मैं एक चित्र बनाना चाहती हूं
लेकिन मुझे यह कला नहीं आती है
तो तुमको उसका आकार बताती हूं
एक स्त्री है , लड़की नहीं हैं, स्त्री है
वह सुविधाओं से लैस बंद कमरे में बैठी है,
जहां सब कुछ मिल जाता है
लेकिन कोई रास्ता बाहर नहीं जाता है,
वहीं अचानक एक दिन
एक दरवाज़ा लगभग प्रकट होता है,
खुलता है, वहां तुम खड़े हो,
हाथ आगे बढ़ाए,
वह स्त्री दरवाज़े तक आती है,
तुमसे मिलती है,
उसे दुनिया के बारे में पता लगता है,
दुनिया के लिए उसकी खिड़की तुम हो,
लेकिन अब भी बंदिशें हैं,
वो बाहर न जाने की पाबंदियों में है,
फिर भी खुश है अब
बाहरी दुनिया की खबरों में,
खुश है तुम्हारे आने जाने में

प्रज्ञा मिश्र १४ नवम्बर, ९.४५ सुबह

मुंबई