मैं और मेरे रूम मेट्स

#मैं_और_मेरे_रूममेट्स

2008 की तस्वीर है ये, हम सभी रूम मेट्स थे।कश्मीर की सुरभी रैना, बंगलोर की प्रियंका प्रभु, दिल्ली की आस्था सेंड्रा बीचम, मैं बिहार से, ये तस्वीर क्लिक करने वाली हैं सुनीता कौर जिनका घर शायद असम में है।इसमें कुछ मैं भूल भी सकती हूँ लेकिन कहने का तातपर्य यह है कि सुंदर भारत लेकर बसे थे हम मुंबई में। चेन्नई के थोरईपक्कम ऑफिस से एक साथ मुम्बई के लिए सेलेक्ट हुए थे और यहाँ आने के बाद सुरभि, मैं, सुनीता और आस्था हम चार अलग धर्म और क्षेत्र के लोग बच गए थे एक साथ रहने के लिए। फिर प्रियंका आयीं कुछ समय बाद थोड़े समय के लिए।

पहले साल 2008 में हम कांदीवली ठाकुर कॉम्प्लेक्स स्थित गोकुल व्यू सॉसयटी में रहते थे, वहाँ की मकान मालकिन काफी बुज़ुर्ग थीं और उनसे मिलने हम माहीम जाया करते थे। तब हमने समझा की मुम्बई में स्थान की बाहरी आभा कैसी भी हो अचानक एक शनदार दरवाज़ा दिखता है और घर के भीतर इंटीरियर तो क्या ही कहने ,आप अंदाज़ा ही नहीं लगा सकेंगे कि अभी साधारण लिफ्ट से आये सीढ़ियां कैसी सी तो थी , बाहर तक का लुक कैसा भी लेकिन अचानक वहाँ ऐसा नक्काशी किया हुआ घर अचानक ।

अब तो ख़ैर हर शहर में इंटीरियर बेहतरीन होता है लेकिन 2008 में मुम्बई के सम्पन्न घरों की इंटीरियर देख कर मेरा पहला अनुभव अद्भुत होता था । मैं पूर्णियाँ, दरभंगा, राँची, या फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिनों तक वैसे पंच सितारा होटल रूम जैसे घर आम जीवन में नहीं अनुभव कर पाई थी। राँची में मेरी बड़ी मम्मी का घर भी बेहद खूबसूरत रखा था उन्होंने , पर यहाँ तो बाथरूम से बालकनी से बेडरूम से लिविंग रूम तक इटालियन फ्लोर और जैगुआर के तकनीक युक्त फिटिंग्स , क्या लाइटें, क्या सीलिंग सब जगह बेपनाह खर्च तो फिर पैसों की हाय-हाय तो बनती है।

ख़ैर, आँटी हमारे पास एक बार आयीं थीं कांदीवली , उन्होंने मेरे पूजा स्थल पर नौ रूप वाले गणपति की एक छोटी तस्वीर रखी और फिर ग्यारह महीने बाद हम वहाँ से निकल लिए उनको किराया रिन्यू ही नहीं करना था।

तो हम चारों ने ठानी कि अब इतनी दूर कांदीवली में नहीं रहंगे ऑटो का 81 रुपया लगता है। कुछ दिनों तक मरोल और शेरेपंजाब की खाक छानने के बाद आस्था, सुनीता की मेहनत के फल स्वरूप एक बंढियाँ 2 BHK हमें शेरे पंजाब शक्ति बिल्डिंग में रहने मिला था जिसका रेंट अफोर्डबले रहा इसके लिए आस्था की वाक पटुता की तारीफ होनी चाहिए। हमसे तो मोल मोलाई नहीं होता , हूँ हूँ कर के जो सामने वाला कहता मान जाते, आस्था के साथ होने से काफी फायदा हुआ घर में। सुरभि भी बहुत तेज़ तर्रार, कोई सामान या सब्ज़ी खरीदने जाओ तो सुरभि का साथ रहना ठीक था क्योंकि सुनीता को दया ही आ जाती थी वो ईमान से पूरे पैसे ही देना उचित समझती और मैं तो कुछ समझती ही नहीं थी। सुरभि को सारे दांव पेंच पता थे वो कश्मीरी पंडित तो जैसे पेट से सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट सीख कर आई थी, उसकी दुनियादारी की समझ पर मैं आश्चर्य चकित रहा करती।

