डायरी 3 अगस्त 2020

सभी मित्रों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं। अगला दिन शुरू हो चुका आज रक्षाबंधन है, कोविड में फीका पड़ गया त्योहार लेकिन प्रेम से मनाएंगे। प्रेम ही बचा रहेगा, प्रेम ही हमें बचाएगा। प्रेम ही हमारी आख़िरी उम्मीद भी है।

दिल बैठ जाता है दोनों बच्चों का बंद घर में निकलता बचपन देख कर। कभी तो डाँट देती हूँ पढ़ने के लिए, कभी फिर छोड़ देती हूँ टीवी या लैपटॉप देखने के लिए , कभी कभी साथ किताबें भी पढ़ती हूँ। कभी पढ़ाती हूँ कोर्स के बुक। लेकिन दौड़ दौड़ खेल नहीं सकते। मुंबई में छठे माले पर पाँच महीने से बंद आठ और तीन साल के मेरे दो बच्चे अब नीचे जाने की ज़िद नहीं करते ।

कल तीन वर्षीय अंशुमन ने अच्छी पैंट, शर्ट मोज़े और नई सैंडल पहनी तो धीरे से कुम्हलाई आवाज़ में बोला “कार में जाना है” जैसे उसे जवाब में ना की उम्मीद थी पर शायद पूरी हो जाने की ललक। हम उसे लिफ्ट से लेकर सीधा कार में गए, ठाकुर व्हिलेज के एरिया में राउंड मारा, थोड़ा आगे जाकर मागठने प्रेटोल पम्प से पेट्रोल भरवाया बीस लीटर क्या जाने कहाँ जाने के लिए पर भरवाया , फिर कौआ उड़ान लेकर बोरोवली नेशनल पार्क छूते हुए घूम गए , वापस गंतव्य की ओर। अंशुमन नींद में थे पर सोए नहीं , एक टक देखते रहे स्ट्रीट लाइट, गगन चुंबी इमारतें, हल्की बारिश में भीगी सड़क । अभिज्ञान, भाई को सामने की सीट पर प्यार से पकड़ खिड़की से देख पाने में समर्थ बनाये हुए थे।

बच्चे कुम्हला गए हैं। नाखुश हैं। उनको दौड़ना है, खेलना है,उन्हें वे दोस्त चाहिए जो उनके विकास का हिस्सा हैं, माता पिता दो कमरे के मकान में कितना भी प्यार लुटा लें सारी ज़रूरत एक बच्चे के विकास की नहीं मुहैया कर सकते। कोरोना बचपन चुरा रहा है। जब हम बच्चे थे हमारे माँ बाप की आर्थिक स्थितित या अन्य सामाजिक परिस्थितियों ने हमारा बचपन चुराया , हमारे बच्चों का बचपन एक महामारी चुराने चली आयी। तमाम खुश रहने के प्रयासों में कभी कभी उदासी घिर जाती है।

इन सबके बीच आज अचानक सोच रही कि अब किसी बात के लिए दोनों बच्चों को नहीं डाटूंगी , ज़्यादा प्रेम से रहूँगी, प्रेम से ही इम्युनिटी है। खिले खिले रहें मेरे बच्चे, वे ही जीवन का मकसद लगते हैं। वे जब सो जाते हैं तो उन्हें देख कर हर रोज़ लगता है कि जितना प्रेम कर सकते थे उतना किय्या नहीं, जितनी कहानियाँ सुना सकते थे उतना कहा नहीं। नई किताबें मंगवाईं हैं इकतारा प्रकाशन भोपाल से ,उदयन वाजपेयी की घुड़सवार कहानी संग्रह से अंशुमन को कहानियाँ सुनायी है, एक बहुत लंबे राजा की कहानी जो लेट नहीं सकता, झुक नहीं सकता , बस आसमान से पर्चे फेंक फेंक मंत्रियों को उटपटांग फरमान देता और अपने कद के कारण बीवी से वियोग में जीता है।

कहानी सुनते सुनते अंशुमन सो चुके हैं। उनकी तबियत आज ठीक नहीं इसलिए मेरी नींद भी उड़ी हुई है, घबराहट है, कोरोना का समय है घबराहट स्वाभाविक है, हमारी सोसाइटी में काफी कोरोना मरीज़ हुए एक-एक कर वे सब ठीक भी हो गए हैं। यूँ तो हम नीचे नहीं जाते, किसी से नहीं मिलते फिर भी क्या पता कैसे आ जाए यह वायरस।

