सफर 2.0

समय समय पर मैं अपना आँकलन करती हूँ, इससे पहले था सफर 1.0 और आज संकलित है सफर 2.0.

ये जारी सफर है।

आत्मकथ्य– मेरा जन्म पूर्णियाँ, बिहार के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। पिता जी आकाशवाणी में कार्यरत हैं। परिवार में साहित्यिक वातावरण होने के कारण बचपन से हिंदी कविताओं और कहानियों में रुझान रहा। स्कूली दिनों से ही काव्य पाठ प्रतियोगिताओं के लिए अपनी लिखी कविताएं गढ़ती रहीं। आकाशवाणी बाड़मेर में बलजगत कार्यक्रम के लिए वॉइस परीक्षा पास कर बतौर अनाउंसर इन्होंने कक्षा पांचवी पहला वेतन सरकार से लिया था । इसके बाद स्कूल और कॉलेज के दिनों में आकाशवाणी दरभंगा, एवं आकाशवाणी पूर्णिया से आप कविता पाठ कर साहित्य की दुनिया से जुड़ी रहीं।

पिता डॉ. प्रभात झा मैथिली भाषा साहित्य से जुड़े हैं। माता जी सरोज स्मृति हिंदी रंगमंच से जुड़ी थीं और हिंदी-संस्कृत की शिक्षिका थीं । माता जी और अपनी पूज्य दादी की स्मृति में मैं http://www.shatadal.com पर नियमित ब्लॉग लिखती हूँ।

परिचय—
जन्म —1अगस्त
स्थान— पूर्णिया, बिहार
शिक्षा—कंम्प्यूटर एप्लीकेशन से स्नातकोत्तर
सम्प्रति— सूचना एंव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत
प्रकाशन-

1.पोशम्पा, युवा प्रवर्तक, स्टोरी मिरर के डिजिटल प्लेटफार्म पर कविताएँ प्रकाशित।

2.शुभांजली प्रकाशन कानपूर से मुद्रित साझा काव्य सँग्रह “काव्य चेतना” 2019 में कविताएँ प्रकाशित।

3.हिंदी साहित्य (काव्य विधा) को समर्पित गैर सरकारी संस्था ‘नवांकुर साहित्य सभा’ दिल्ली की सातवीं पुस्तक ‘काव्यांकुर 7’ साझा काव्य संग्रह में कविताओं का प्रकाशन, लोकार्पण 2 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर में।

4. कांदीवली मुम्बई से सम्पादित मासिक पत्रिका “सहित्यनामा” में कविताएँ प्रकाशित।

5. त्रैमासिक हिंदी उर्दू की साहित्यिक पत्रिका सुख़नवर के जनवरी-फरवरी 2020 अंक में कविता प्रकाशित।

6. बिभूति भूषण झा द्वारा सम्पादित “इन्नर” नए रचनारों का साहित्य सँग्रह में कविताएँ प्रकाशित। यह पूर्वोत्तर भारत से फरवरी 2020 में छपी ।

पुरस्कार/सम्मान –

1. मुक्तांगन-कविता कोश नव प्रतिभा प्रोत्साहन योजना के पाँचवें चरण में कविता “आम का अचार” के लिए 10 जुलाई 2018 को द्वितीय पुरस्कार प्राप्त।

2.मुम्बई के प्रसिद्ध स्लैम पोएट्री प्लेटफार्म पर द हैबिटैट में जून 2018 में आयोजित एक पोएट्री टूर्नामेंट में इम्प्रोम्पटू कविता “जगरना” के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

3.बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान 2019

4. iblogger टॉप टेन ब्लॉगर प्रतियोगिता 2019 में पाँचवा स्थान।

5. चेतना सांस्कृतिक संस्था , गाडरवारा, मध्यप्रदेश द्वारा काव्य चेतना सम्मान 2019 प्रदान किया गया।

6. हिंदी साहित्य (काव्य विधा) को समर्पित गैर सरकारी संस्था ‘नवांकुर साहित्य सभा’ दिल्ली की सातवीं पुस्तक ‘काव्यांकुर 7’ के लिए आयोजित प्रतियोगिता में तेरहवाँ स्थान।