बड़ा ज़रूरी था इन तीनों का साथ। गोकुल व्यू वाली आँटी ने जो गणपति की तस्वीर लगाई थी वो अब तक मेरे पास है। सुनीता कौर की नानक देव की एक पवित्र किताब भी सफेद कपड़े में लिपटी मेरे पूजा स्थल पर रख दी गयी थी क्योंकि सुनीता ने कहा था कि मैं रोज़ पूजा करती हूँ तो यह उसकी सिख धर्म की उस पुस्तक के लिए सम्मान जनक होगा की ऐसे स्थान पर रखी जाए। वह किताब मेरे साथ ही आ गयी। मैं सुनीता को लौटाना भूल गयी और अभी भी दुर्गा सप्तशती व अन्य किताबों के साथ ही रखी है।

आस्था को अगरबत्ती से प्रॉब्लम थी तो या तो धीरे-धीरे शायद उसके रहते अगरबत्ती जलाना मैंने छोड़ दिया या उसके रूम से निकलने से पहले पूजा समाप्त कर अगरबत्ती का प्रयोग कर लिया करती थी । सब मेनेजिबल हो गया था समय के साथ।

सुनीता कौर देहरादून वेल्हम गर्ल्स की पढ़ी थी, उसकी मानसिक स्वतंत्रता देख मुझे बड़ा अच्छा सा लगता था कि लड़की कितना आज़ाद सोचती है। उसे फिल्मों का पैशन था। वो बताती थी कि यह पैशन उसको उसके पापा से आया है। सुनीता सुबह-सुबह ऑस्कर पुरस्कार वाला टेलिकास्ट कभी मिस नहीं करती थी। इसके साथ ही सुनीता समानता के अधिकार को लेकर बड़ी सजग थी जिसका मुझसे दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहीं था। समानता का अधिकार कौन पेड़ की चिड़ियाँ है ये सब धीरे-धीरे बाहर रहते हुए समझे। हम तो जब छोटे थे मेहतर के टच हो जाने से नहाते थे, देखे थे कि उसके जाने का रास्ता काते कात था और उसको पर्दा भी टच करना एलाउड नहीं था । हम जब से बाहर रहने लगे फिर अपना लैट्रिन-बाथरूम अपने साफ कर रहे थे। कुछ गलत नहीं लग रहा था। लेकिन इतना सब आज कल सोचती हूँ, तब तो कुछ दिमाग नहीं था। खुद के लिए लगता है कि बुद्धि आजीवन ग्रोइंग स्टेट में ही रहेगी क्या। पता नहीं पूर्ण समझदारी कब आएगी।

हम रूममेट्स का समय साथ अच्छा कटा नवंबर 2008 से मई 2010 तक हम साथ रहे। 2009 में बीच मे हमारे साथ कुछ महीनों के लिए हमारी ही कम्पनी की सात साल एक्सपीरियंस्ड टेक लीड जुड़ी थीं, वो ऑनसाइट से लौटीं थीं उन्होंने कम्पनी की एक पोर्टल पर रहने के लिए इश्तिहार दिया था जो आस्था ने देखा और बोला की आपको जबतक नहीं मिल रहा आप हमारी हॉल में रह लो, हमने हमारे लैंडलॉर्ड से बात कर परमीशन ले ली थी और वो दीदी हमारे यहाँ रहने लगीं। वो जल्द ही शिफ्ट हो गयीं थीं लेकिन उनके छोटे से साहचर्य में उनसे मैंने दाल तड़का और शिमला मिर्च की सब्ज़ी बनाना सीखा था। उसी तरीके से बनाये शिमला मिर्च की सब्ज़ी की तारीफ मेरी सास और मेरी जेठानी हमेशा करती हैं तो मुझे वो दीदी याद आ जाती थी। अब वो इस दुनिया मे नहीं रही, बड़ी कम उम्र में 2014-15 में उन्होंने दुनिया से हार मान ली। इनके बारे में और विस्तार फिर कभी क्योंकि इस सत्य का पता मुझे उनकी मृत्यु के पाँच वर्ष बाद 2019 में लगा, 2010 में शादी के बाद मैं उनसे टच में नहीं रही।