डर है इस समय इससे इनकार नहीं। आलोक एक ज़िम्मेदार पिता हैं। उन्होंने पूरे विश्वास के साथ कहा है घबराओ मत , मैंने उनका हाथ पकड़ कहा है मुझे उनपर भरोसा है। बच्चों के मामले में मुझे हमेशा उनपर अधिक भरोसा रहा, कारण है उनकी अपनी परवरिश बहुत शानदार हुई मेरी सास एक बहुत ही सशक्त महिला हैं, बचपन अच्छा समेटा उन्होंने अपने बच्चों का, परिणाम स्वरूप मेरे पति आलोक बेहद सन्तुलित औऱ व्यवहार कुशल व्यक्तित्व के धनी हैं।आसानी से विचलित नहीं होते। मेरे बच्चे भी ऐसे हों जैसे मेरी सास के बच्चे हैं।

जाग रही हूँ, देख रही हूँ बगल में सोए अंशुमन को। बच्चे का कण कण प्रेम से बनता है। मेरी नौ घन्टे की नौकरी, घर बर्तन, कपड़े के बाद कितना कम प्रेम बचता है मुझमें। इस प्रेम को चिड़चिड़ाहट में बदलते देर नहीं लगती। मैंने इतनी मनोविज्ञान की जानकारी के बावजूद इस बच्चे पर हाथ उठाया है इस कोरोना दौर में जिसके नियंत्रण की पुरज़ोर कोशिश जारी है। थोड़ी सी धूप मेरे हिस्से का विटामिन डी मुझे भी चाहिए और मैं एक सफल माँ रहूँगी। मेरे बच्चे प्रेम से बड़े होंगे। वे मुझसे प्रेम करेंगे। मैं उनके जीवन में शामिल रहूँगी । उनके पास मुझसे जुड़ी अच्छी यादें होंगी। ये समय जल्दी बदलेगा, नीचे झूलों पर बच्चे जल्दी जाएंगे।

नींद की बिसात बिछते ही घटनाक्रम अपनी चाल चलने लगते हैं । बातें कौंधने लगती हैं, दोनो अँगूठे स्वार्थी होकर गूगल इंडिक कीबोर्ड पर रुकना नहीं चाह रहे।

एक नोटपेड में लिखे कुछ नोट्स यहाँ संकलित कर लेना चाहिए, वे अच्छे विचार थे। कल या परसों ही मैं जाने माने व्यक्तित्व रवि कुमार रवि जी के फेसबुक पेज पर सफ़रनामा देख रही थी जिसमें परिचय हुआ कानपूर के अन्तर्राष्ट्र्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार दम्पति आदरणीय श्रीमती ममता किरण और श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी जी से। तमाम अच्छी बातों में जो बातें मैंने अपने साथ रख लीं वो आपसे साझा करती हूँ।

कविता मनुष्यता की आख़िरी उम्मीद है,
कविता मनुष्यता की भाषा है।

कवि, घृणा के पक्षधर नहीं हो सकते, साम्प्रदायिक नहीं हो सकते।

हिंदी रचना में माहिया छंद विधा के बारे कल ही सुना मैंने , श्री बाजपेयी की यह पँक्तियाँ सुनी:

जीवन एक लोरी है
झूला सपनों का
औ वक़्क्त की डोरी है।

श्री बाजपेयी साहित्यिक विधाओं के संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने अपने टॉक में दोहा विधा पर बल दिया।

आज मैंने अनवारे इस्लाम सर को कॉल किया । उनको अपना लिखा दोहा भेजा था उसमें बहुत त्रुटियाँ थीं। उन्होंने नियम बताए और प्रयास करने कहा, उसी क्रम में बात हुई। अभी बहुत सीखना है। उन्होंने कहा मेरे लेखन में बिखराव है बातें स्पष्ट नहीं होती। यह पढ़ने और शब्द भंडार पुष्ट करने से बढ़ेगा। उन्हें 1993 -94 के दौरान बाल साहित्य चकई के चकदुम के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था यह जानकर बड़ी हार्दिक प्रसन्न्ता हुई। उनकी कविताएँ अंशुमन और अभिज्ञान प्लूटो बाल साहित्य मैगज़ीन में पढ़ते हैं।

फेसबुक फीड्स में दरभंगा में बाढ़ की स्थिति के बारे में देखा था। ननद गीता दीदी से बात हुई। काफी दिक्कत में हैं लोग अभी वहाँ। जन जीवन अस्त व्यस्त है। घुटने भर पानी तीन चार दिन से लगा।

