तुम्हारे प्रेम का खोना

मैं नहीं बना पाई थी
तुम्हारी तरह
ज़िन्दगी के कई खाने

महज़ एक खाने के खाली
होने भर से ही
नज़र आने लगा ज़िन्दगी का
सूनापन

मैंने जिंदगी के सभी दराज़ो
सभी खानों की सीमाएं तोड़कर
तुम्हें भर लिया था पूरी ज़िन्दगी
में
जैसे दशांग की खुशबू भर जाती है
मंदिरों में गर्भगृह से हवन कुंड तक

कितना धुंधला हो जाता है
उस धुँये के आर पार देखना
पवित्र खुशबू का सम्मोहन
आंसुओं को भी पानी मानता है
मन

ये आँसू पूजे जाने के थे
या आँसू प्रेम के थे
तुम्हारा प्रेम अलभ्य माणिक्य था
जो मुझसे नीलाम हो गया चौराहों पर

लौट आओ
अबकि तुम्हें सँजो लूंगी
मैट्रिक के अंक पत्रों की तरह

  • गति
    30.05.2021

प्रेम और स्त्रीवाद पर बोलते हुए

प्रेम और स्त्रीवाद पर बोलते हुए
जिस मंच से तुमने उसका दिल चुराया था
मिलते ही उसने तुम पर कितना हक़ जताया था
तुम्हारे नाम में अपना नाम जोड़कर
औरों की परवाह छोड़ कर
बरबस ही उसने तुमको गले से लगाया था
तुम्हारी खुशबुओं को भी अपनी बताया था
“जल्दी बनने वाले मरहले जल्दी ही टूटते हैं”
थोड़ा तो तुम्हें भरमाया था

उसके उजले स्याह किस्से सुनकर तुम जब पिघलने लगी
चोटिल पपड़ियों पर उंगलियों के फेरने से तुम सुबकने लगी

प्रेम वर्षों तक चले अगर उसमें प्रतिवाद ना हो
प्रेम युगों तक चले अगर उसमें अधिकार ना हो
प्रेम जन्मों तक चले अगर उसमें संवाद ना हो
तुम मौन न रह सकी
और
प्रेम मौन हो गया

अब भी उसको लिखती हो अनगिनत पाती
गूगल डॉक में सेव करती हो मिटा नहीं पाती
उसके संदेशों का जवाब एक लाइन में देना
सीख गयी हो

वो तुम्हारे मैसेज पढ़कर भी अनरीड
रखता है
मैं ठीक हूं के जवाब में तुम ठीक नहीं हो
ज़ोर देकर कहता है
कभी तो तुम पूछ लेती हो उससे अपनी
कविताओं के बारे में
ज़ोर से हँसते हुए-
स्त्रिवादियों को भला प्रेम क्यों चाहिए
चिढ़ाता है
प्रेम में मजबूर को मजबूत पढ़ना
सिखाता है
दाहिनी हथेली को बाएं सीने की तरफ़ ले जाते हुए मन ही मन दोहराता है

-मुक्त करके भी बांध लेती हैं ये लिखनेवालियां!!!

-गति
13.08.2022

गति उपाध्याय

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