ड्राई फ्रूट बॉक्स

किसी बात को लिख देने का ख़्याल आने के बाद टाल मटोल कर छोड़ देने से बात रह जाती है। चाहे बात बच्चों के खिलौनों की हो या संस्मरण साझा करने की । एक ही वाकया लिख दें तो कहानी पर ख़त्म हो जाती है बात। कथानक और उपकथानक की व्याख्या करिएगा तो उपन्यास बन जाती है बात। बहरहाल यहाँ न कोई कहानी है, न लिखनी है उपन्यास। मुझे तो बस सोना है और सोने से पहले “यहाँ कुछ लिखें” जो रात नौ बजे शुरू किया था, समाप्त न करूँ तो करवटों में रात निकल जाएगी।

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विभा_दीदी

मेरी ननद विभा दीदी, कर्मठता, स्वाभिमान, साहस, बुद्धि और नैसर्गिक सौंदर्य की अधिष्ठात्री हैं । मैं अंशू-मोनू के पापा को बोलती हूँ कि उनकी चारों बहनों को पलक पर रखें वे क्योंकि वाकई ऐसी बहनें हैं जो नसीब से मिलती हैं। मैं इस जीवात्मा स्वरूप में ईश्वर का हमेशा धन्यवाद देती हूँ मैं घर, बाहर या सोशल मीडिया पर भी ऐसी विलक्षण स्त्रियों के सान्निध्य में आयी हूँ जो अपने आप में मिसालें हैं। चाहे वे मुख्य रूप से गृह संचलिकाएँ हों, या कामकाजी हों । सबसे अद्भुत होता है अपनी ही विलक्षणता से अनभिज्ञ होते हुए उसे निरन्तर जीते रहना।

कोई अवसर नहीं आज बस एक रविवार है और कुछ ख़्याल बस यूँ ही। धन्यवाद कहने और प्रेम जताने के लिए उम्र कम है। मैं उनको और जीजा जी को कॉल पर भी बताती हूँ कि वे मेरे लिए कितने अज़ीज़ हैं। परिवार के सभी लोगों में यूँ तो सभी प्यारे होते हैं लेकिन कोइ ऐसा हो जाता है जिनसे दिल कनेक्ट कर जाता है। जब भी बात होती है दीदी से बड़ा अच्छा सा लगता है । तमाम तरह की दुनियादारी में अनाड़ी मैं बहुत सारे ज़रूरी काम समय पर आपके मार्ग दर्शन से कर पायी हूँ जिनके न कर पाने से असंतुलन हो सकता था।

हमारे जीवन मे माँ के रूप में जो स्त्री होती है उसकी आजीवन हमें ज़रूरत होती है चाहे आप पुरूष हैं या महिला । आपके व्यक्तित्व की सघनता या दुर्बलता इस बात पर निर्भर करती है कि आपकी माँ के साथ बचपन में आपके कैसे सम्बन्ध थे औऱ आज भी वो आपके जीवन में मौजूद हैं या नहीं। बड़ा ही मनोव्यज्ञानिक सम्बंध है। यह छवि देखी है इनमें। अच्छा जा रहा है सफ़र।

विभा दी बातों बातों में मुझसे हँसी में कहती हैं कि उन्होंने भी टी. एन. बी. भागलपूर से होस्टल में रहकर पढ़ाई की है और संस्कृत जैसे कठिन विषय से टॉपर रहीं। वे चुटकी लेती हैं कि समय ने थोड़ा औऱ दुलार दिखाया होता तो वे भी हाकिम से कम न होतीं। वैसे उनके हाव भाव कलक्टर से कम नहीं।

मेरी सास को अपनी चारों बेटियों की कर्मठता पर गर्व है। होना भी चाहिए। मैंने देखा है किस तरह लोहा लिया हैं चारों ने जीवन से। यह लिखते समय मैंने एक बहु को अपने बगल में बैठा दिया है और केवल तटस्थ उस व्यक्ति की तरह लिख रही हूँ जो किसी व्यक्ति को केवल उसके गुणों और जीवनानुभवों के लिए चुप चाप देखता है। परस्पर सम्बन्धों की अपनी खट्टी मीठी परतें होती हैं वे हमारे व्यक्तित्व के विकास का हिस्सा हैं उन्हें लेखन से लेना देना नहीं होता उनको साथ जीना होता है।