2010 में ये बड़ा सौभाग्य रहा कि थोड़ी बहुत ना नुकुर के बाद हमारे कैथलिक लैंड लार्ड रिन्युअल के लिए मान गए थे इसका श्रेय हमारी स्टार आस्था बीचम को जाता है उनकी इंटेलिजेंट वाक पटुता की बात तो मैं बता ही चुकी हूँ। हम नए साल में भी उसी जगह कंटिन्यू कर चुके थे ।इत्तफ़ाक़ से मेरी 11वीं की दोस्त अर्पिता बसु भी नौकरी करने जब मुंबई आयीं तो कहीं अच्छी जगह सेटल होने तक हमारे ही फ्लैट में रुकीं।

एक तरह से रांची के साउथ ऑफिस पाड़ा अरावली अपार्टमेंट, फिर दिल्ली नार्थ कैम्पस में साथ रहने के बाद अब मैं और अर्पिता शेरे पंजाब अंधेरी में भी साथ थे। 2002 – 2010 तक यूँ अचानक बार बार साथ हो जाने के इस क्रम पर हम दोनों बहुत आनंद पाते । अप्रैल 2010 में जिस समय फेसबुक से अधिक ऑरकुट चलती थी उस दौरान मेरी शादी तय हो गयी। मई-जून में मेरे फ्लैट छोड़ने के बाद मेरी जगह बंगालन अर्पिता बसु ने वहाँ कंटिन्यू किया। मुझे उसी शक्ति अपार्टमेंट वाले फ्लैट में सबने बैचलर्ज़ पार्टी दी थी।

आस्था, सुरभि, सुनीता सबसे बहुत प्यार मिला। आज भी फेसबुक के माध्यम से टच में हैं। वे सभी अपने अपने स्तर से जीवन में बहुत अच्छा कर रहे। अर्पिता अब फेसबुक पर नहीं पर वह हमेशा साथ रही आज भी है हमारे 1548 outram lines वाले ग्रुप में दिल से कनेक्टेड। ये बेहतरीन यादें हैं। रेड कार्पेट सी लाइफ के लिये ईश्वर को बेहद धन्यवाद क्या नायाब लोगों से मिलती रही हूँ मैं !

बारिश

मुम्बई की मूसलाधार बारिश में भीगता डूबता है मेरा सनसेट पॉइंट। अपने बेडरूम से भी दुनिया देखते रहने की अपार संभावनाएं हो सकती हैं, न भी हों तो बनाई जा सकतीं हैं और न बने तो लिखी ज़रूर जा सकती है। सम्भवनाएँ तलाश रही हूँ एक कल्पना में जीने की जिसे हकीकत के आस पास जिया जा सके। #बारिश #मुम्बई #भीगाभिगा #मन #बूँदबूँदमें #दर्पण

स्वामी विवेकानंद जी की पुण्यतिथि पर

#SwamiVivekanandaJi

कक्षा तीन तक मैं पटना में रहती थी, महेंद्रू में मेरे घर की हॉल में सामने की खिड़की से ठीक दाईं तरफ की दीवार पर एक लम्बी आयताकार तस्वीर टँगी थी। इस लम्बी आयताकार पोस्टर के व्यक्ति गेरुए वस्त्र में थे, वे हाथ फोल्ड कर खड़े ऊपर की तरफ देखते थे। उनकी आँखों की चमक सजीव थी। वे भव्य, मोहक, आकर्षक गुरु सदृश्य लगते थे और चूँकि न मोबाइल था न डिश टी. वी. न कोई मित्र मैंने हॉल में बैठ कर घन्टों केवल उनके चेहरे को देखा था फिर मम्मी से शिकागो सम्मेलन की कहानी सुनती थी।

