बरसात

वो था कोई ज़माना और
बरसात रूमानी होती थी
पेड़ों की बाहें थाम थाम
जवानी दिवानी होती थी

बचे नहीं अब पेड़-वेड़
बंधी नहीं अब मिट्टी-विट्टी
भरी गाद सब टूटे बांध
बारिश आयी बनकर बिप्ती

बरसात तूफानी आती है
गाँव के गाँव बहाती है
गंगा जमुना कोशी की धार
तटिनी डरौनी हो जाती हैं

ये मेह भी कोई मेह हुई
चपला बरसा कर जाती है,
वे सौ पचासी वृक्ष नहीं
मानव के शव बिछवाती है।

रिमझिम फुहार दिन बीत गए
अब जब तब बादल फटता है
ना निकासी है न व्यवस्था है
नागरिक जैसे तैसे निपटता है

दास्तान-ए-बरसात ऐसी
समाचारों में सुनिये कैसी-कैसी
बने रहिये आज कड़केंगे बादल ज़बरदस्त
भारी बारिश से जन जीवन अस्त व्यस्त।

*प्रज्ञा मिश्र*

लोकेश श्रीवास्तव जी की कविता “नदी”

लोकेश श्रीवास्तव जी कल ही टेलीग्राम स्थित चैनल से जुड़े हैं और उनकी यह पहली पोस्ट आयी है। कविता में नदी के क़ई उपमान दिए गए हैं कि नदी किसके लिए क्या मायने रखती है।

आज कल मैं रचनात्कम लेखन पर पढ़ाई कर रही हूँ । ये प्रयास पढ़ें तो हमारी समझ में आएगा की किसी आस पास घटित होती बात को तारतम्यता में देखते हुए रचना कैसे गढ़ी जानी चाहिए।

एक शब्द उठाया है कवि ने यहाँ नदी , और नदी को विभिन्न रूप आए देखे जाने पर अपनी सोच रखी है और एक चित्र सा बनता गया पाठक के दिमाग में।

एक ही बात कितने लोगों के लिए कितने अलग अलग मायने रख सकती है।

ठीक इसी तरह से पैटर्न पर पहाड़ , डायरी, किताब, पुष्प, आदि शब्दों पर काव्य रचना हो सकती है।

अब कुछ लोग कह सकते हैं कि भई सोच सोच कर लिखी गयी कविता थोड़ी न भावनात्मक होती है, तो उस पर मेरा जवाब यही है कि करत करत अभ्यास नित जड़मति होत सुजान मतलब अच्छा लिखने के लिए लिखते रहना आवश्यक है, भावनाओं के भरोसे मत बैठिए, क्या देखा है जीवन में, कैसे समझ बढ़ाई है जीवनानुभव से इसको आधार बनाकर शब्दों से खेलना शुरू कीजिए, भावनाएं स्वयं फूटेंगी ।

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बुद्धम शरणम गच्छामि

प्रिय अर्पिता,

तुम्हारा दुख व्यक्त करना बिल्कुल ठीक है, यह सम्वेदनाएँ व्यक्त करने का समय है, मानव मूल्य दूसरे के दुःख को महसूस करने में है, एक लम्बी साँस में मैं तुम्हारे दिल पे रखा पत्त्थर समझ सकती हूँ।

यही वो समय है जिस दिन के लिए बरसों के जोड़े कंधे साथ आते हैं। तुम सही जगह व्यक्त कर रही हो। हम सभी में तुम्हारी भावनाओं को समझने की शक्ति है।

आज बुद्ध पूर्णिमा है। ध्यान करना । ईश्वर से एकमेक होने का प्रयत्न करना।यह आदमी को मिली ताकतों में से एक है कि ढूढने से राम मिलते हैं, वे हमारे भीतर ही होते हैं और ये की तुम बहुत ताकतवर हो , तुम्हारे अंदर ढेर सारा प्यार है, बालपन से भरा कोमल कौतूहल युक्त मन है। तुम्हारे अंदर जीवन का रस है, आर्द्रता है इसलिए तुम सब कुछ महसूस कर सकती हो।