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टॉप 10 ब्लॉगर 2019 – प्रज्ञा मिश्रा जी से साक्षात्कार By The Sahitya | Editor- September 29, 2019

अपनी साहित्यिक यात्रा के दौरान पिछले वर्ष मिली इस उपलब्धि को ब्लॉग में लिंक सहित सहेज रही हूँ।

iblogger साक्षात्कार

टॉप 10 ब्लॉगर 2019 – प्रज्ञा मिश्रा जी से साक्षात्कार
By The Sahitya | Editor- September 29, 2019

प्रज्ञा मिश्रा जी 2018 से ब्लॉगिंग कर रहीं है। पाठकों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर आपको टॉप 10 ब्लॉगरों में शामिल किया गया था। पिछले दिनों प्रज्ञा जी से साक्षात्कार किया गया था। पेश है साक्षात्कार के प्रमुख अंश-

iBlogger : Top 10 Blogger the Year की सूची में अपना नाम शामिल होने पर आपको कैसा लग रहा है?

प्रज्ञा मिश्रा : बहुत खुशी है, सम्मान से प्रोत्साहन मिला है , ब्लॉग को और बेहतर बनाने की दिशा में सोचने की ऊर्जा मिली। लोगों की शुभकामनाओं का असर ऐसा है कि मन बहुत लिखने पढ़ने को प्रेरित हो रहा। अधिक से अधिक पढ़ने की इच्छा जाग्रत हुई है क्योंकि लिख सभी रहे हैं तो उसमें खुद को अलग खड़ा करने के लिए मधुमखियों जैसे अलग अलग साहित्य पुष्पों से पराग उठाने हैं और फिर उससे अपना शहद तैयार करना है।

iBlogger : Top 10 Blogger में आने के लिए सबसे पहले किसे शुक्रिया कहना चाहेंगे?

प्रज्ञा मिश्रा : सबसे पहले मैं अपनी माता जी सरोज स्मृति को शूक्रिया करना चाहूंगी क्योंकि मेरा ब्लॉग उनके स्मरण में उनके नाम के पर्यायवाची की पर रखा गया है और माँ का जीवन मुझे स्त्री विमर्श पर लिखने की प्रेरणा देता है। वे अनवरत लिखती थीं, औऱ बेहद अलग सोचती थीं।

iBlogger : आपकी नज़र में सफल ब्लॉगर की क्या खूबियां होनी चाहिए। क्या आप स्वयं को भी सफल ब्लॉगर मानते हैं?

प्रज्ञा मिश्रा : एक सफल ब्लॉगर के पास अपने विचार होने चाहिए, नानाप्रकार के जीवनानुभव से वो भरा हुआ होना चाहिए या तो पढ़ कर या यात्राएं कर। तकनीकी ज्ञान परम् आवश्यक है ताकी रुचिकर विसुअल्स बलॉग सौंदर्य का भी ख्याल रखे। उसका सोशल कनेक्ट बढियाँ होना चाहिए। ब्लॉग को लिख कर भूले नहीं उसे खुद भी बीच बीच मे पढ़ता सुधरता रहे। लेखन का स्तर रुचिकर बनाने के साथ साथ अपने अन्तर्मन से भी ईमानदारी बरते। एक सफल ब्लॉगर सब कुछ वो ही नहीं लिखते जो दुनिया पढ़ना चाहे, वे दुनिया को नया आईना दिखाने का माद्दा रखते हैं। मैं अपने आप को सफल ब्लॉगर मानती हूँ।

iBlogger : आप अपने ब्लॉग पर किन विद्याओं में ज्यादा लिखते है?

प्रज्ञा मिश्रा : मेरे ब्लॉग पर अधिकतर हिंदी कविताएँ हैं।

iBlogger : आप ब्लॉगिंग के क्षेत्र मे कैसे आये?

प्रज्ञा मिश्रा : कार्यालय में एक मित्र ने सुझाव दिया की अपने काम को एकत्र करने और बड़ी जनसंख्या तक पहुंचने का माध्यम ब्लॉग है तो इस तरह उन्ही की सहायता से ब्लॉग बनाया और 2018 से ब्लॉगिंग की दुनिया मे सक्रिय हूँ ।

iBlogger : अब तक के ब्लॉगिंग सफर में किसी परेशानी का सामना करना पड़ा? यदि हां तो वह क्या रही?