मेरे अवचेतन मन पर जिस व्यक्ति का इतना प्रभाव था वे स्वामी विवेकानंद थे इसका आभास अभी इस लेख को लिखते समय हो रहा है ।मुझे उनकी जीवनी, उनके बारे में कहानियां किताबें सब पढ़ना बड़ा अपना सा लगता है। वे मेरे बचपन के खालीपन का बहुत सुंदर हिस्सा हैं। आदमी को कैसा होना चाहिए , आदमी को स्वामी विवेकानंद जैसा होना चाहिए। वे भारत को सही मायने में महान बनाने का रसायन जानते थे। दंत कथाओं में वे और बाबा परमहंस जिनके भी अवतार रहे हों, हमारे लिए साधारण शब्दों में हमेशा यूथ आइकॉन रहेंगे।

एजेंडा आधारित हिन्दू धर्म की राजनीति सेकने वाले लोग आज स्वामी विवेकानंद की तस्वीर को भगवा का अगवा बनाकर बस उसका दुरुपयोग करते हैं लेकिन उनकी इस तुच्छ सोच से न हिन्दू धर्म की व्यापकता कम होती है , न सर्व धर्म सम्मत व्यवहारिकता का पाठ हमसे कोई छीन सकता है। मुझे लगता है मुझपर उनका ही प्रभाव है जो मैं सनातन धर्म की वसुधैव कुटुम्बकम नीति को समझ पाती हूँ और हिंन्दू धर्म का प्रयोग राजनैतिक हितों के लिए करने का विरोध करती हूँ।

मैं कितनी भाग्यशाली हूँ जो मेरे अभिभावकों ने घर पर स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष का पोस्टर बस यूँ ही डाल कर रखा था जैसे लोग मेज़ पर गुलदस्ते सजाते हैं। उनका रूप देख उनको स्मरण कर व्यक्ति सीधा खड़ा हो जाता है, युग मुद्रा में आ जाता है, नतमस्तक हो जाता है, आसपास का शोर कम हो जाता है।उनके नेत्रों को देख एक सहज समाधि में जाने का आनंद मिलता है।

यह एक ऐसा नाम है भारतीय इतिहास का जो निर्विवादित हर धर्म, हर प्रान्त, हर भाषा का आदमी हृदय से लगाये रख सकता है। उससे भी अच्छी बात यह की उनकी पूजा नहीं की जाती। स्वामी विवेकानन्द को मनुष्य मान कर उनका अनुसरण किया जाता है जिससे अपना भी कल्याण करते हैं और व्यक्तिगत कल्याण मार्ग में ही दुनिया का भी कल्याण निहित हो जाता है।

अचानक से विकास मोदनवाल जी की वाल पर स्वामी जी की पुण्यतिथि पर पोस्ट दिख गया और यह सारी बात मस्तिष्क में बहने लगी तो लिख रही हूँ।

हमारा अवचेतन मन जो ढूँढता है उसे वो ही मिलता है। आज सोचती हूँ तो सारे क्रम और घटनाएं समझ आती हैं। विवाहोपरांत और उसके बाद काफी लंबे समय तक मुझे बड़ा मलाल रहा कि एक तो इतनी लंबी मैथिल शादी और जॉब में महज़ तीन वीक की छुट्टी हम कहीं बाहर नहीं घूम पाए।
धीरे धीरे समझ आया की मैं ही कहीं जाने को आतुर नहीं थी। मुझे तो बस जो जैसे हो रहा उसी में सब ठीक लग रहा था। फिर मेरा सौभाग्य ही था की शादी के ठीक बाद कलकत्ते काली घाट जाना हुआ। माँ के दर्शन हुए। फिर इतना सुंदर समय बेलूर मठ में बीता और अनजाने मैं स्वामी जी के पुण्यतिथि के आस पास ही बेलूर मठ में थी। मुझे तो जहां जाना था ब्रह्मांड मुझे वहीं वहीं ले जाने की साजिश करता रहा है मैं नाहक ही समय को दोष देती हूँ।