मौन रहना हो तो मौन रहो पर मुस्कराती रहो ।

इस बात चीत को एक खुले पत्र में सुरक्षित कर रही हूँ।

जाता हुआ समय एक नदी की धारा है

एक ही जल वापस आता नहीं दोबारा है

पर जितनी भी धाराएं आगे आगे जाती हैं

वे दुनिया को निहित सन्देश देती जाती हैं

इतना कुछ देखा ऐसी बाधाएं सही हमने

फिर हुए हैं परिवर्तित पोषित करती नदियों में।

बुद्धम, शरणम, गच्छामि 🙏

प्रज्ञा

बुद्ध पूर्णिमा

हे ईश्वर!लॉक डाउन परीक्षा ले रहा है। नौकरी के आगे बच्चों को इन डेढ़ महीने में जैसे तैसे देखा , मोबाइल के भरोसे रखा है बोहोत समय, कभी कभी बोहोत झल्ला दी हूँ। बस मन से खुद को ही सिखा रही हूँ। अभिज्ञान कल मुझे अपने छोटी नन्ही बाजू पर सर रखने बोले, मैं तकिए पर भार देकर बस दिखावे भर उसके हाथ पे सोयी तो मेरे सर का जितना हिस्सा उसके हाथ मे आ रहा था उसी पे थप थपा कर बोला सो जाओ मम्मी। बड़ा सुकून मिला और सोचने भी लगी की अपना समय अच्छे से न संभालने की झुंझलाहट में हम इन बच्चों पर चिल्लाने लगते हैं, कभी कभी तो हाथ भी उठा है।

भारत का सैनिक किसके लिए मरता है?

हंदवाड़ा में वीरगति को प्राप्त हुए एक सैनिक की नई ब्याहता विधवा की भावशून्य तस्वीर सोशल मीडिया पर घूम गयी है, इस तस्वीर में बैराग है, अफसोस है, दिशाहीनता है, मौन वार्तालाप है। मैं इस सैनिक का नाम और अधिक व्याख्या नहीं करना चाहती हूँ, दुख से सने शब्दों में मैं अपने आप से ही प्रश्न कर रही हूँ। क्या मैं इस लायक हूँ कि मेरे देश का सैनिक मेरे हँसते भविष्य के लिए अपना और अपने परिवार की आहूति दे? क्या आप इस लायक हैं? क्या आज का औसत नौजवान जो कल का अधेड़ होगा वो इस लायक है?

आप खुद सोचिये क्या ये जवान एक छिछली जनता और महिलाओं को नीचा दिखाते रहने वाली जनता के लिए मरा है सरहद पर ? इनकी मौत की इज़्ज़त रखने लायक भी नहीं हैं आज भारत मे बहुसंख्यक । ये तस्वीर इस नव ब्याहता के दुःख का प्रमाण दे रही है।

शायद ये सोच रहीं हों क्या है और किसके लिए है इनका पूरा जीवन आगे। कितने प्लानस होंगे, साथ मे क्या कुछ सोचा होगा। वैवाहिक जीवन शुरू हुआ नहीं की विधवा हो गयीं ये। सादर प्रणाम है इनकी हिम्मत को । लेकिन इनका दुख केवल यही जियेंगी कोई नहीं बाँट सकेगा और हम लोग तो भूल ही जायेंगे।

इस दौर में दुःख भी है कि अधिकांश जनता आज अच्छा साहित्य पढ़ने की कमी में मध्यमवर्गीय बौद्धिकता के शिकार हैं। सोफे पर चौड़े होकर गप्प बाजी भर से ज़्यादा कुछ नहीं करते और रस ले ले कर घटिया फॉरवर्ड भेजते रहते हैं, बिगड़ैल हिन्दू मुसलमान के नीच नीच हरकत वाले नकारात्मक वीडियो जितना हो सके बांटते रहते है। ऐसा महसूस होता है देश का सब सोना चांदी सरहद पर मर गया और जितना कचरा बुद्धि था सब देश के अंदर भर गया।

मैं ज्यादा सैनिक के मरने पर कभी नहीं लिखती क्योंकि उतना शब्द भंडार ही नहीं है मेरा की बैठ के कविता करूँ। लेकिन देश मे आम नागरिक का स्तर जैसा घटिया होता है रहा है उसको देखते हुए , बहुत दुख है कि ये सैनिक मरा।

भगवान, ये होनहार जवान बिल्कुल नहीं मरना चाहिए था। इस देश की बहुसंख्यक छिछली जनता के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दें और हम भारत के नागरिकों का जीवन ऐसा बनाने की सद्बुद्धि दे की आप जैसे सैनिकों के शहादत लायक जनता तो बनें कम से कम।