परवरिश जैसी सीरत वैसी

अपराधी पेड़ पर नहीं उगते
बचपन से तैयार किये जाते हैं
कुंठित कुपोषित मनोग्रन्थियों
से सुसज्जित समाज की
वंश बेल तले
वे पिलाये जाते हैं घूँट घृणा के
धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा रोज़-रोज़
भोलापन बालमन उसका शैशव
सब सोख लिया जाता है
स्वार्थ की अमरबेल तले।

तस्वीर साभार गूँज वाट्सप समूह

नींद के संतुलन

पिता जन्म के कष्ट नहीं समझते
नहीं जानते बच्चा गर्भ में
कैसे घुमड़ता होगा कैसे
रहता होगा पूरे नौ माह
फिर भी बाप के पेट से
छाती से शरीर से चिपका
क़ई बार अधिक सकून
पा सकता है बच्चा।

कुपोषित खोंझाईं बहुत अस्तव्यस्त
जन्मदात्री माँ के आँचल में
लप्पड़ लप्पड़ प्रेम भरा है
समझ से परे डर सहमा
एक शिशु बड़ा हो रहा है
होना समझदार एक पिता का
ममत्व के दूसरे सिरे का टुकड़ा है

बाप समझे न समझे गृहस्थी
कर सके मनो दशा का भान
इतने में ही प्रेम बचा रहता है
बच्चा चिपका पिता की पेट से
सुकून से सोया रहता है
स्त्री स्वप्न में निमग्न सोयी रहती है
सम्बन्धों की भोर मुस्कराने को
जग रही है भोर होने वाली है
पौ फटने के बाद भी नींद पूरी होती रहती है।

प्रज्ञा

24 मार्च 2020

9:08AM

मुम्बई

बंगाल में अम्फान

बहुत बुरा व्यवहार की है नेशनल मीडिया बंगाल के साथ । इतना तबाही हो गया है वहां लोग बात भी नहीं कर रहे , राममंदिर में ASI की खुदाई में मिला पिलर टी वी पर छाया है। बंगाल में जान माल की क्षति हुई है। इतना बड़ा बड़ा पुराना वट वृक्ष सब उखड़ गया, फोन बिजली का पोल उखड़ गया है, जीवन अस्त व्यस्त हो गया, 24 घण्टे लाइट नहीं, नेटवर्क अभी भी खराब। कितने लोग मर गए। मलबा ही मलबा है। लोग रास्तों में पोल के नीचे आकर दबे कुचले दिख रहे हैं। गरीब के घर सब तबाह हो गए कोई मतलब नहीं है। यहां तक की बिजली विभाग भी कोताही किये हैं, लैंडफाल पता होने के बाद भी कनेक्शन नहीं काटे थे वो लोग। एक अरनब नाम के आदमी के ट्वीट से भयावह बिजली गिरने और तार सब मे आग लगने का दृश्य देखे हैं, दिल दहला देने वाला तूफान था ये , फानी के बराबर का या उससे ज्यादा ही।

कश्मीर का गिलगित मिलाने के चक्कर मे क्या हम लोग पूरा भारत अलग अलग देखने लगे ? ये मुस्लिम समर्थक राज्य, ये हिन्दू समर्थक राज्य, ये कम्युनिस्ट राज्य । माँ भारती के ही जान माल का की हानी हुई है न भाई, काहे न्यूज़ रूम में लोग बात नहीं कर रहे?

तस्वीर साभार ट्विटर

लिख रहे हैं

जिनकी कोई विधा नहीं,
जानकारी में जो अब तक सधा नहीं,
पाठक वर्ग क्या होगा
ये तक उनको पता नहीं,
पर लिखना तो है,
खोलना तो है मन का पट,
भीतर होती उठा पटक ,
लेकिन मालूम न हो कि किसको पढ़ाएं
और झिझक भी हो कि बात
किसके सहारे शहर-शहर जाए ,
वो लिए अल्फ़ाज़ों का कारवाँ
चल पड़े सोशल मीडिया पर,
कोट दर कोट दिख रहे हैं,
ब्लॉग दर ब्लॉग छप रहे हैं,
डायरी लिख रहे हैं
और धीरे-धीरे
क्या खूब लिख रहे हैं।