एक दिन ननद सुषमा दीदी के घर गयी , क़ई किताबें निकाल कर बाहर रखीं थीं उसमें मेरी नज़र पड़ी भी तो फिर उसी छवि पर जो आठ वर्ष की आयु तक मेरे मित्र की तरह रहे थे बन्द घर में सम्बल बन कर। मैंने मेरे भांजे कौशिक से पूछा बेटा मैं ये किताबें ले लूँ। उसने सहर्ष वे किताबें मुझे दे दी।

किताबों को तमन्यता के साथ पूरा पढ़ गयी और स्वामी जी के प्रति मेरी भावना को ज्ञान से भी परिपूर्ण किया। बहुत सी बातें थीं जिसका मुझे आधा अधूरा ज्ञान था जो कोई अच्छी बात तो नहीं। जिनसे इतना प्रेम हो उनके बारे में पढ़ना उनको साधना ज़रूरी है नहीं तो सब फर्ज़ी का दिखावा है।

उन दो किताबों में से एक स्वामी जी की कहानियों की कॉमिक्स बुक थी जो मैंने अभिज्ञान अंशुमन को चाव से सुनाया। उनको भी रूचि आयी। आज उनकी पुण्यतिथि पर अचानक इतना कुछ लिख गयी।

यदि यह संस्मरण पढ़ने में अच्छा लगे तो इसमें मेरा क्या श्रेय, श्रेष्ठ पुरूष की बातें श्रेष्ठ ही होती हैं यह लेख आज स्वामी जी के श्री चरणों में, बाबा परम हँस जी के श्री चरणों मे पूजा सदृश समर्पित।

फूल मालाएं और आह्वान तो मुझसे हो नहीं पाते एक जगह बैठ सोचना पढ़ना और कुछ अनाड़ी सा लिखते रहना ही मेरी समझ से मेरी पूजा अर्चना है। मुझे दोबारा बेलूर मठ जाना है।

सोचती हूँ आज मैं भी लाइफ साइज़ पोस्टर ऑर्डर कर ही लूँ स्वामी विवेकानंद की लेकिन अभी-अभी तो मैंने बच्चों को उलझाने के लिए वर्ल्ड मैप और भारत का मानचित्र मंगाया है , मेरे घर मे जाने कौन सी जगह हो जहां स्वामी जी बस पाएं, लेकिन पोस्टर मंगाना तो है अब जब कहीं लग जायेगा पोस्टर तो बताऊंगी तस्वीर डाल के।

क्या जाने इस लेख को क्या कहा जायेगा, इस संस्मरण में तो मेरा अभी-अभी का यह समय भी घुलता जा रहा है, मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि वह क्या बात थी जिसने मुझे विषम परिस्थितियों में ऐसे अडिग रखा जैसे योगी एक पैर पर साधना में अडिग रहता है। इस क्षण मुझे यह प्रतीत हो रहा है कि मेरे व्यवहार, मेरे विचार , मेरे व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा हैं स्वामी विवेकानन्द अनजाने मैंने मेरी सारी ऊर्जा वहीं से प्राप्त की है मैंने जिस किसी भी इष्ट को प्रणाम किया हो मेरा रोम रोम स्वामी विवेकानंद को हमेशा याद करता रहा है। अपने आप को ढूँढते रहना एक सतत प्रक्रिया है , हमें लोग मिल जाते हैं , लोग छूट जाते हैं , लेकिन हम अपने आप को नहीं मिलते। फिर भी खुद को ढूंढ़ने में मुझे हमेशा अच्छे राही मिले।

