बवाल सवाल

मैं सात बजे निकलने वाली थी आफिस से , सोचा रात साढ़े आठ तक घर टच कर जाऊंगी ।थोड़ी देर अभिज्ञान को देख लूँगी नीचे खेलते हुए , उसका दिल रह जायेगा कि मम्मा बैठी थी।

कारगुज़ारी में आठ बजे और मैं साढ़े नौ बजे पहुँची।रास्ते में कॉल आयी , रुँधी आवाज़ में अभिज्ञान बोले , “मम्मी मुझे इस सोसाइटी में नहीं रहना कोई मुझे नहीं खेलाता” शब्द गम्भीर थे।

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ज़िन्दगी का गरबा

तुम इतनी ऊर्जा कहाँ से लाती हो

तुम्हारे अंदर ऐसा क्या है जो रंग हो जाता है

मैं शहर हो जाता हूँ तुम्हारी याद का

तुम क्या कर देती हो इन मामूली से दिखने वाले

मकान की दीवारों पर जो दिलों में घर कर जाते हैं,

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याद की बात है -1

घर में हम जिन लोगों के साथ रहते हैं या पले बढ़े होते हैं उनकी या उनसे जुड़ी कोइ न कोई एक बात होती है जो उनके व्यक्तित्व के साथ रूढ़ि हो जाती है ।
वो किसी न किसी समय इस महत्त्वपूर्ण बात को हमेशा दोहराते हैं और फिर इससे जुड़ा कुछ भी आप कहीं पढ़ते हैं या देखते हैं तो फिर उन साथ रहे लोगों का ख़्याल आपको आता है।

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झपकी कहानी -2

“मम्मी वो प्लूटो से पढ़ो न आज।”

बड़े दिनों बाद हमने सोने से पहले प्लूटो निकाली।
अभिज्ञान को प्लूटो मैगज़ीन की चित्रकारी अच्छी लगती है।उसकी छोटी कवितायें , टू लाइनर्स उसे मज़ेदार लगते हैं।

पाखू और बजरंगी मासूम हैं साथ ही बुद्धिमान भी, उनका तर्क बिल्कुल सही है कि क्यों अपने मन की करने वाला उल्लू कहलाता है।

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