बेटा अभिज्ञान

बेटा ,
कहते हैं सोने से ठीक पहले
दिमाग में वो ही
बातें आती हैं
जो हम सबसे ज्यादा करना चाहते हैं ,
और रोजमर्रा की जरूरतों को
पूरा करते हुए नहीं कर पाते हैं।

मैं कल तक कभी देखा करती थी
मैं हूँ मंच है और बाकी के शौक
पर बेटा आज कल कुछ दिनों से
न धुन आती है न शौक
ख्याल आता है
तुमसे बात नहीं हुई
तुमको निहार नहीं गयी
डाँट कर उठाया
धक्के से नहलाया
स्कूल भेजा जैसे तैसे
खुद भागी जैसे तैसे
फोन की पूछताछ थोड़ी सामने से हो पाती तो
काश मैं भी बस नीचे यूँ ही तुमको
खेलते देख पाती तो
इतना सा शौक तुम्हारा
की मम्मी बैठी रहे
मेरी पानी की बोतल पास लेकर
मैं पूरा कर पाती तो।

मैं क्या कर लूंगी एवेंजर के खिलौने देकर
वो टूट के कचरा हो जाते हैं।
पर तुमको वो थोड़ी देर की खुशी तो दे जाते हैं
लेकिन ये चिड़चिड़ाहट कम नहीं करते
जो माँ के साथ बैठने से कम होती है
ये झुंझलाहट कम नहीं करते
जो तुम्हारी मीठी प्यारी बातें सुनने से कम होती है
तुमने ध्यान नहीं दिया है अब तक
क्योंकि तुम बहुत बच्चे हो।

वो 2016 का मार्च रहा होगा
तुम पूरे परिवार को एक साथ अलविदा कहने
तस्वीर खिंचवाने नहीं आये थे।
सबके सामने बड़ी जिद पे अड़कर
किसी बात पे जो गुस्सा के भाग आये थे
बहुत आक्रोश सा दिखाया बड़ों के सामने
बिगड़ गया पूरा कहलाये थे।
मैंने बहुत तेज़ मारा था
उस हरकत पर
तुम रोकर चुप हो गए
थोड़ी देर सुबक कर।
मुझे मेरा सबक दे गए
क्यों किया एक पांच साल के बच्चे ने ऐसा
मुझे सोचने पर मजबूर गए।

और आज का दिन है
दो साल से ऊपर होने को है
बिना कुछ सीखी तुम्हारी मम्मी
हर दिन सीख रही है
तुम्हे पालना ।
और सोचती है तकिये पर सिर रख
क्या कैमरों से देखते देखते
मैंने तुमको कम देखा?
तस्वीरों को खींचते हुए
खिंचती लम्बाई को कम देखा?
तुम बिन सिखाये साइकिल सीख गए
आज गलते ग्लेशियर की तस्वीर देखकर
बिन बताये समझ गए कि
“ऐसे तो मम्मी हमारी धरती डूब जाएगी”
कितने समझदार हो तुम बेटा
अपना भविष्य ग्लोबल वार्मिंग में डूबता देख सहम गए
इस समझ तक हमको आने में कुछ सौ वर्ष लग गए

देखो बेटा क्या हालत क़है!
केरल में कैसी आफ़त है!
पर मम्मी कल फिर ऑफिस जाएगी।
फिर वैसे ही चिल्लाएगी।
और तकिये पर सर रख रात में
यही सोचती जायेगी
क्यों करते हैं हम सब ये सब
क्यों न रहें बस साथ उन्ही के
छूट जाता है जिनका साथ जब तब।

धरती पूरी पानी पानी हो गयी बेटा
मैं भी पूरी पानी पानी हो गयी बेटा
क्या दे रही हूँ तुमको
घिसते कदम और स्कूल का बस्ता
हर दिन कुछ घण्टों में फोन घुमा के
समय छह बजे से पहले खाने का वास्ता?

दादी माँ कहती थी
खाना जो प्यार से नहीं जाता
वो देह में भी नहीं लगता
भरसक तुम पतले लगते हो।

क्या कर गुजरने की छटपटाहट में बढ़े जा रही हूँ?
तुमको जी भर गले न लगाने में भी बिलबिला रही हूँ।
कभी इस पे निकलती है तो कभी उसपे ।
मुझे भी समझ नहीं आता कि भड़ास किस बात की?