डायरी बचपन की

ये साल 2002 से 2012 तक की डायरियां हैं। नए साल में पापा गिफ्ट किया करते थे। इनमें प्रतदिन के खर्च से लेकर किसके साथ क्या ग़लत व्यवहार किये , कहाँ कहाँ सुधार और समय सदुपयोग की आवश्यकता है, कितना समय पढ़े नहीं पढ़े उसका हिसाब है। ये अब भी बाहर वाले कमरे में मम्मी जी की अलमारी में बने सबसे ऊपर वाले शेल्फ पर एक कार्टन में सुरक्षित हैं।
2013 के बाद से हाथ में स्मार्ट फोन आया , फिर बहुत कुछ बदल गया, अच्छे के लिए बदला या ख़राब के लिए ये तय नहीं किया जा सकता क्योंकि सब समय के साथ बदला।
2014 के बाद मेरे अपने प्रति सुर बदल गए , मैंने क्रिटिकल होना छोड़ दिया और पाश्चात्य जगत के अवचेतन मन विज्ञान वीडिओज़ देख के, उन सब की लिखी किताबें पढ़ के “लव योर सेल्फ” मेरी डायरी में ज़्यादा आने लगा। सोनी एक्सपीरिया के बाद सैमसंग नीओ का नोट मेरे साथ कागज़ से ज़्यादा रहने लगा।
2015 में घर की एक शादी में जब फोन चोरी हुआ तब फिर ठानी की डायरी में लिखते तो ये हाल नहीं होता, सब चला गया। फिर जिन मित्रों को जो कुछ भेजा था उन्होंने फारवर्ड किया कुछ फेसबुक पर से मिला। पर अब डायरी की वो आली आदत नहीं रही मुझे।
प्रमोद जीजा जी, मेरी बड़ी ननद सुषमा दीदी के पति एक LIC की डायरी हर साल देते हैं मुझे और आलोक को ।
पर वे अब म्यूज़िक क्लास के नोट्स लिखने के।काम आती हैं या एम ए हिंदी के किसी विषय के प्रश्न उत्तर यहाँ वहाँ लिखे जाते हैं। अब क्रम बद्ध डायरी नहीं होती सिरहाने।
25 दिसम्बर 2015 के बाद जियोनी मोबाइल के एवरनोट का।क्लाउड ज़्यादा करीब हो गया, ये तय था वो गायब भी हुआ या क्रेश भी हुआ , डेटा रहेगा, कहीं भी मिलेगा। जियोनी ने दो वर्षों का साथ दिया आम का अचार कविता उसी पर लिखी गयी थी, जिसपर पापा पहली बार तारीफ किये थे, और हैबिटेट में बोलने का अवसर मिला था। 2017 में ऑफिस के डवोप्स इंजीनियर मितेश सोनी वर्डप्रेस सिखाये और ब्लॉग बनवाये , यहाँ से शतदल शुरू हुआ, उसी के माध्यम से बाड़मेर के आदरणीय किशोर चौधरी जी से धरती के गोल होने जैसे फिर भेंट हुई, उन्होंने कहा वाह अच्छा है सहेजो , एक जगह सहेजने से धीरे धीरे प्रज्ञा की भी किताब आ जायेगी।अब ये जारी सफर है। यहाँ डायरी ही डायरी है। अब डायरियाँ डिजिटल हैं। लेकिन इनको सिरहाने नहीं रखना चाहिए , रात भर चार्ज में भी नहीं रखना चाहिए, बच्चे के बगल में लेकर बिल्कुल नहीं बैठना चाहिए, मैं तो लेकिन ये सब करती हूँ। देखिये ये अब सब नहीं करना चाहिए।मैं कभी odhisha जगन्नाथ पुरी नहीं गयी। पापा गए थे। उनकी बड़ी ज़रूरी डिजिटल डायरी जिसमें फोन नम्बर हुआ करते था समुद्र में बह गयी थी। पॉकेट से निकल कर ही बह गयी थी। “जा! पॉकेट में नहीं है अब!” बोल कर उनको अफसोस हुआ था।भला हो गूगल का अब कॉन्टेक्ट्स कहीं नहीं बहते।क्लाउड पर बने रहते हैं, बशर्ते की आपने सिंक चालू रखी हो। लेकिन जिनके बारे में सोच सोच कर आप डायरी लिखते होंगे वे किधर भी कहीं भी कॉन्टेक्ट में नहीं होते हैं। इंटरनेट पर भी नहीं, संवादों में भी नहीं। केवल स्मृतियों में।डायरी उन सभी बातों को समेट लेती है जिनकी केवल स्मृति शेष है।

मेरा योरकोट प्रोफाइल

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दोस्तों ,

योरकोट पर मैंने सीखा है कि यदि आपको लगता है कि फलाँ फलाँ बात पर कोई न कोई कुछ लिख ही गया है तो अब आप क्या नया लिखें तो अपने आपको यह बताईये की अब तक बात आपने नहीं लिखी तो वो नज़रिया जो आपका है, जो शब्द आपके हैं वे अब तक कागज़ पर उतरे नहीं , किसी ने पढ़े नहीं इसलिये खुद को कम समझ कर मैं क्या लिखूँ कभी नहीं बोलना चाहिए।

प्रज्ञा

एक माँ की तस्वीर

साल 2017 में बेबो के जन्मदिन पर बिंदु दी के घर, मुद्रा फ्रेम्स के जिस फोटोग्राफर का आना हुआ था, उन्होंने यह तस्वीर ली थी जो बाद में दीदी ने फारवर्ड की। यहाँ मैं छः महीने के अंशुमन को गोदी में लेकर पार्टी में एक साइड खड़े हो ये देखने के लिए मुड़ी थी की अभिज्ञान क्या कर रहा है, तभी कैमरा क्लिक हुआ होगा।

तस्वीरें वॉट्सऐप से बैकअप होकर लैप्टॉप के फ़ोल्डरों में दब जाती हैं। मेरी व्यस्तता मुझे उन्हें डेवलप कराने का समय भी नहीं देती। अभिज्ञान के पिता जी ने क्लास में उस समय कलर प्रिंटर लगवाया था। तो एक प्रिंट मेरे लिए निकाल लाये थे वहीं उपलब्ध A4 size में।

यही तस्वीर बची रही ।

ये उस मोमेंट का एक रंगीन प्रिंटआउट है ।