मी: देवी लक्ष्मी का यह स्वरूप परम् शांति ही है, जीवन को तटस्थ भाव से लेना। जो नहीं मिला नहीं उसके लिए प्रयास हैं पर कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई ज़्यादा सरदर्दी नहीं। जो है, जैसा है सब अच्छा ही है। भगवत गीता में जो स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताये वही जीवन में पूरी तरह से उतार लेना हो योग लक्ष्मी का स्वरूप है।

Anupam Chitkara ( freelance content writer/poet ) anupam ji को फॉलो करने के लिए नाम पर संलग्न लिंक क्लिक करें ।

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