प्रतीक्षा

मयूर करते हैं विश्राम

सावन के आने तक

बचानी होगी ऊर्जा

पँख फैलाने तक।

मत रोको उन सपनों को

जिन्हें देखना कठिन हो,

गिरने दो ओस की बूंदें

रात निकलने तक।

कुछ मोती ,

पलकों की कोर पर ठहर जायेंगे

चमकेंगे खिलेगी धूप जब

वही सपने सच कहलायेंगे।

पाँच नवम्बर

आज पापा का जन्मदिन है। जिस वर्ष यात्री बाबा नागार्जुन अपनी अंतिम यात्रा पर निकले पापा आकाशवाणी दरभंगा से कवरेज के लिए गए थे। #पाँच_नवम्बर

उस साल मैंने उनके लिए एक टी कोस्टर खरीदा था जिसका आकार ग्रामोफोन का था और उसमें छोटे छोटे खाँचे थे जिनमें पिन, छोटे पेपर इत्यादि रखा जा सकता था।

इस वर्ष भी उनके जन्मदिन पर मेरे भाई बहनों ने पूर्णियाँ में बहुत प्रेम से तैयारियाँ की।

वे हर अवस्था को “ठीक है, बहुत अच्छा” से निकाल लेते हैं।
उनके बोलने से जो मोती सरीखे शब्द झरते हैं उससे उन्होंने दुनिया की लाइब्रेरियों को वंचित रखना उचित समझा है, उनके मुताबिक केवल पढ़ते जाओ, पतले पैम्फलेट में भी ज्ञान भरा है।

वे अक्सर आँख बंद करके सोचते हुए बात करते हैं। पापा की, और दादा जी की मुस्कान घर में बेहतरीन मानी जाती है । दोनों ही कम उपलब्ध होती है।

आज बातों बातों में दादा जी ने ही अपनी उम्र बताई की वो चौरानवे वर्ष पार कर चुके हैं। अब जाके लाठी उठाई है।

मेरा पूरा जीवन जिनके बताए निर्देशों पर खड़ा हुआ वे पापा , दादी माँ और अरुण अंकल हैं।

किसी भी चर्चा में पापा की कहीं उक्तियाँ सहज याद रहती हैं क्योंकि उन्होंने ने भी कभी किताब देख देख के आज तक कुछ नहीं पढ़ाया।

एक उक्ति पापा हर बात चीत में बोलते हैं

“एकै साधे सब सधे सब साधे सब जाए।”

पापा की बातें NCERT किताब के अध्याय की तरह होती हैं। बहुत कम बताया रहता है लेकिन बहुत बातें निहित रहती हैं और अचानक एकांत में अपने आप समय आने पर “ओह अच्छा” कर समझते रहते हैं।

किसी भी हाल में अपने माता पिता के ही निकट रह कर जीवन यापन करना इक्कीसवीं सदी के युवा के रूप में बहुत सुखद निर्णय रहा उनके लिए।

स्मृतियों में मुझे कहीं घूमता है कि जब पटना घघा घाट में रहते थे तब मैं उनको डैडी बोलती थी। पापा शायद 1996 में दिल्ली से राजस्थान आने के बाद बोलने लगी अचानक।

मैंने पिताजी कभी नहीं बोला । हमने मैथिली में भी कभी बात नहीं की । हमने अंग्रेज़ी में भी कभी बात नहीं की।

पापा केवल साहित्य बोलते हैं और भाषा शब्द तक सीमित नहीं रहती, चेहरे को देखकर भंगिमा के हिसाब से समझना पड़ता है।

उनके साथ देखी मेरी पहली फ़िल्म डैडी है। “ये फ़िल्म देखो बेटा ” कर के बैठाए थे। अंकल कॉपी घिसा घिसा के मैथ बनवा रहे थे उसी बीच फ़िल्म देखने की बात चुप चाप अच्छी खबर थी।

रॉबर्ट लुडलुम के उपन्यास और रैंगलर की रिंकल फ्री जीन्स एक समय उनकी काफी अधिक करीब दो चीजें थीं।

उसके बाद घटनाएँ जीवन की दिशा के मुताबिक स्थान पाती गयीं।

मेरे पापा डॉ० प्रभात झा दिव्य पुरुष हैं।

हर आदमी को AI नहीं समझ सकता
हर आदमी तकनीक के इतने पास नहीं
कुछ व्यक्ति केवल प्रकृति के पास मिलते हैं।

जन्म दिन की शुभकामनाएं।

सुखद शुभकामनाएं

दीपावली के कई वाट्सप फॉरवर्ड्स के बीच मेरे कार्यालय से हिंदी में एक शुभकामना संवाद हमारे यहाँ के एक दक्षिण भारतीय टेक्निकल आर्किटेक्ट का भी था।