पर ये जो केरल में आई बाढ़ है ना बेटा
वो मुझसे ये सब लिखा रही है।
बेमतलब पानी पैर तक आ गया है
जड़ें उखड़ रही हैं
पेड़ सर पर तैरने लगे
तिनके सा सिलेंडर बह रहा है
हम करोबार में डूब रहे हैं
बिजली काट दी गयी
न कोई सम्पर्क है न साधन
नानी से छुट्टीयों में चिट्ठी लिखने की कला भी नहीं सीख पाए
जब तक रौशनी थी कुछ बनारसी साड़ी के प्रिंट सा
हाथों पे मेहंदी लगाना सीखते रहे
पहले कलम से कॉपी पर
फिर सब बाढ़ के पानी में बह रहा है।
घर,नौकरी, पहचान, सब
बाढ़ के पानी में बह रहा है
दरअसल ये त्रासद नहीं है बेटा ,बस करवट है
ऐसी करवट तुम मत लेना।

#प्रज्ञा 4.00 am 18/08/18

एक लिखी कविता

एक लिखी कविता

कविता प्रेम रचते रचते निर्गुण हो जाती है
फिर पवित्र अग्नि में बदल जाती है
जिसमें राग स्वाहा हो जाता है
और मन कुंदन।

कविता सच कहते कहते साधू हो जाती है
और फिर समाधि में लीन किसी योगी
की तरह देह छोड़ कर
ढूंढने लगती है तत्व।

कभी देशभक्ति का स्वर, कभी भक्ति में चौपाई
कभी नारे, कभी राजनीतिक पार्टियों की दुहाई

कविता शैली भर नहीं रह जाती
वो मात्र छंद से छंद का मेल नहीं होती
वो बचपन में स्मरण की शक्ति का मानदण्ड होती है
युवाओं में व्यवस्था के विरुद्ध रक्त का ओज
प्रौढ़ावस्था में परिवार के नाम सन्देश
तो अवसान में कण्ठ से उतरती गंगा जल की अनुभूति

कभी कभी लेखनी इसे वैतरणी मान चलने लगती है
भाव विह्वल बेड़ियों से मुक्त होकर ठौर मिल जाएगा
या पार ही लगा जाएगी
एक लिखी कविता
हर बार
और न जाने कितनी बार

Pragya Mishra
#प्रज्ञा 15 अगस्त 11.50pm

उलझन सुलझन

अंतर्मुखी और बहिर्मुखी
एक साथ होना भी
अजीब परेशानी है

कभी तो एक  साँस में
भीड़ सम्भाल लेना
कभी  खुद भीड़ में
कहीं खो जाना
जैसे नाते हैं न धाम
बस की खिड़की पे
केहुनी टिकाये
उँगलियाँ चलती रहती है
मानो सितार बजाया जा रहा हो

#प्रज्ञा

डायरी के झरोखे से

कुछ बोले
न सुनी
न सुनाई
धीरे से दे गए
अड़ोस की दुहाई!
कहे बिना जान जाते हो।
छुए बिना समाये जाते हो।
मुझे इंतेज़ार पे छोड़ने वाला ही
प्यार जताए जाते हो।

#प्रज्ञा

सिकुड़न

सूरज मैं तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं अतीत का किस्सा हूँ
मैं आयी हूँ उस गर्भ से
जिस प्रभात के साक्षी तुम
देखो मुझको बेटी समझो
धूप बनाओ आँचल तुम।

रात को जब तुम छुप जाते थे
गोद में नींद की रख जाते थे
नींद टहलने निकल जाती थी
मुझे अकेला छोड़ कर।

बीच रात में कितने ही दिन
कमरे कमरे घूमी थी मैं
एक चादर की खोज पर
नहीं मिला जब कुछ ढकने को
कितने ही दिन मैं सोई थी
पलंग की चद्दर ओढ़ कर।