रही मर लेकिन राह अमर।

एक कविता कक्षा नौ में दरभंगा हवाई अड्डा केंद्रीय विद्यालय में रहते हुए पढ़ी थी, जिस जिस से पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद।

यदि हम किसी को आकर्षक लगते हैं यदि हमें कोई आकर्षक लगता तो मान कर चलिये की कोई आकर्षण नहीं ढूँढ रहा सब अपने आप को खोज रहे हैं।

कोई इष्ट एक ऐसी छवि जो चट्टान सी अडिग हो उसे साधना अपने आप तक पहुंचने की एक सीढ़ी हो सकती है। मेरी दादी माँ मेरे जीवन में ऐसी दूसरी शिला थीं, जिनका प्रेम शिला लेख बन कर मेरे हृदय में इस जीवन में अंकित हो गया है और जबकी वे भौतिक रूप में नहीं हैं मैं उन्हें कभी छोटी दादी के चेहरे में ढूँढती हूँ कभी आशू भैया की बेटी आशी के चेहरे में। मेरी खोज बेवजह तो नहीं यूँ स्वामी जी से जुड़ी बातें मिलते जाना इसका इशारा है कि मेरी खोज की दिशा सही है। हो सकता है जीवन के बहाव के साथ ही बढ़ते रहने के मेरे सारे निर्णय भी सही ही हों।

मुझे सुखी सम्पन्न जीवन देने के लिए पहले मेरे पापा को फिर ईश्वर को धन्यवाद।

स्वामी विवेकानंद जी आपको सादर प्रणाम मेरे जीवन का आधार सही मायने में आप ही हैं।

आज सुबह आर्ट ऑफ लिविंग के हैप्पीनेस प्रोग्राम से थ्री स्टेज प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया करने के उपरांत जब अंदर का सारा शोर समाप्त हुआ, दिमाग शान्त हुआ है तब जाकर भीतर से यह सारी बातें निकली हैं।

Pragya Mishra

मेरे छोटे पापा छोटी मम्मी की चालीसवीं वैवाहिक वर्ष गाँठ

2 जुलाई को मेरे छोटे पापा प्रताप झा और छोटी मम्मी पूनम झा की चालीसवीं वैवाहिक वर्ष गाँठ मनायी गयी। इससे पहले की स्मृतियाँ कलम से धाराप्रवाह निकलने लगें रुक के एक बधाई लिखनी चाहिए।

आप दोनों को बहुत बधाई।

प्रस्तुत कविता अभी से दो वर्ष पूर्व 8 फरवरी 2018 को आप दोनों के वैवाहिक जीवन से प्रेरणा लेकर लिखी थी। आप हमेशा से जीवन के रसास्वादन का हुनर अप्रत्यक्ष रूप से सिखाते रहे हैं, अनुशासित और संयमी जीवन में रहते हुए शादी-शुदा जीवन के शानदार चालीस वर्ष तय किये आपने।

जीवन तुम इत्मीनान धरो

जीवन तुम इत्मीनान धरो

ऐसी भी क्या भाग दौड़
सम्बन्धों में धैर्य भरो
मिलना जुलना भी ज़रूरी है
सैर सपाटे जाया करो
जीवन तुम इत्मीनान धरो

परिवार नहीं बैंक की एफ डी
फाइल किया और लाभ लिया
ये तिनका तिनका गुल्लक है
हर दिन जिसको सिंचित किया।
इस संचय का रसपान करो
जीवन तुम इत्मीनान धरो।

मैं विभोर मैं कितना कौतुक,
अब हाथ कमर इठलाता हूँ
वहीं खड़ा मन की रेलिंग पर
उंगली पे गिनता जाता हूँ
हैं जितने पेड़ पहाड़ों पर
उतनी अंगड़ाई रोज़ भरो
जीवन तुम इत्मीनान धरो।