मैथिली भाषा के कवि मणिकांत अंकल जी से भी बात की । चूंकि इस समय दरभंगा शुभंकरपुर बाढ़ पीड़ित क्षेत्र है, बड़ी समस्या उतपन्न हो गयी है। मेरे बचपन से जुड़ी सुंदर यादें हैं उनके आंगन से तो मन विकल हो गया, बाढ़ में डूबे उनके घर गलियारे देख। मैंने उनके साहस के लिए उनको धन्यवाद कहा , कितना अद्भुत है इस पीड़ा में वे निरन्तर रचनाएँ कर रहे और सुख दुख प्रभु को अर्पित करते चल रहे। उनकी रचित एक शिव नचारी बहुत पसंद आयी मुझे जो आज मुझे बड़ा ढाँढस दे रही वह इस प्रकार है:

नचारी
——–
उबारु आब हे शंकर
कते मन घोर कयने छी
नैना नोर देने छी
भटकलहुँ भरि जीवन हम
किए ने छोड़ धयने छी
नैना नोर देने छी।

कहू की हम अपने सँ
बूझी शंभु सकल बतिया
नुकयने हम सब दुखरा
रहय छी दाबि क’ छतिया
कोना क’ नाम अढरण ढर
अहां के लोक रखने छी
नैना नोर देने छी।

कते दिन धरि एना रखबय
अपन संतान के दानी
अहाँ सन तात के रहितो
कहू जे हम सब कानी
बचाबू लाज त्रिपुरारी
चरण अहींक धयने छी
नैना नोर देने छी।

अज्ञानी हम छी बाबा
ज्ञानक लेस नहि हमरा
लिखय छी गीत के बूझिकय
लिखा जाइए ई फकरा
मणिकांतक बोल के सुनियौ
एना किए अंठैने छी
नैना नोर देने छी।

-मणिकांत झा, दरभंगा, ३१-७-२०२०ई०

इस नचारी को आप गूगल लिंक पर सुन सकते हैं।

नचारी-उबारु आब हे शंकर
स्वर – भागवताचार्य राजीव कृष्ण भारद्वाज
रचना – मणिकांत झा

सोशल मीडिया एक बड़ा ही शक्तिशाली स्कूल है हमको तय करना है कि हमें क्या देखना है, क्या सीखना है, किनको अपनी मित्र सूची में शामिल रखना है किस स्तर के फीड और स्टोरी अपनी आँखों के सामने से गुज़रने देना है। जीने का तरीका बदल रहा है। सीखने का ज़रिया बढ़ रहा है।

अंकल से बात के दौरान मैंने उनसे कहा कि आज मित्रता दिवस पर क्या आप कुछ नहीं लिखे, उन्होंने मैथिली में कहा और यह रचना भेजी:

मित्रता दिवस
————–
भरि दुनियाँ मे शत्रु ने कियो
दिवस कथीक मनाबी
तइयो दू चारि पाँती लिखि क’
अपना मनक बूझाबी ।

सकल विश्व मे धूम मचल
मित्रक लेखे दिवस विशेष
हमरा भीतरी मनक पुछी
बारहो मास बरोबरि एक ।

एक दिन मे कते सम्हारब
फेसेबुक पर पांच हजार
ट्यूटर व्हाटसेप गनती कयने
संख्या बढ़ल देखब अपार।

हमरा सब तँ अनुगामी छी
ओ वसुधैव कुटुम्बकम्
तखन कहाँ स्थान भेटय छै
कहिए मै आ कि हम।

हीत अपेक्षित सर संबंधी
अभिवादन सबके एकहि संग
मणिकांतो छथि एहि समाज मे
रंगा गेलनि एक रंगा रंग।

-मणिकांत झा, दरभंगा, २-८-२०

अंकल ने मेसेज कर कहा – “ई तँ अहींक कहला पर लिखायल नहि तँ अंठैले छल”

समय साक्षी है कि मणिकांत अंकल की लेखनी पर काली मैया और भगवान शिव का अशीर्वाद है अगर उसमे से एक भी रचना आज मेरे अनुरोध पर हुई तो मेरे लिए ऐतिहासिक क्षण है 3 जुलाई 2020, इस तारीख को सहेज कर रख रही हूँ।

आगे दिन ढलने के क्रम में रिंकी झा नाम की एक फेसबुक मित्र का स्वरचित कविता वीडियो देखा , सुना और सुन कर बार बार सुना। कविता का शीर्षक था प्रेम।

