शिक्षा का स्तर

पिता जी ने यह चित्र वाट्सएप्प पर साझा किया आज। हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या।

एक बार की बात है, मेरी मित्र के ग्यारहवीं कक्षा के इकोनॉमिक्स टीचर अंग्रेजी कुछ गड़बड़ बोल जाते थे। लेकिन उनके सम्मान में कोई कमी नहीं थी क्योंकि 2002 में बच्चे थोड़े अधिक संस्कारी हुआ करते थे।

ख़ैर एक दिन कक्षा में पढ़ाते वक़्क्त वे नॉस्टैल्जिक हो गए। उन्होंने जो अंग्रेज़ी में कहा था उसके भावार्थ के साथ मैं यहाँ लिख रहीं हूँ:

जब मैं तुम्हारी क्लास में था चीज़ें आसान थीं।

ये सब मैंने graduation में पढ़ा था। पर देखो समय, आज ये सब तुम 11th में ही पढ़ ले रहे हो।

औऱ गर्व से कहा

“See, level of education has been brought down”

कहने का तातपर्य रहा था की “ऊपर की चीजें अब निचली कक्षा में ही आ गईं।”

लेकिन अर्थ का अनर्थ हो गया था।

प्रीति ने इसकी चर्चा ली, हम कुछ हफ्तों तक याद कर कर हँस लिए।

लेकिन सर ने जो कहा वही चरितार्थ हुआ है।

“Level of education has been brought down”

हुनर ,मेहनत की ज़रूरत इतना भी मत तोड़िये

की दिमाग न्यूरल कनेक्शन बनान भूल जाये ।

इंग्लिश-उर्दू-इंग्लिश

कल मेरे फोन का लैंग्वेज मोड ग़लती से उर्दू हो गया। देख के कुछ समझ ही न आया करे तो क्या करें कैसे किस लिंक को प्रेस करने से वापिस इंग्लिश पर आएं । क्युबिकल में बैठ के घोड़ी देर मैं , दीपिका और रीता इस कारस्तानी और कॉमेडी ऑफ एररर्स पर खूब हँसे। छमाही के अन्तिम सप्ताह में वैसे भी दिमाग का दही हुआ पड़ा था तो ज़रा ज़रा सी बात पर हँसी आये जा रही थी।

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औरत का मन

सभी तरकीबें आप आज़मा लीजिये
आंखों को पढ़ने का दावा भी पेश कीजिये
तिलिस्मी तहखाना है औरत का मन
जानने के लिए अनपढ़ ही मिला कीजिये

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दास्तान-ए-शतदल

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इन रास्तों में राहत मिलती है,गहरी साँस में सुकून होता है,मंज़िल तलाशना भर भी,ज़िंदगियों का हासिल होता है।उम्र सारी कट रही सफर में नहीं किसी दर पे आराम होता हैअपने ही सुनाते हरदम कलम से यारी का यही अंजाम होता है।

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रिश्ते

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जहाँ ज़िन्दगी से कुछ न मांगो
वहां टिफ़िन में दही के साथ कोई
याद से चम्मच रखने वाले मिल जाये
तो भी अमीर होने का एहसास होता है।
बोला तो नहीं था पर जैसे मालूम था
की हाथ बढ़ा के चेक करेंगे तो रखा ही होगा।

ऐसे ही होते हैं रिश्ते। अगर पूरा जीवन एक शरीर मान लीजिए तो जीवन में बने सभी रिश्ते शरीर का अंग होते हैं। हर अंग महत्त्व पूर्ण है, सबका अपना कार्य क्षेत्र है, अपनी उम्र है, जितना ध्यान दिया गया उतना स्वस्थ चले।

उनमें से कुछ रिश्ते दिल हो जाते हैं।

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छाती में खाना अटकने की स्थिति वाला अनुभव और Heimlich manoeuvre की जानकारी

कृपया इस लिंक को क्लिक करें और फेसबुक पर घूम रही इस वीडियो को ध्यान से देखें इसमें Heimlich manoeuvre का असल समय पर प्रयोग होटल मैनेजर Vasilis Patelakis द्वारा दिखाया गया है।

ठीक ऐसी की घटना मेरे साथ घट चुकी है, यह स्थिती इतनी डरावनी थी की जान पहचान वाले मुझे अब ऑफिस में अकेले खाने बैठने नहीं देते ।एक आध बार जब ऐसा हुआ तो थोड़ी दूर टहल चल कर खाना इसोफेगस से उतर गया, लेकिन एक दिन अती हो गयी काफी देर अटका रह गया और कलीग्स जुट कर अपने स्तर से जो मदद कर सकते थे किए, किसी ने पीठ थप थपायी किसी ने छास या पानी पीने दिया, अंत मे चलना टहलना भी काम आया ।