मेरी छोटी मम्मी कुशल गृहणी हैं, बच्चों की परवरिश पर केंद्रित जीवन रहा है। उनसे एक बार बात हो रही थी मेरी तो उन्होंने कहा था की बेटा हम लोगों का जीवन , तो अब निकल गया तुम लोगों का ज़माना है जियो जैसे जीना चाहती हो। हमारे लिए निर्णय लेना आसान रहा है हमने वही चाहा , वही किया, उसी रास्ते गए जहाँ तुम्हारे छोटे पापा चाहे और ऐसा करने से जीवन आराम से ही कटा । अगर देखूँ तो ये प्रेम का वो रूप है जहाँ पति और पत्नी की आइडेन्टिटी मिक्स होकर ऐसे उभर कर आती है जहां आप उस जोड़े को एक दूसरे के बिना इमेजिन नहीं कर सकते। ये जोड़ा ऐसा ही नैसर्गिक जोड़ा है जहां पति एक उम्र बाद पिता की तरह ज़िम्मेदारी ले लेता है और पत्नी एक उम्र बाद माँ की तरह सब सम्भाल लेती है। यह परस्पर होता है इसमें कोई किसी पर भारी या किसी से कम नहीं होता।

कुछ दिनों में छोटे पापा अपने जीवन का सठवाँ बसंत देखेंगे। उनके रिटायरमेंट का साल होगा 2020 । छोटी मम्मी नहीं रिटायर होंगी स्त्रियाँ आजीवन होम मेकर पोस्ट पर कार्यरत रहती हैं।

अद्भुत जीवन की कितनी कहानियाँ हैं निश्चय ही उनके पास जिसमें दोनों पति पत्नी ने साहस से , सशक्त होकर होनहार बेटा, काबिल बेटी तैयार किये। अपने बच्चों की आगे की दुनिया बसाने के लिए एक एक निर्णय सम्भल सम्भल कर लिया।

जीवन के बीज चुन चुन कर बोए, उनको प्रेम पूर्वक खाद पानी दिया । छाँव में सहेजा, समय समय पर धूप दिखाई और आज एक हरे भरे वटवृक्ष सा परिवार उन्हें छाँव में रखने को तैयार खड़ा है जिसकी ओट में वे इत्मिनान से घण्टों बैठ सकते हैं।

घर,तसवीरें, किताबें, यादें, सब बड़े ध्यान पूर्वक सहेजते हैं छोटे पापा और छोटी मम्मी। अनुशासन ही जीवन रहा और बातों में भरपूर मस्ती। छोटे पापा लिट्टी चोखा अच्छा बनाते हैं।
छोटी मम्मी खीर बहुत टेस्टी बनाती हैं।

मैं आज तक और शायद मेरे बुढ़ापे तक जब भी खीर बनाउंगी यही याद करूँगी की मैंने खीर छोटी मम्मी से बनानी सीखी, जब मैं क्लास 8th में थी।

जीवन जो सहेज कर, कष्ट को खुद तक रोक कर सुंदर पीढ़ी तैयार करने वाले हमारे बड़े बेहद आदरणीय हैं और इनसे जुड़ी सभी स्मृतियाँ सहेजने योग्य।

Pragya Mishra “प्राची”

सबसे उदास क्या होता है?

सबसे उदास क्या होता है
शायद उस बच्चे में
अपने प्रति डर और दहशत भर देना
जिसका एक मात्र आधार आप हैं
या शायद ऐसे किसी विक्षिप्त से
कर बैठना प्रेम जिसमें सुधार की
न बची हो कोई गुंजाइश
या शायद दोहराना हुए अत्याचारों को
नए शरीर से नए शरीर पर।

सबको मालूम है कि
अच्छा बनने का स्टेंडर्ड प्रोसीजर
अच्छा बनने से शुरू होता है,
इसलिए अच्छा बनने से ज़्यादा ज़रूरी
अच्छा बनने का ढोंग होता है
जो सबसे बुरे थे उन्होंने ढोंग ही नहीं किया
वर्ना सिर्फ ज़िंदा नहीं
मौजूद भी होते।

Pragya Mishra