कितनी प्यारी लड़की, कितनी प्यारी कविता , कितना सहज प्रेम।दो दिन में पचासों बार सुन चुकी हूँ रिंकी झा की ये मैथिली कविता। मैं ज़्यादा नहीं जानती रिंकी को, इसी कविता के माध्यम से जान रही, हम कुछ समय से फेसबुक मित्र हैं । यह ज़रूर कहना चाहूँगी ये इतना सुंदर है कि हर कोई इस कविता को अपनी भाषा मे अनुदित करेगा।

कविता लिंक यहाँ दे रही आप भी सुनिये ।

आज का कुल घटना क्रम इतना ही। काफी कुछ घटित हो गया एक ही रविवार में । अंशुमन इत्मिनान से सो रहे हैं। बुखार उतर गया है ।

मुम्बई

3.46AM

लिंकिन_पार्क

अरावली अपार्टमेंट, साउथ ऑफिस पाड़ा, राँची। फ़लैट #302 में बालकनी से लगा कमरा । वहाँ खिड़की से सटा था तीन फट्टे वाला बिस्तर। बिस्तर के बगल में लकड़ी की मेज़, मेज़ पर पिंक टेबल क्लॉथ। दो लीटर की पेप्सी का पानी बोतल और सारा दिन पानी पीती मेरी रूममेट अर्पिता बसु यहाँ रहती थी।

साल 2003, दीवाली की रात को कोक और 20 रुपये वाला कुरकुरे गटकते हुए अर्पिता बसु ने मुझसे कहा था ,
” प्रज्ञा तुम linkin park को ज़रूर सुन लेना। इतना अच्छा है तुमको ज़रूर पसंद आएगा।”

ये वो दौर था जब रंगोली शरन के पोर्टेबल सी डी प्लेयर पर सभी बारी बारी कब्ज़ा जमाते थे। बहरहाल मुझे अंग्रेज़ी समझ मे तो दूर बोलनी भी नहीं आती थी तो जितने गाने अर्पिता ट्यून इन करती रहती उसे ही सुनते सुनते दोनों ट्रिग्नोमेट्री बनाते थे। हमने कैल्कुलस हमेशा अलग अलग कमरों में चुप मार के बनाई।

ब्रायन एडम्स औऱ अर्पिता के सानिध्य से जब सीधा कविताई की भाषा में ही अंग्रेज़ियत वाली पिकचरों से प्यार हुआ था तब तक दिल्ली पहुँच चुकी थी। याद नहीं प्रीति औऱ अर्पिता के साथ आख़िरी दिन राँची का कैसा था। हम सब रोये तो थे। हमारे जूनियर्स अदिति, मधुरिमा, उलूपी, शिल्पी, मेघा(इसका नाम नहीं याद आ रहा इसने हमें प्लेनचिट सिखाई थी, ये मुझे बहुत प्रेम करती थी, इतना की इसने अपना सारा स्टैम्प कलेक्शन मुझे दे दिया था , ये एक गाना बहुत अच्छा गाती थी -“जीवन से भरी तेरी आँखें , मजबूर करें जीने के लिए, मगर इसका नाम नहीं याद आता आज ) हम सब रोये थे, वो भी रोये थे।

जुलाई 2004 में श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में एडमिशन के इत्मिनान के बाद, मैं पापा के साथ 1548 outram lane के गेट पर खड़ी थी, अंदर अंधेरा सा था , भूरी चमकीली टाइल्स वाला बड़ा हॉल, कोने में फाउंटेन था , जहां आगे चल कर स्वाति रॉय ब्लू पजामे और ब्लू हेयर बैंड में अपनी आइकोनिक तस्वीर लेने वाली है। लोहे की कुर्सियाँ लगीं थीं, लड़कियाँ छोटा सा सोनी कलर टीवी देख रही थीं जो आने वाले तीन सालों तक मेरा इंग्लिश टीचर होने वाला था। टी वी के ठीक सामने एक लड़की बैठी थी जिसके वहाँ होने के कोई आसार नहीं थे। वो अर्पिता थी।

“अर्पिता तुम!!!!!!!”
“प्रज्ञा तुम !!!!!!!!!!!”