प्रज्ञा मिश्रा : कार्यालय के काम से समय निकाल नियमित ब्लॉग पर अच्छे कंटेंट के साथ बने रहना एक चैलेंज है परन्तु यही उत्साहित भी रखता है।

iBlogger : ब्लॉगिंग के लिए आप समय कैसे निकालते है?

प्रज्ञा मिश्रा : लिखने की शुरुआत मुंबई के ट्रफिक में पनपती झुंझलाहट को कम करते करते हुई, यहीं समय मिला सोचने का नोटस में लिखने का फिर सिलसिला घर पर सप्ताहांत में बढ़ा। धीरे धीरे जो लिखती गयी वह ब्लॉग में साझा किया। अब ऑनलाइन रेडियो कुकू एफ एम में अपने चैनल के लिए लिखती हूँ और साथ ही उसका ब्लॉग भी नियमित बनाती हूँ।

iBlogger : आप वर्तमान में ब्लॉगिंग के अलावा क्या कर रहे है?

प्रज्ञा मिश्रा : मैं ब्लॉगिंग के अलावा ऑनलाइन रेडियो कुकू एफ एम http://www.kukufm.com में अपने आधिकारिक चेनल शतदल पर हिंदी पॉडकास्ट करती हूँ, बुधवार रात दस बजे। इसके अलावा मैं हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रुचि रखती हूँ और सीख रही हूँ ।

iBlogger : क्या आपकी ब्लॉगिंग या लेखन को लेकर भविष्य की कोई योजना है?

प्रज्ञा मिश्रा : बिल्कुल, मैंने “शतदल” नाम से एक किताब की रूपरेखा मन में बनाई है जिसमें मेरी कविताएँ और अब कविताओं के जन्म का सफर विवरण होगा। ररेडियो पॉडकास्ट और मेरा ब्लॉग शतदल उसी सपने के लिए खनिज की तरह हैं।

iBlogger : नये ब्लॉगरों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?

प्रज्ञा मिश्रा : खूब पढ़ें, ब्लॉग पर नियमित रहें, ध्यान और योग करें, अपने होने के मकसद को लगातार खोजें।

iBlogger : क्या आपके जीवन की कोई घटना या प्रसंग जो आपके लिए यादगार रही हो और उससे आपको नई सीख मिली हो, हमारे पाठकों के साथ शेयर करेंगे?

प्रज्ञा मिश्रा : एक बार मैं अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने निकली तो बहुत तेज़ बारिश आयी, सामने एक महिला हमारे परिसर से कार लेकर निकल रही थी तो मैंने उनसे मदद मांगी और बच्चे को बारिश से बचा स्कूल भेजा। उसी वक्त घर पैदल लौटते समय मुझे एक महिला और उसका बच्चा दिखे जिनके पास छतरी नहीं थी, वह महिला अपनी तीन वर्षीय बेटी को गोद में उठा तेज़ कदम से चल रही थी की बारिश से बच जाए। यद्दपि मुझे मेरा घर पास ही था और कार्यालय के लिए देर भी ही रही थी पर उस समय मुझे उस महिला और उस बच्ची की मदद करना ज़रूरी लगा, मैं दोनों को उनके गन्तव्य तक पैदल साथ चल, छतरी में लेकर छोड़ आई। किसी ने मेरी सहायता की और मुझे किसी और की मदद कर असीम सन्तोष मिला। यह घटना परोपकार के लिए प्रेरित करती है। आखिर हम लिखते भी तो हैं खुद से ईमानदार होने के लिए।

iBlogger : iBlogger और अपने ब्लॉग के सम्मानित पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

प्रज्ञा मिश्रा : आप बेहतरीन हैं, हिंदी के लिए उत्तम कर रहे, धन्यवाद।

iBlogger : हमारे लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे?

