अदौड़ी-कुम्हरौड़ी क्या हैं तेरे काम

#आलू_अदौड़ी #कुम्हरौड़ी #तिलोड़ी #बिहारी #व्यंजन

अब यह भी कोई बात हुई कि तुम हर विषय पर लिखो ही, हाँ पर ये भी तो सोचो बताओगी नहीं तो किसी को पता कैसे चलेगा। हमारे देश में जितनी संस्कृतियाँ हैं उतने व्यंजन हैं और सबकी अलग अलग दास्तान , स्थानीय पहचान।

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विभा_दीदी

मेरी ननद विभा दीदी, कर्मठता, स्वाभिमान, साहस, बुद्धि और नैसर्गिक सौंदर्य की अधिष्ठात्री हैं । मैं अंशू-मोनू के पापा को बोलती हूँ कि उनकी चारों बहनों को पलक पर रखें वे क्योंकि वाकई ऐसी बहनें हैं जो नसीब से मिलती हैं। मैं इस जीवात्मा स्वरूप में ईश्वर का हमेशा धन्यवाद देती हूँ मैं घर, बाहर या सोशल मीडिया पर भी ऐसी विलक्षण स्त्रियों के सान्निध्य में आयी हूँ जो अपने आप में मिसालें हैं। चाहे वे मुख्य रूप से गृह संचलिकाएँ हों, या कामकाजी हों । सबसे अद्भुत होता है अपनी ही विलक्षणता से अनभिज्ञ होते हुए उसे निरन्तर जीते रहना।

कोई अवसर नहीं आज बस एक रविवार है और कुछ ख़्याल बस यूँ ही। धन्यवाद कहने और प्रेम जताने के लिए उम्र कम है। मैं उनको और जीजा जी को कॉल पर भी बताती हूँ कि वे मेरे लिए कितने अज़ीज़ हैं। परिवार के सभी लोगों में यूँ तो सभी प्यारे होते हैं लेकिन कोइ ऐसा हो जाता है जिनसे दिल कनेक्ट कर जाता है। जब भी बात होती है दीदी से बड़ा अच्छा सा लगता है । तमाम तरह की दुनियादारी में अनाड़ी मैं बहुत सारे ज़रूरी काम समय पर आपके मार्ग दर्शन से कर पायी हूँ जिनके न कर पाने से असंतुलन हो सकता था।

हमारे जीवन मे माँ के रूप में जो स्त्री होती है उसकी आजीवन हमें ज़रूरत होती है चाहे आप पुरूष हैं या महिला । आपके व्यक्तित्व की सघनता या दुर्बलता इस बात पर निर्भर करती है कि आपकी माँ के साथ बचपन में आपके कैसे सम्बन्ध थे औऱ आज भी वो आपके जीवन में मौजूद हैं या नहीं। बड़ा ही मनोव्यज्ञानिक सम्बंध है। यह छवि देखी है इनमें। अच्छा जा रहा है सफ़र।

विभा दी बातों बातों में मुझसे हँसी में कहती हैं कि उन्होंने भी टी. एन. बी. भागलपूर से होस्टल में रहकर पढ़ाई की है और संस्कृत जैसे कठिन विषय से टॉपर रहीं। वे चुटकी लेती हैं कि समय ने थोड़ा औऱ दुलार दिखाया होता तो वे भी हाकिम से कम न होतीं। वैसे उनके हाव भाव कलक्टर से कम नहीं।

मेरी सास को अपनी चारों बेटियों की कर्मठता पर गर्व है। होना भी चाहिए। मैंने देखा है किस तरह लोहा लिया हैं चारों ने जीवन से। यह लिखते समय मैंने एक बहु को अपने बगल में बैठा दिया है और केवल तटस्थ उस व्यक्ति की तरह लिख रही हूँ जो किसी व्यक्ति को केवल उसके गुणों और जीवनानुभवों के लिए चुप चाप देखता है। परस्पर सम्बन्धों की अपनी खट्टी मीठी परतें होती हैं वे हमारे व्यक्तित्व के विकास का हिस्सा हैं उन्हें लेखन से लेना देना नहीं होता उनको साथ जीना होता है।

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औरत का मन

सभी तरकीबें आप आज़मा लीजिये
आंखों को पढ़ने का दावा भी पेश कीजिये
तिलिस्मी तहखाना है औरत का मन
जानने के लिए अनपढ़ ही मिला कीजिये

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बहिन दाय की बातें-वातें

वो चन्द्रालय, पूर्णियाँ, के छोटे छत की सीढ़ियों के पास खड़ीं हैं । कुछ कह रही हैं। कोई देसी फकड़ा जो ठहाके से खत्म हुआ होगा। ये तस्वीर आशू भैया की शादी के समय की होगी। ये कभी साल दो हज़ार आठ नौ या उससे पहले की बात होगी। अब फ्रेम होकर देख रही हैं ईशा को पुणे की घर गलियों में।