डेस्टिनी होती है। समय की चाल किसी ने नहीं देखी। पर समय सबको देखता है, समय सबका बाप है। अब अर्पिता तीन साल मुझे देखने वाली थी और मैं उसे लेकिन वक़्क्त थोड़ा और मेहरबान हो गया और स्वाति राय , रायना पांडे, कृतिका किसलय, फिर 1548 के अन्य नायाब साथी भी मिले एक घोंसले में सिमटे उड़ने को तैयार पंछियों की तरह। स्वाति बैनर्जी के साथ वाले रोचक किस्से कभी और लिखूँगी। आज उसका नाम ज़ेहन में आते से पीड़ा उभर आयी है जिससे वो गुज़र रही। द नेमसेक की कहानी याद आती है मुझे । मैं स्वाति की ज़िंदगी मे आभासी तौर पर शामिल हूँ लेकिन उसका दुख हम सभी के दिल मे ज़िंदा मौजूद रहेगा। कोरोना काल में मां बाप से दूरी औऱ ऐसे बारी बारी दोनों का गुज़र जाना कितना भारी है ये समझती हूँ मैं। पापा की बहादुर बिटिया स्वाति बनर्जी यू एस में पति के साथ रह रही और अपनी बेटी को एक शानदार परवरिश दे रही है।

2006 में बड़े पापा 1548 में एक कम्प्यूटर मुझे दे गए थे, यह बहुत काम का निकला इसपर ही याहू मेसेंजर , रेडिफ बोल, ऑरकुट और अन्य चैटिंग के गुर सीखे। ट्रिपल आई टी के एक सख्त मिश्र बंदे से लड़ाई के बाद उससे ही जिस एक शब्द की सही स्पेलिंग सीखी थी वह था -” male chauvinism “.
हमारे शाही कमरे में फिट कम्प्यूटर पर जो काम हमने सबसे ज़्यादा किया वो था तरह तरह के गाने लगा कर ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के कनवर्जन्स या इनऑर्गेनिक के नोट्स बनाना। बेसिक की प्रोग्रामिंग तो घन्टा कभी नहीं की मैंने। पत्ता नय ये कम्प्यूटर एज अ सब्जेक्ट कब आना बंद होता। फिज़िकल केमिस्ट्री बहुत भारी था। उसके टाइम गाना नहीं सुन सकते थे । तब चुप मार के करी पढ़ाई हमने। लेकिन आगे ज़िन्दगी ने झख मार के मास्टर्ज़ इन कम्प्यूटर एप्लिकेशन ही कराई ।
अच्छा ये जो घन्टा शब्द अभी अभी मैंने उपर यूज़ किय्या है न वो साल 2018 के बाद बने यू पी के फेसबुकिया मित्रों की वाल पोस्ट्स अथवा कमेंट्स से बतौर ट्रेनी उठायी है।

2006-7 के दौरान में अर्पिता ने वही पुरानी बात बोली, लेकिन अब तरीका नया था, मैं नयी थी, मेरा नाम नया था!
“प्रग्गी, तू linkin park सुन तुझे मज़ा आएगा, यू नो इट हैंज़ दिस रिबेलस हीलिंग इफेक्ट यू वुड फॉल इन लव” ..

धीरे-धीरे अर्पिता ब्लैक आइड पीस पर आ गयी और लिंकिंग पार्क की बातें नहीं होती थीं। मैं रोज़ ट्वेल्व मिड नाइट से थ्री ए. एम. तक स्टार मूवीज़ , एच. बी. ओ., पर जीने के लिए जाने लगी।पढ़ाई करती थी, ये मत सोचिये नहीं करती थी। खालसा कॉलेज के केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में पहले साल में पहली पोज़िशन , दूसरे साल में दूसरीं पोज़िशन और तीसरे साल में तीसरी पोज़िशन टॉप थ्री बरकरार था अपना आख़िर दिव्या माटा, रितिका नागपाल , आशिमा अग्रवाल भी यार थे अपने यारी की नेकनामी में हमने पोज़िशन भी शेयर कर लिये आपस में लेकिन मेहनत करी जी तोड़ । तो खूब सारा पढ़ने के बाद होस्टल में होती थी दो मूवी, दिन को डाइजेस्ट करने के लिए स्लीपिंग पिल्स की तरह ।

वक्त बदला, हम बदले, दूरियाँ आ गयीं, पर दिलों में नहीं, एक हवाई जहाज की दूरी बस। मैं याद करती हूँ सबको। सबने मुझे कभी न कभी बताया है वो भी याद करते हैं। पर सारे मेरे दोस्त मेरे ही जैसे निकले हम सब बातें बहुत कम करते हैं। अर्पिता ने तो 2012 में सोशल मीडिया को भी टाटा कर दिया , अपने आप से अपनी लड़ाई में साल 2018 में अर्पिता ने जान लिया कि उसकी डेस्टिनी शेयर मार्केट्स की स्टडी है औऱ इसी में उसका मन लगता है एंड देयर शी इज़।