प्रज्ञा मिश्रा : हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में और बेहतरीन करने के लिए कृपया एक्सपर्ट वेबिनार आयोजित करायें और सभी सदस्यों को लाभान्वित कराएं। हिंदी की विधाओं पर आधारित प्रतियोगिता भी रख सकें तो कृप्या ज़रूर रखें। वार्षिक iBlogger सम्मेलन का आयोजन उत्साहवर्धक होगा।

iBlogger : अगले वर्ष के लिए होने वाले Blogger of the year 2020 के लिए कोई सुझाव देना चाहेंगे?

प्रज्ञा मिश्रा : इंडिया 2020 विषय पर आधारित विभिन्न चयनित विषयों पर लिखा एक ब्लॉग प्रतियोगिता के लिए अनिवार्य करें।

आपने iBlogger को अपना कीमती समय दिया, इसके लिए हम आपके तहेदिल से आभारी है।

लिंकिन_पार्क

अरावली अपार्टमेंट, साउथ ऑफिस पाड़ा, राँची। फ़लैट #302 में बालकनी से लगा कमरा । वहाँ खिड़की से सटा था तीन फट्टे वाला बिस्तर। बिस्तर के बगल में लकड़ी की मेज़, मेज़ पर पिंक टेबल क्लॉथ। दो लीटर की पेप्सी का पानी बोतल और सारा दिन पानी पीती मेरी रूममेट अर्पिता बसु यहाँ रहती थी।

साल 2003, दीवाली की रात को कोक और 20 रुपये वाला कुरकुरे गटकते हुए अर्पिता बसु ने मुझसे कहा था ,
” प्रज्ञा तुम linkin park को ज़रूर सुन लेना। इतना अच्छा है तुमको ज़रूर पसंद आएगा।”

ये वो दौर था जब रंगोली शरन के पोर्टेबल सी डी प्लेयर पर सभी बारी बारी कब्ज़ा जमाते थे। बहरहाल मुझे अंग्रेज़ी समझ मे तो दूर बोलनी भी नहीं आती थी तो जितने गाने अर्पिता ट्यून इन करती रहती उसे ही सुनते सुनते दोनों ट्रिग्नोमेट्री बनाते थे। हमने कैल्कुलस हमेशा अलग अलग कमरों में चुप मार के बनाई।

ब्रायन एडम्स औऱ अर्पिता के सानिध्य से जब सीधा कविताई की भाषा में ही अंग्रेज़ियत वाली पिकचरों से प्यार हुआ था तब तक दिल्ली पहुँच चुकी थी। याद नहीं प्रीति औऱ अर्पिता के साथ आख़िरी दिन राँची का कैसा था। हम सब रोये तो थे। हमारे जूनियर्स अदिति, मधुरिमा, उलूपी, शिल्पी, मेघा(इसका नाम नहीं याद आ रहा इसने हमें प्लेनचिट सिखाई थी, ये मुझे बहुत प्रेम करती थी, इतना की इसने अपना सारा स्टैम्प कलेक्शन मुझे दे दिया था , ये एक गाना बहुत अच्छा गाती थी -“जीवन से भरी तेरी आँखें , मजबूर करें जीने के लिए, मगर इसका नाम नहीं याद आता आज ) हम सब रोये थे, वो भी रोये थे।

जुलाई 2004 में श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में एडमिशन के इत्मिनान के बाद, मैं पापा के साथ 1548 outram lane के गेट पर खड़ी थी, अंदर अंधेरा सा था , भूरी चमकीली टाइल्स वाला बड़ा हॉल, कोने में फाउंटेन था , जहां आगे चल कर स्वाति रॉय ब्लू पजामे और ब्लू हेयर बैंड में अपनी आइकोनिक तस्वीर लेने वाली है। लोहे की कुर्सियाँ लगीं थीं, लड़कियाँ छोटा सा सोनी कलर टीवी देख रही थीं जो आने वाले तीन सालों तक मेरा इंग्लिश टीचर होने वाला था। टी वी के ठीक सामने एक लड़की बैठी थी जिसके वहाँ होने के कोई आसार नहीं थे। वो अर्पिता थी।

“अर्पिता तुम!!!!!!!”
“प्रज्ञा तुम !!!!!!!!!!!”