– प्रज्ञा 1.30 am , 11 Aug 2018

पेड़ का रंगीन तना

#storymirror #yesiwrite

https://storymirror.com//read/poem/hindi/axjtpfga/pedddh-kaa-rngiin-tnaa

पेड़ का रंगीन तना

एक पेड़ बड़ी ऊंचाई से
अपनी जड़ें तलाश रहा था,
बीच के छोटे सतरंगी पत्ते
किसी भी दिशा में बढ़ चले थे।

सिरा झुकने लगा था,
जड़ें छिपने लगी थीं।
डालें टूटी पत्ते बिखरे
एक उम्र हो चली थी।

उस दिन सड़क किनारे
चलती इंसानी पैदायिश ने
उसे गैर जरूरी समझा,
कह रहे थे कोई फंगस आया है।

जड़ें अब भी हैं,
पेड़ कट चुके हैं।

किसी दिन नए चलन के
कुछ कलाकार आये,
कटे पेड़ों को इज़्ज़त बराए।

रास्ता छापते रंगीन तने
जुहू के समानांतर दौड़ते हैं।
यूँ तो वहाँ छाँव नहीं है,
लोग कला की तारीफ करते हैं
और शायद पेड़ भी,
अपनी सुन्दर समाधी के लिए।

– प्रज्ञा ,दिसंबर 2015, पेड़ का ताना।

राहे कदम 2- कृशन चन्दर

हिंदी कहानीकार अंकिता जैन जी का कार्यक्रम “राहे-क़दम” आज कल हर सोमवार शाम में यू ट्यूब पर आ रहा है । आज उन्होंने जिस लेखक की बात की उनके बारे में मैंने कभी नहीं सुना था।

“पदम भूषण कृशन चन्दर” ।

कार्यक्रम देखने के बाद मैंने कृशन चन्दर जी को गूगल किया , स्वाभाविक तौर पर विकी पेज खुला। वहाँ ज्यादा कुछ नहीं लिखा उनके व्यक्तित्व और शैली के बारे में।छोटी सी जीवनी है और कहानी किताबों के नाम।

कृशन चन्दर जी के स्टाइल और व्यक्तित्व का ब्यौरा अंकिता जी के जनरल डिब्बा पर बड़ी मधुरता से बस छह मिनट में सुना जा सकता है।

राहे कदम एपिसोड 2 देखने के बाद ये समझ आया है कि हम मुख्यधारा में व्यंग्यात्मक शैली पढ़ने वाले हैं।

अच्छा बैकग्राउंड स्कोर, तंग करने वाले कोई विज्ञापन नहीं, पूरी रोचक जानकारी । “एक गधे की आत्म कथा ” के लेखक की जानकारी।

मेरी समझ से समाज की अनियमितताओं को जीने के बाद से कृशन चन्दर जी के अंदर व्यंग्यात्मक शैली को खूब पनप मिली।

इंटरनेट पर काफी सारे कन्टेन्ट हैं लेकिन इस तरह का एक कर्यक्रम हमको उम्दा जानकारी तक लेकर जाता है। वक्ता, श्रोता तक सही बात पहुंचाने के लिए और उसका सारांश बताने के लिए काफी पढ़ते हैं।

ऐसे एफर्ट्स से नो डाउट हमें फिल्टर्ड और बेहतरीन जानकारी हाथ लगती है। इसका लाभ उठाना चाहिए। होमवर्क की तरह उन लेखकों के बारे में और छान बीन करनी चाहिए इससे कार्यक्रम का उद्देश्य भी सफल होगा और यदि हम स्वयं भी लिखने के शौकीन हैं तो शब्द भंडार और दृष्टिकोण भी बढ़ेगा।

स्क्रॉल करते करते अचानक पिट्सऑडियो पर नज़र गयी तो देखा वहाँ ” एक गधे की आत्म कथा” का ऑडियो मौजूद है। कहानी सुनते सुनते हँसे बिना नहीं रहा जा सकता ।सामाजिक और राजनैतिक कुरूतियों को इतनी सहजता से लिख जाना बेहद मुश्किल होता है

लिंक यहाँ साझा कर रही हूँ :http://pittaudio.blogspot.com/2013/11/krishan-chander-birth-23-nov-1914.html?m=1