अर्पिता, आज 24 जुलाई 2020 को अचानक लिंकिंग पार्क लगा ही दिया यू ट्यूब पर। तुम्हारी मेहरबानी से मुझे इतनी अंग्रेज़ी तो आती है कुछ सालों से। बस याद ही नहीं रहा था कि ये सुनना था मुझको। आज सुन लिए सब गाने , सबकुछ डाइजेस्ट करने के लिए , स्लीपिंग पिल्स की तरह।

आप ये पढ़ रहे हैं तो आप भी सुनिये , सभी सुनिये , अच्छा है। मैंने नाहक ही 2003 से 2020 कर दिया केवल एक गाना सुनने के लिए । मैं किचन में खड़ी कभी भी लगा सकती थी,
बट यू हैव टू टच अ सर्टेन लो टू फील इट एंड दन यू लिसन इट

Pragya Mishra
24 जुलाई 2020
4:05AM
PC – आलोक मिश्र, साल 2011 का जुलाई

डायरी बचपन की

ये साल 2002 से 2012 तक की डायरियां हैं। नए साल में पापा गिफ्ट किया करते थे। इनमें प्रतदिन के खर्च से लेकर किसके साथ क्या ग़लत व्यवहार किये , कहाँ कहाँ सुधार और समय सदुपयोग की आवश्यकता है, कितना समय पढ़े नहीं पढ़े उसका हिसाब है। ये अब भी बाहर वाले कमरे में मम्मी जी की अलमारी में बने सबसे ऊपर वाले शेल्फ पर एक कार्टन में सुरक्षित हैं।
2013 के बाद से हाथ में स्मार्ट फोन आया , फिर बहुत कुछ बदल गया, अच्छे के लिए बदला या ख़राब के लिए ये तय नहीं किया जा सकता क्योंकि सब समय के साथ बदला।
2014 के बाद मेरे अपने प्रति सुर बदल गए , मैंने क्रिटिकल होना छोड़ दिया और पाश्चात्य जगत के अवचेतन मन विज्ञान वीडिओज़ देख के, उन सब की लिखी किताबें पढ़ के “लव योर सेल्फ” मेरी डायरी में ज़्यादा आने लगा। सोनी एक्सपीरिया के बाद सैमसंग नीओ का नोट मेरे साथ कागज़ से ज़्यादा रहने लगा।
2015 में घर की एक शादी में जब फोन चोरी हुआ तब फिर ठानी की डायरी में लिखते तो ये हाल नहीं होता, सब चला गया। फिर जिन मित्रों को जो कुछ भेजा था उन्होंने फारवर्ड किया कुछ फेसबुक पर से मिला। पर अब डायरी की वो आली आदत नहीं रही मुझे।
प्रमोद जीजा जी, मेरी बड़ी ननद सुषमा दीदी के पति एक LIC की डायरी हर साल देते हैं मुझे और आलोक को ।
पर वे अब म्यूज़िक क्लास के नोट्स लिखने के।काम आती हैं या एम ए हिंदी के किसी विषय के प्रश्न उत्तर यहाँ वहाँ लिखे जाते हैं। अब क्रम बद्ध डायरी नहीं होती सिरहाने।
25 दिसम्बर 2015 के बाद जियोनी मोबाइल के एवरनोट का।क्लाउड ज़्यादा करीब हो गया, ये तय था वो गायब भी हुआ या क्रेश भी हुआ , डेटा रहेगा, कहीं भी मिलेगा। जियोनी ने दो वर्षों का साथ दिया आम का अचार कविता उसी पर लिखी गयी थी, जिसपर पापा पहली बार तारीफ किये थे, और हैबिटेट में बोलने का अवसर मिला था। 2017 में ऑफिस के डवोप्स इंजीनियर मितेश सोनी वर्डप्रेस सिखाये और ब्लॉग बनवाये , यहाँ से शतदल शुरू हुआ, उसी के माध्यम से बाड़मेर के आदरणीय किशोर चौधरी जी से धरती के गोल होने जैसे फिर भेंट हुई, उन्होंने कहा वाह अच्छा है सहेजो , एक जगह सहेजने से धीरे धीरे प्रज्ञा की भी किताब आ जायेगी।अब ये जारी सफर है। यहाँ डायरी ही डायरी है। अब डायरियाँ डिजिटल हैं। लेकिन इनको सिरहाने नहीं रखना चाहिए , रात भर चार्ज में भी नहीं रखना चाहिए, बच्चे के बगल में लेकर बिल्कुल नहीं बैठना चाहिए, मैं तो लेकिन ये सब करती हूँ। देखिये ये अब सब नहीं करना चाहिए।मैं कभी odhisha जगन्नाथ पुरी नहीं गयी। पापा गए थे। उनकी बड़ी ज़रूरी डिजिटल डायरी जिसमें फोन नम्बर हुआ करते था समुद्र में बह गयी थी। पॉकेट से निकल कर ही बह गयी थी। “जा! पॉकेट में नहीं है अब!” बोल कर उनको अफसोस हुआ था।भला हो गूगल का अब कॉन्टेक्ट्स कहीं नहीं बहते।क्लाउड पर बने रहते हैं, बशर्ते की आपने सिंक चालू रखी हो। लेकिन जिनके बारे में सोच सोच कर आप डायरी लिखते होंगे वे किधर भी कहीं भी कॉन्टेक्ट में नहीं होते हैं। इंटरनेट पर भी नहीं, संवादों में भी नहीं। केवल स्मृतियों में।डायरी उन सभी बातों को समेट लेती है जिनकी केवल स्मृति शेष है।