डेस्टिनी होती है। समय की चाल किसी ने नहीं देखी। पर समय सबको देखता है, समय सबका बाप है। अब अर्पिता तीन साल मुझे देखने वाली थी और मैं उसे लेकिन वक़्क्त थोड़ा और मेहरबान हो गया और स्वाति राय , रायना पांडे, कृतिका किसलय, फिर 1548 के अन्य नायाब साथी भी मिले एक घोंसले में सिमटे उड़ने को तैयार पंछियों की तरह। स्वाति बैनर्जी के साथ वाले रोचक किस्से कभी और लिखूँगी। आज उसका नाम ज़ेहन में आते से पीड़ा उभर आयी है जिससे वो गुज़र रही। द नेमसेक की कहानी याद आती है मुझे । मैं स्वाति की ज़िंदगी मे आभासी तौर पर शामिल हूँ लेकिन उसका दुख हम सभी के दिल मे ज़िंदा मौजूद रहेगा। कोरोना काल में मां बाप से दूरी औऱ ऐसे बारी बारी दोनों का गुज़र जाना कितना भारी है ये समझती हूँ मैं। पापा की बहादुर बिटिया स्वाति बनर्जी यू एस में पति के साथ रह रही और अपनी बेटी को एक शानदार परवरिश दे रही है।

2006 में बड़े पापा 1548 में एक कम्प्यूटर मुझे दे गए थे, यह बहुत काम का निकला इसपर ही याहू मेसेंजर , रेडिफ बोल, ऑरकुट और अन्य चैटिंग के गुर सीखे। ट्रिपल आई टी के एक सख्त मिश्र बंदे से लड़ाई के बाद उससे ही जिस एक शब्द की सही स्पेलिंग सीखी थी वह था -” male chauvinism “.
हमारे शाही कमरे में फिट कम्प्यूटर पर जो काम हमने सबसे ज़्यादा किया वो था तरह तरह के गाने लगा कर ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के कनवर्जन्स या इनऑर्गेनिक के नोट्स बनाना। बेसिक की प्रोग्रामिंग तो घन्टा कभी नहीं की मैंने। पत्ता नय ये कम्प्यूटर एज अ सब्जेक्ट कब आना बंद होता। फिज़िकल केमिस्ट्री बहुत भारी था। उसके टाइम गाना नहीं सुन सकते थे । तब चुप मार के करी पढ़ाई हमने। लेकिन आगे ज़िन्दगी ने झख मार के मास्टर्ज़ इन कम्प्यूटर एप्लिकेशन ही कराई ।
अच्छा ये जो घन्टा शब्द अभी अभी मैंने उपर यूज़ किय्या है न वो साल 2018 के बाद बने यू पी के फेसबुकिया मित्रों की वाल पोस्ट्स अथवा कमेंट्स से बतौर ट्रेनी उठायी है।

2006-7 के दौरान में अर्पिता ने वही पुरानी बात बोली, लेकिन अब तरीका नया था, मैं नयी थी, मेरा नाम नया था!
“प्रग्गी, तू linkin park सुन तुझे मज़ा आएगा, यू नो इट हैंज़ दिस रिबेलस हीलिंग इफेक्ट यू वुड फॉल इन लव” ..

धीरे-धीरे अर्पिता ब्लैक आइड पीस पर आ गयी और लिंकिंग पार्क की बातें नहीं होती थीं। मैं रोज़ ट्वेल्व मिड नाइट से थ्री ए. एम. तक स्टार मूवीज़ , एच. बी. ओ., पर जीने के लिए जाने लगी।पढ़ाई करती थी, ये मत सोचिये नहीं करती थी। खालसा कॉलेज के केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में पहले साल में पहली पोज़िशन , दूसरे साल में दूसरीं पोज़िशन और तीसरे साल में तीसरी पोज़िशन टॉप थ्री बरकरार था अपना आख़िर दिव्या माटा, रितिका नागपाल , आशिमा अग्रवाल भी यार थे अपने यारी की नेकनामी में हमने पोज़िशन भी शेयर कर लिये आपस में लेकिन मेहनत करी जी तोड़ । तो खूब सारा पढ़ने के बाद होस्टल में होती थी दो मूवी, दिन को डाइजेस्ट करने के लिए स्लीपिंग पिल्स की तरह ।