ईलू, प्राची,पीकू, पाउ दी,आशू, रानू, चीनू , गुंजन गुनगुन, शानू की प्यारी दादी माँ, टीटू – चिंकी की नानी माँ, बादलों की ओट में उजला सितारा बन कर चाँदप्रभा होंगी । वो कहती थीं , “गे हम बड़क गाछ छियो, आ तू सब भलेहिं हमर ठाएर “।

प्रेमालय और चन्द्रालय को जोड़ते सुखसिंह मैदान के मध्य मन्दिर के आगे सैकड़ों सालों से खड़ा एक वट वृक्ष है।अब वो उसी पेड़ का तना होंगी। पता कैसे करेंगे , शायद वो घना मज़बूत तना लचीला भी होगा ।

दादी माँ वहाँ वटसावित्री का पवित्र धागा बाँधती थी। मैं और चुन्नी, सुपली में सामान लेकर सबकुछ कौतूहल में ताकते थे , लाट साहब के जैसे गर्मी से उकता कर मैं दादी माँ चलो न, दादी माँ चलो न करती रहती थी, कुछ थोड़ा बहुत आसान सामान पकड़ देती। चट-पट वाला ऊपर-नीचे का काम चुन्नी करती थी। बाद में ईलू होशियार हो गयी।

आज तस्वीरों में कितना कुछ ठहरा सा है,इसमें से कहीं निकल कर जाने का मन भी नहीं करता । एक वीडियो सी चलती है , आगे ये हुआ था पीछे ये हुआ था । मैं दिमाग से निकाल कर पिक्चर बनाने की कोशिश में हूँ।

यह तस्वीर ईशा की वाट्सऐप का डिस्प्ले पिक और कुछ दिन पहले का उसका स्टेटस थी , तब उसने मुझसे पूछा ये , “पिक है क्या तुम्हारे पास” । मैं हल्का मुस्करा गयी ।

ये अब सिर्फ तस्वीर नहीं है।

पापा कहते हैं , “बेटा भगवान के पास सुनवाई की बड़ी फेहरिस्त है, वहाँ तुम्हारा नम्बर पता नहीं कब आएगा। पर तुम लोगों की दादी माँ बस हमारे लिए हैं उनसे कहो और पूछो कोई बात हो जब ऐसी जिसका समाधान न मिलता हो। ”

माँ , पापा के बगल में बैठ कर बातें सुनती रहती हैं चुपचाप सीखते रहने के लिए जैसे सन्त के साथ का आनंद हो, जैसे पार्वती सुनती होंगी शिव को। मुस्कराते हुए फिर घर के काम में वैसे ही लगती हुई जैसे उदाहरण देखे थे।

प्रेम में अतिरेक कुछ भी नहीं। शब्द भी नहीं। निःशब्द भी नहीं।

PC : Isha Mishra

ननद सुषमा दीदी के जन्मदिन पर

प्रिय सुषमा दीदी,

आपका सहनशील और जुझारू व्यक्तित्व बेहद पठनीय है क्योंकि यह परिवार के मद्देनजर जुड़ कर रहने के बारे में बहुत कुछ सिखाता है। साधारण व्यक्तित्व लेकिन हँसी ठिठोली की भी धनी सबकी प्यारी हैं आप। आपके जन्मदिन पर ढेर सारा प्यार।

यूनिवर्सल माँ के जैसी आँखें हैं आपकी जो सभी की तरफ एक ही करुणा से देखती हैं और समय पड़ने पर अपने बच्चों के बचाव में कड़क रुख कर लेती है।

एक बार जब हम सभी मलाड में एकत्रित हुए थे तब हल्के फुल्के लहज़े में जीजा जी ने एक बहुत बड़ी बात कही थी हँसते हँसते की : आप नींव हैं घर की जो ऊपर दिखाई नहीं देता पर घर उसी पर खड़ा होता है मज़बूती से।

आप बेहद अच्छी हैं। ईश्वर का आशीर्वाद है आपका बड़ी बहन के स्वरूप मिलना । आपके आगामी दिनों में अपार सुख समृद्धि और आराम की कामना है।

सप्रेम
(सारा परिवार)
मैं यहाँ सिर्फ अपना नाम नहीं लिख सकती क्योंकि सभी आपसे इतना प्रेम करते हैं कि अकेले क्रेडिट लेना ठीक नहीं 😍

भारतीय परिवार की कई औरतें सुपर वुमन हैं उनमें से हमारी सुषमा दीदी भी हैं। वैसे ये खुद को बेहद साधारण समझती हैं पर जो मैनेजमेंट स्किल्स इनके अंदर हैं उससे पूरा परिवार तरक्की करता है।