नींद

नींद सुखद अवस्था है,अपने आप से प्यार करते हैं वे जो लेते हैं अच्छी नींद। शरीर के तंत्र सभी लाइन पे लाती है रोज़ पूरी होती नींद। बहुत ज़रूरी नींद।

सपनो की दुनिया है नींद, सपने होंगे पूरे जब देखे जाएंगे, खुली आँखों की जलन और सूखता कॉर्निया सबसे निजात है नींद, नहीं आते सपने आराम कुर्सी पर, हमें सर के नीचे हाथ रख कर लेटे रहना है, लम्बे होकर बिस्तर पर पसार टाँगें। बेहद आराम की तलब के साथ देखने हैं अपने सपने। सपनों के बीज बोती नींद।

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Corona Virus

Virus अकोशिकीय(Acellular ) अतिसूक्ष्म (टाइनी) जीव हैं जो केवल जीवित कोशिका में ही वंश वृद्धि कर सकते हैं। ये नाभिकीय अम्ल और प्रोटीन (DNA) से मिलकर गठित होते हैं, शरीर के बाहर तो ये मृत-समान होते हैं परंतु शरीर के अंदर जीवित हो जाते हैं।

Corona (COV) वायरस का एक बड़ा परिवार है। 

CoV के कारण सामान्य सर्दी से लेकर गंभीर बीमारियाँ तक हो जाती हैं जैसे :

  • मध्य पूर्व के देशों से आया जैसे Middle East रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (MERS-CoV) 
  • Severe Acute रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (SARS-CoV)

SARS, साल 2002 में चीन में उपद्रव मचा कर गया था और कुछ महीनों के भीतर दुनिया भर में फैल गया, हालांकि यह तेज़ी से नियंत्रित हुआ था। सार्स एक वायरस है जो बूंदों के माध्यम से प्रसारित होता है जो हवा में प्रवेश करता है जब कोई व्यक्ति खांसी, छींक या बातचीत करता है। 2004 से सार्स का कोई ज्ञात संचरण नहीं हुआ है।

Novel कोरोनावायरस (nCoV) एक नई स्ट्रेंड है जो दिसम्बर 2019 पहले मनुष्यों में पहचाना नहीं गया है।

Coronavirus ज़ूनोटिक हैं, जिसका अर्थ है कि वे जानवरों और मनुष्यों के बीच संचारित(transmit) होने वाले वायरस। 
जूनोटिक रोग बैक्टीरिया या वायरस के कारण होने वाला एक संक्रामक रोग है जो जानवरों ,आमतौर पर कशेरुक(vertebrae) और मनुष्यों के बीच फैलता है। इबोला वायरस रोग जैसी आधुनिक बीमारियाँ ज़ूनोस हैं।

विस्तृत जांच में पाया गया कि SARS-CoV मनुष्यों में Civet बिल्लियों से आया और MERS-CoV सोमाली ऊंटों से स्थानांतरित हुआ । 

देखा जाए तो कई ज्ञात Coronavirus जानवरों में पाए जाते हैं जिन्होंने अभी तक मनुष्यों को संक्रमित नहीं किया है।

