प्रेम

तुम प्रेम ही हो
वो जो हेमशा रहा है
हमेशा रहेगा
अद्भुत है प्रेम को देखना
नहीं मालूम था कि
ऐसा दिखता होगा प्रेम

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अदौड़ी-कुम्हरौड़ी क्या हैं तेरे काम

#आलू_अदौड़ी #कुम्हरौड़ी #तिलोड़ी #बिहारी #व्यंजन

अब यह भी कोई बात हुई कि तुम हर विषय पर लिखो ही, हाँ पर ये भी तो सोचो बताओगी नहीं तो किसी को पता कैसे चलेगा। हमारे देश में जितनी संस्कृतियाँ हैं उतने व्यंजन हैं और सबकी अलग अलग दास्तान , स्थानीय पहचान।

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आज मेरी कविताएँ गूँज पर

आज गूँज समूह के संचालक कवि साहित्यकार मुकेश कुमार सिन्हा जी ने मेरी चार कविताएँ गूँज समूह में लगायीं, जिसपर समूह के सभी सदस्यों ने भावपूर्ण टिपन्नियां रखीं । चार छोटी कविताएँ नीचे में ब्लॉक्स में प्रस्तुत हैं। ये कविताएँ इन्नर और काव्यांकुर साझा सँग्रह में प्रकाशित हो चुकी हैं।

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लोकेश श्रीवास्तव जी की कविता “नदी”

लोकेश श्रीवास्तव जी कल ही टेलीग्राम स्थित चैनल से जुड़े हैं और उनकी यह पहली पोस्ट आयी है। कविता में नदी के क़ई उपमान दिए गए हैं कि नदी किसके लिए क्या मायने रखती है।

आज कल मैं रचनात्कम लेखन पर पढ़ाई कर रही हूँ । ये प्रयास पढ़ें तो हमारी समझ में आएगा की किसी आस पास घटित होती बात को तारतम्यता में देखते हुए रचना कैसे गढ़ी जानी चाहिए।

एक शब्द उठाया है कवि ने यहाँ नदी , और नदी को विभिन्न रूप आए देखे जाने पर अपनी सोच रखी है और एक चित्र सा बनता गया पाठक के दिमाग में।

एक ही बात कितने लोगों के लिए कितने अलग अलग मायने रख सकती है।

ठीक इसी तरह से पैटर्न पर पहाड़ , डायरी, किताब, पुष्प, आदि शब्दों पर काव्य रचना हो सकती है।

अब कुछ लोग कह सकते हैं कि भई सोच सोच कर लिखी गयी कविता थोड़ी न भावनात्मक होती है, तो उस पर मेरा जवाब यही है कि करत करत अभ्यास नित जड़मति होत सुजान मतलब अच्छा लिखने के लिए लिखते रहना आवश्यक है, भावनाओं के भरोसे मत बैठिए, क्या देखा है जीवन में, कैसे समझ बढ़ाई है जीवनानुभव से इसको आधार बनाकर शब्दों से खेलना शुरू कीजिए, भावनाएं स्वयं फूटेंगी ।

फेसबुक पर कवि लोकेश जी की अन्य कविताएँ पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

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बुद्धम शरणम गच्छामि

प्रिय अर्पिता,

तुम्हारा दुख व्यक्त करना बिल्कुल ठीक है, यह सम्वेदनाएँ व्यक्त करने का समय है, मानव मूल्य दूसरे के दुःख को महसूस करने में है, एक लम्बी साँस में मैं तुम्हारे दिल पे रखा पत्त्थर समझ सकती हूँ।

यही वो समय है जिस दिन के लिए बरसों के जोड़े कंधे साथ आते हैं। तुम सही जगह व्यक्त कर रही हो। हम सभी में तुम्हारी भावनाओं को समझने की शक्ति है।

आज बुद्ध पूर्णिमा है। ध्यान करना । ईश्वर से एकमेक होने का प्रयत्न करना।यह आदमी को मिली ताकतों में से एक है कि ढूढने से राम मिलते हैं, वे हमारे भीतर ही होते हैं और ये की तुम बहुत ताकतवर हो , तुम्हारे अंदर ढेर सारा प्यार है, बालपन से भरा कोमल कौतूहल युक्त मन है। तुम्हारे अंदर जीवन का रस है, आर्द्रता है इसलिए तुम सब कुछ महसूस कर सकती हो।

मौन रहना हो तो मौन रहो पर मुस्कराती रहो ।

इस बात चीत को एक खुले पत्र में सुरक्षित कर रही हूँ।

जाता हुआ समय एक नदी की धारा है

एक ही जल वापस आता नहीं दोबारा है

पर जितनी भी धाराएं आगे आगे जाती हैं

वे दुनिया को निहित सन्देश देती जाती हैं

इतना कुछ देखा ऐसी बाधाएं सही हमने

फिर हुए हैं परिवर्तित पोषित करती नदियों में।

बुद्धम, शरणम, गच्छामि 🙏

प्रज्ञा