जुड़ाव – होली मिलन

दूरियों का मतलब नही है
तुम्हारे मेरे बीच ,
ऐसे समाहित हो गए
जैसे भावना के अंकुरित बीज।
तुम और मैं
एक दूसरे के पूरक जैसे
मैं स्त्री का शरीर और तुम
पुरुष मेरे जैसे।
अल्हड़, मस्त, बचपन की
कौतूहल से भरीं,
अनन्त इच्छायें सघन
हो गए एक दूसरे के दर्पण।
जिनके साँस में साहित्य जीता हो ,
आलिंगन में प्रेम ,
और अधीरता एक दूसरे का होने की।
तुम हो मैं हूँ और सांसारिकता
एक तुम्हारी एक मेरी
अपनी अपनी जीतें हैं
साथ आने को जलते हैं,
तिल तिल पल पल जब तक
समय सारथी ना हां करता ।
ये कितने अद्भुत अहसासों की माला डाली तुमने मुझमें
सारे मोती बन कर पंक्ति लग जाते हैं प्रेम की धुन में
डोर हुई मैं बिन छोर की
था एक कहीं बंध गया तुम्ही से
कैसे कहूँ कौन है प्यार
दूरी ही या साथ तुम्हारा।
आज शब्द जैसे होश खो रहे,
खुद ही चल रहें हैं
तुम तक पहुंचने वाली चाल।
हाथ के बर्तन छूट गये
बेलन पे चलती रोटी सूख गयी
सब रुक गया
तुम्हे आवाज़ देने को ,
मैं हवा हो गयी
मिट्टी की सुगंध जैसे घुल कर
बारिशों के सहारे आऊं तुम तक
टप टप पानी की बूंदे गिरे जब जब
तू जिस रंग में रंग दे मुझको रंग जाऊं मैं आज
धुनि रमा कर तुम्हे भिगो लूँ छेड़ूँ ऐसे साज़।