New Corona वायरस इतना खतरनाक है कि इससे अब तक चीन में लगभग 4515 लोग संक्रमित हो चुके हैं, और 106 लोगों की जान चली गई। संदिग्ध मामलों की बात करें तो उसकी संख्या 6973 है। अब यही वायरस पूरी दुनिया में फैलने लगा है।

NCoV से प्रभावित देश:चीन, ऑस्ट्रेलिया, कंबोडिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जापान, मलेशिया, नेपाल, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, ताइवान, थाईलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका और वियतनाम।

मध्य चीन के हुबेई प्रांत की विशाल राजधानी वुहान, यांग्त्ज़ी और हान नदियों द्वारा विभाजित एक वाणिज्यिक केंद्र है।

Novel (नया) कोरोनावायरस (nCOV)  सांस की बीमारी का प्रकोप पैदा कर रहा है जो चीन के हुबेई प्रांत के वुहान शहर में शुरू हुआ। यह प्रकोप दिसंबर 2019 की शुरुआत में शुरू हुआ और अभी भी जारी है। प्रारंभ में, कुछ रोगियों को वुहान साउथ चाइना सीफूड सिटी (दक्षिण चीन सीफूड होलसेल मार्केट और हुआ नान सीफूड मार्केट ) से जोड़ा गया था।

भारत ने चीन के हुबेई प्रांत में कोरोनोवायरस प्रकोप से उत्पन्न स्थिति के मध्य प्रभावित इलाकों से अपने नागरिकों की निकासी के लिए तैयारी शुरू कर दी है। DGCA से एयर इंडिया को पहली उड़ान की अनुमति मिलने के साथ ही, भारत में चीनी के राजदूत सन वेइदोंग ने बयान जारी किया है की भारत को विश्व स्वास्थ संगठन पर भरोसा रखना चाहिए और जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

बीमारी के संकेत

संक्रमण के सामान्य संकेतों में श्वसन संबंधी लक्षण, बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ और सांस लेने में कठिनाई शामिल हैं। अधिक गंभीर मामलों में, संक्रमण से निमोनिया, गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम, गुर्दे की विफलता और यहां तक ​​कि मृत्यु भी हो सकती है।

संक्रमण को रोकने के लिए मानक निर्देशों में नियमित रूप से हाथ धोना, खाँसने और छींकने पर मुंह और नाक को ढंकना, मांस और अंडे को अच्छी तरह से पकाना शामिल है। खांसी और छींकने जैसी सांस की बीमारी के लक्षण दिखाने वाले किसी के भी निकट संपर्क से बचना चाहिए।

भारतीय नागर विमानन मंत्रालय ने देश भर में सात हवाई अड्डों – दिल्ली, मुंबई, कोलकाता,चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोचीन – को स्क्रीनिंग की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है।

चीन से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग और स्व-घोषणा औपचारिकताएं (self -declaration formalities) जारी है।

भारत भर किसी भी प्रश्न और समर्थन के लिए अखिल भारतीय कोरोनावायरस हॉटलाइन की घोषणा की गई है: + 91-11-23978046।

बचाव के उपाय

  • बीमार लोगों के संपर्क से बचना ज़रूरी
  • वयस्कों और अंतर्निहित स्वास्थ्य मुद्दों वाले यात्रियों को अधिक गंभीर बीमारी का खतरा हो सकता है।
  • जानवरों (जीवित या मृत), जानवरों के बाजारों, और उत्पादों से बचें जो जानवरों से आते हैं (जैसे कि बिना पका हुआ मांस)।
  • कम से कम 20 सेकंड के लिए हाथों को अक्सर साबुन और पानी से धोने की सलाह है। यदि साबुन और पानी उपलब्ध न हो तो अल्कोहल-आधारित हैंड सेनिटाइज़र का उपयोग किया जा सकता है।

लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसीन के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर पीटर पियोट कहते हैं,

अच्छी ख़बर ये है कि कोरोना सार्स विषाणु की तुलना में कम जानलेवा है. अतीत की तुलना में वैश्विक स्तर पर सूचना का ज़्यादा और बेहतर आदान-प्रदान हो रहा है. ये अहम है क्योंकि एक संभावित महामारी से कोई देश अकेले नहीं लड़ सकता है.

इस संक्रमण से निजात पाने के लिए फिलहाल कोई ख़ास इलाज नहीं है. डॉक्टर संक्रमित मरीज़ों का इलाज उनके लक्षण के आधार पर ही कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टरों ने वैक्सीन तैयार करने के लिए कम से कम छः माह तक का समय लग जाने की बात रखी है।

संदर्भ

कोरोना समाचार