वक्त बदला, हम बदले, दूरियाँ आ गयीं, पर दिलों में नहीं, एक हवाई जहाज की दूरी बस। मैं याद करती हूँ सबको। सबने मुझे कभी न कभी बताया है वो भी याद करते हैं। पर सारे मेरे दोस्त मेरे ही जैसे निकले हम सब बातें बहुत कम करते हैं। अर्पिता ने तो 2012 में सोशल मीडिया को भी टाटा कर दिया , अपने आप से अपनी लड़ाई में साल 2018 में अर्पिता ने जान लिया कि उसकी डेस्टिनी शेयर मार्केट्स की स्टडी है औऱ इसी में उसका मन लगता है एंड देयर शी इज़।

अर्पिता, आज 24 जुलाई 2020 को अचानक लिंकिंग पार्क लगा ही दिया यू ट्यूब पर। तुम्हारी मेहरबानी से मुझे इतनी अंग्रेज़ी तो आती है कुछ सालों से। बस याद ही नहीं रहा था कि ये सुनना था मुझको। आज सुन लिए सब गाने , सबकुछ डाइजेस्ट करने के लिए , स्लीपिंग पिल्स की तरह।

आप ये पढ़ रहे हैं तो आप भी सुनिये , सभी सुनिये , अच्छा है। मैंने नाहक ही 2003 से 2020 कर दिया केवल एक गाना सुनने के लिए । मैं किचन में खड़ी कभी भी लगा सकती थी,
बट यू हैव टू टच अ सर्टेन लो टू फील इट एंड दन यू लिसन इट

Pragya Mishra
24 जुलाई 2020
4:05AM
PC – आलोक मिश्र, साल 2011 का जुलाई

आम लोग

मेरे पतिदेव आलोक परसों ही दसहरी आम लेकर आये थे, बड़े ही मीठे, जिनको काट कर नहीं, मोदी जी जैसे खाते हैं। बेसिन लग में ठाढ़ होकर। वैसे ही खाये हम भी। आप सबको वह अलौकिक साक्षात्कार याद तो होगा, मुझे भी है।

सुबह सुबह उठ कर किचन गयी तो देखा भाँजी आराधना ने #मैंगो_पीपल्स को एकदम सलीके से धोखार पखार कर डाले में लगा कर रख दिया था। मेरे दिमाग में यकायक आया , “अरे वाह #आम_लोग” ।

सभी #मैंगो_पीपल्स कतार में थे, सभ्य मनुख के जैसे। मैंने उनका #मानवीकरण #अलंकार कर देना उचित समझा।

पहले मैंने सभी की हरी खड़ी फोटो निकाली तो लगा इनके आँख नाक भी होते तो मज़ा आता। दोनों बच्चे मेरे सो रहे थे तो ये सब टाइम-पास की आज़ादी इस वक्त थी।

आम लोगों का मानवीकरण करने के लिए मुझे अब एक मार्कर की ज़रूरत थी। इस लक्ष्य प्राप्ति हेतु अंशु-मोनू के पापा का त्वरित स्टेशनरी लोक ज़िंदाबाद (पिछले दस वर्षों से इस #स्टेशनरी_लोक को ठीक करना छूना मना है, क्योंकि तहियाने पर इनका समाने गुम जाता है। फिर मुझे ही खोज खोज के देना पड़ता है तब तक ई खीजते रहते हैं, परन्तु प्रयोग करने के लिए सामान लेकर यथावत उलझी हुई स्थिति में रखना एलाउड है)।

कैमलिन का काला मार्कर निकाल कर सभी फलों पर भाव सहित भौं आँख मूँह बना दिये।उसमें कोई शादी में रूठे फूफा नज़र आने लगे ,तो कोई भोली सी दीदी, कोई गुस्सैल मित्र तो कहीं अनभिज्ञ अजनबी, कोई ऐसा छात्र जिसको कक्षा में कुछ समझ नहीं आ रहा लेकिन चूँकि पहले रो में बैठा है तो एटेंटिव लगना ही पड़ेगा, कोई लोक डाऊन में अपना दस हजार रुपया बिजली बिल लेकर तमसाय पड़ा है, अडानी को गरिया रहा है। कोई खिड़की से सर टिकाए साहित्यिक भाव में बादल मेघा बरखा को देख देख रचना करने के फिराक में पड़ा है।

बस ऐसे ही ले आयी इन आम किरदारों को।