कल कई दिनों बाद ऑफिस गयी तो प्रसन्ना ने हँसते हुए पड़ताल की – “आई सेंट यू अ गुड हिंदी पोएम विद लॉट ऑफ एफर्ट दिस दीवाली यू डीड नॉट रेस्पांड। ”

यह एक अप्रत्याशित वाक्य था उनकी तरफ से और सुखद आश्चर्य भी , अवकाश मिलने पर मैसेज चेक किया तो गोपाल दास नीरज जी की कविता थी।

प्रसन्ना की तरफ से यह कविता शुभकामना के तौर पर आना एक अवार्ड जैसा है ।

हिंदी की एक छोटी सी सिपाही मैं भी तो हूँ जिसने अनभिज्ञ एक व्यक्ति का रुझान यूँ ही हिंदी की तरफ बढ़ाया।

कविता यहाँ साझा कर रही हूँ।

गौरतलब है कि पोस्ट एक फॉरवर्ड नहीं था ढूँढ पढ़ कर व्यक्ति ने स्वयं लगाई।

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना / गोपालदास “नीरज”

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मेरे घर की स्थिर लक्ष्मी

मेरे घर की स्थिर लक्ष्मीशाम की दिया बाती
पूजा स्थल का साज श्रृंगार
बिस्तर घर दरवाज़े से लेकर
लिविंग रूम में किताब की कतार
खिड़की पर सजी रंग बिरंगी लाइटें
पौधों के चारों तरफ घूमते
कंदील के तार
सुबह से सजाती आइडियाज़ देती
शाम को थककर
नीली शिफॉन की सारी में
झट पट तैयार हुई वो
आँखों में बस थोड़ा सा काजल
और कानों में झुमके
डालने का समय भर ,
फिर भी क्या खूब जँचती हो।
घर के इस कोने से उस कोने तक
मीठी मीठी खुशियाँ
दीवारों पर टाँग रखी हैं
सब एक शाम साथ साथ
टीम टिमाने लगेंगे
इसी रौशनी को देखने के लिए
हुई थी दिवाली की सफाई
इसी तस्वीर को जीने के लिए
भारतीय मेहनतकश परिवार
जोड़ता है पाई पाई।
तुमसे जुड़ा सुख ही स्थिर लक्ष्मी है
ईश्वर की कृपा से घर में ही बसती है
दिवाली की रात मिली सज धज
आरती की थाल लिए मुस्कराती हुई सी।

छोटी सी भेंट – डायरी 2 अक्टूबर

दो अक्टूबर को आशू भैया, निशा भाभी और भतीजी आशी से मिलते हुए नई दिल्ली एयरपोर्ट गए थे। उनका घर रास्ते में था। भैया से खूब प्रशंसा का डोज़ मिला और भाभी से सनेस।

मिलना इतना कम होता है कि आशी को मैंने हर सम्भव याद दिलाये रखने की कोशिश की मैं कौन हूँ और जल्दी आगे मिलना पड़ेगा , बच्चे दूर-दूर बड़े हो रहे , बहुत जल्दी बड़े हो रहे हैं।

आशी की राखी अंशू- मोनू के लिए हर साल आती है। एक समय था जब हम भैया को भेजी गई राखी में पत्राचार और स्वरचित कविताएँ ज़रूर रखते थे।

भाभी जब शादी होकर आयीं तो उन्होंने सब और भी सहेज-सहेज रखा और बहुत उत्साह के साथ चर्चा भी लेती रहीं। पिछले साल से ही यह क्रम टूट गया इसे फिर शुरू करेंगे।

12 ऑक्टोबर 2019

मोबाइल प्रेम

काश की ऐसा होता एक ज़िन्दगी होती तुम्हारी मेरी और मेरे इनबॉक्स में तुम्हारे फिक्र भरे मेसेज की जगह तुम्हारे हाथों से कौर खाना मामूली हर दिन का एक वाक्या होता।

तुम मटर के दाने साथ छुड़ाते खाते भी जाते मैं चट हाथ पर मारती और खाना बनाने से खाने तक का कार्यक्रम दुनिया भर की बातों के साथ होता।

तुम्हारी बातों में जितनी फिक्र मिलती है ठीक वैसे काश जब तब आँख बंद कर के तुम्हारे गले लगने का मौका मिलता।

किताबें साथ पढ़ते कभी कॉफी बनाती कभी तुम चाय बनाते। जिस दिन मन होता क्लासिकस कई फिल्में देखते मैगी साथ खाते।

कभी किसी रोज़ तो तुम ना पसन्द होने पर भी बस मेरे लिए पिज़्ज़ा मंगाते।

तुम मेरे तो हो काश मेरे होते।

मैं तुम्हारी तो हूँ काश तुम्हारी होती।

गलतफहमियों के दौर शायद कुछ कम होते जो हम साथ हरदम होते। हम दम होते।

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