हिंदी को मिले हैं पंद्रह दिन,
लेकिन प्रतीक्षा सदियों की
सदियों तक रहेगी
विभिन्न भाषाओं और बोलियों
वाला मेरा देश जाने कब समझेगा
हिंदी की महत्ता
जाने कब तक उसे
अंग्रेज़ी माध्यम से
अपनी इज़्ज़त की
डिग्री मिलती रहेगी
जाने कब तक भारतीय भाषाएं
आपस में ही झगड़ती रहेंगी

मैं सारे साल हिंदी में बात करती हूं
अपने बच्चों को हिंदी की किताब से
सोने से पहले कविता कहानियां सुनाती हूं
प्लूटो इकतारा जैसी संस्थाओं का
पुरजोर समर्थन करती हूं
मैं मानती हूं कि हिंदी तभी बची रहेगी
यदि मेरे बच्चे हिंदी में सोचेंगे बात करेंगे
पखवाड़ा अच्छा लगता अगर अंग्रेजी के लिए होता
हिंदी के लिए ये ऐसी बात है कि
घर के मरे हुए सदस्य को बरसी पर याद करना
गौर करिए हमारे देश को
तमिलनाडु से कश्मीर तक
और गुजरात से बंगाल तक
अंग्रेज़ी ने ज़्यादा जोड़ा है
हमें शर्म आनी चाहिए।

भाषा किसी देश की थाती नहीं है
जिसने उसे अपनाया वो रहती वहीं है

हिंदी पखवाड़े पर हम भारत वासियों को समझना होगा कि हिंदी में सोचने से हिंदी जीती रहेगी हिंदी में रटने से नहीं।

प्रज्ञा मिश्र