विडीओ में दिया तरीका किसी को मालूम नहीं था और चोक-ब्लॉक बोलस को भोजन-नली से निकलने में उस दौरान काफी समय लग गया था । सन्जोग से मेडिकल हेल्प आने तक में मैं ठीक हो चुकी थी।

बहुत छटपटाहट वाली स्थिति होती है। उस समय मैंने समझा की सबसे ज़रूरी होता है शरीर को जितना शांत रख सकें उतना शांत हो जाना धीरे-धीरे सांस लेने की कोशिश करना वर्ना घबराहट में जो भी भला हो सकना हो वो भी न होगा। मुझे उल्टी नही हो पा रही थी ऐसा लग रहा था की बोलस के नीचे नली में हवा हो , मैं पीठ सीधी कर एक दम चुप चाप शांत बैठी । बीच में टहली भी लेकिन बिना बात किये एकदम शांत होकर। धीरे-धीरे हल्की डकार आयी , तब तक मे देखने वालों के मुताबिक मेरा चेहरा पूरा लाल पड़ चुका था।डकार आने से मैं पानी पीती, फिर अचानक थोड़ा टुकड़ा निकल आया, थोड़ा इसोफेगस से पास हुआ, जान में जान आयी।

इस घटना के बाद मैंने जल्दी-जल्दी एवं बड़े-बड़े कौर खाना छोड़ दिया, खाने को अधिक देर चबाती हूँ। साथ मे अब बात कम करती हूँ । कम से कोशिश तो रहती है कि बेस्ट प्रेक्टिस फॉलो करूं। सुबह अब खाली पेट नहीं निकलती , निकली भी तो अब खाली पेट कॉफी कभी नहीं लेती क्योंकि ऐसा मेरे साथ तब-तब हुआ जब मैंने अधिक गैप के बाद कॉफी पी ली फिर खाना खाया। लगता था जैसे हवा के कुशन पर जा कर खाना इसोफेगस में अटक गया और पेरिस्ताल्टिक मूवमेंट बोलस की हो ही न रही हो।दो बहुत महत्त्व पूर्ण बातें:

1. मैं यह समझ रही थी की मेडिकल हेल्प आने तक हम में से किसी को नहीं पता की करना क्या है इसलिए सबकी की सुनकर कुछ से कुछ करते जाने से बेहतर शांत रहना है, “शांत रहो , चलो, फिर बैठो, पानी थोड़ा-थोड़ा लेकर उल्टी की कोशिश करो” , “दीपिका ने पीछे से आवाज़ दी थी इसे जो समझ आ रहा है करने दीजिए। इसके साथ ऐसा हुआ है पहले भी।”

2. दूसरी यह की मैं लगातार कल्पना कर रही थी की , जब यह स्थिति टल जाएगी सभी आस पास खड़े लोग ज़रा सर पकड़ कर हँसेंगे । मुझे कहेंगे , ” ध्यान रखा करो” औऱ मैं हँसते डरते वापिस अपने क्यूबिकल में काम करने बैठी हूँ। ईश्वर की कृपा से ठीक ऐसा ही हुआ।

प्रज्ञा

तस्वीर साभार : गूगल

बुलंदियाँ

कोई ला के मुझे दे!
कुछ रंग भरे फूल
कुछ खट्टे-मीठे फल
थोड़ी बाँसुरी की धुन
थोड़ा जमुना का जलकोई ला के मुझे दे!
एक सोना जड़ा दिन
एक रूपों भरी रात,
एक फूलों भरा गीत
एक गीतों भरी बात-
कोई ला के मुझे दे!

आदतन मैं सोने से पहले कुछ बेहतरीन कहानियाँ , दास्तानें और आजकल जॉन एलिया की शायरी भी सुनते सोती हूँ ।

इसमें मेरी सबसे पसंदीदा बात है अमर दास्तानगो अंकित चड्ढा जी की सभी यू ट्यूब वीडिओज़ को ध्यान से देखना और उनकी यात्रा से सीखना की जब आप अन्तर्मन से जीवन-यात्रा के लिए जागते हैं तो जीवन छोटा या अधूरा नहीं होता जितना भी हो अपने पूरा होता है।

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