प्रसारण

1. द हैबिटैट स्टूडियोज़ के ऑफिशियल यू ट्यूब चैनल पर कविता “आम का अचार” का प्रसारण।
https://youtu.be/vTPGbNcglvk

2. https://kukufm.com/channels/pragyas-channel/
चैनल पर “शतदल” कायर्क्रम में हिंदी पॉडकास्ट प्रस्तुति , नया एपिसोड हर बुधवार रात दस बजे।

साक्षात्कार

iblogger साक्षात्कार

ट्रैफिक में चाँद से बात

आज रात ऑफिस से निकली तो चाँद चुप चाप सड़क पर भागती गाड़ियों को जाते देख रहा था , मैं और वो आमने सामने थे आज। मुझे निकलने में देर हुई थी। अपने कक्ष में अकेला बैठा कैसा टाइम पास को कुछ देखता होगा न वो भी । उसके पास मोबाइल भी नहीं है न तो मूंगफली । मेरी गाड़ी ट्रैफिक में रुकती है तो पीछे पीछे मूंगफली वाला भी चलता है। आलोक बताते हैं जिस दिन इत्मीनान में चलते मिलें समझलो बड़ा लम्बा लगने वाला है। तो मैं जीपीएस बन्द कर देती हूँ। मूंगफली खाते चाँद को देखती हूँ।अभिज्ञान जब बाइक पर पापा के साथ जाते हैं उसे बड़ा अचरज होता है कि ये मेरे साथ साथ बोरोवली से बड़ी पीसी के घर मलाड कैसे आ गया। अंशुमन चांद को देख कर गाना गाते हैं – चंदा मामा दूर के पुए पकाये गूड के आप खाएं थाली में अंशु को दें प्याली में। बेटा वो चाँद है , उनसे रश्क न करो , उसे देखो बस, हो कोई बात तो बोल दो वहाँ कोई रहता नहीं तो बात कहीं जाएगी नहीं सब रफा दफा हो जाता है ।
इतने में चाँद ने पूछ दिया की बताओ मैं तेज़ घूम रहा हूँ या ये नीली कर मुझसे तेज़ जा रही है? मैंने तस्वीर दो बार देखी बोली मामू छोड़ो न क्यों पंगा लेते हो आदमी की कार है ज्यादा सटक गयी तो तुम्हारे इधर भी रेड लाइट लगा जाएगा फिर करते रहना इत्मीनान। वो चुप हो गये मुस्कराने लगे बोले घर जल्दी जाया करो । मैं तुम्हे देखता तो हूँ पर मेरे हाथ पैर नहीं होते वो बस तुम्हे मिले हैं । मैं बोली की बस क्या अब आप भी। फिर हँसने लगे चाँद । इतने में घर आ गया और बाकी बातें कल के स्क्रम बोर्ड(srum board) के लिए दर्ज हो गयीं।

आम का अचार

रिश्ते,
रिश्तों में नया, ताज़ा कुछ नहीं होता।
उनमें बोरियत होती है।
एक जैसी सुबह
एक जैसी दोपहर,और शाम होती है।
फिर वही चाय,
फिर छुट्टियों में कहाँ घूमने जाएँ!
रिश्ते दादी माँ के हाथ का अचार हो जाते हैं,
जिनके बारे में सोच कर लगता है कि,
सीढ़ी घर की काठ की अलमारी में,
शीशे के बोइयाम हमेशा सजे रहेंगे।
चाहे कोई देखे न देखे।
कभी आम के टिकोले, कभी लहसुन-मिर्ची
कभी कुच्चों के गुच्छे, हमेशा बने रहेंगे
चाहे कोई सोचे न सोचे।
वो ज़रा से ढक्कन का हटना और
रेलवे के शयन कक्ष तक महक जाना,
हमेशा बना रहेगा
चाहे कोई पूछे न पूछे।
की जैसेे वो आम के अचार,
नवीकरणीय ऊर्जा के स्त्रोत हों,
जिनकी अनवरत आपूर्ति
एक निश्चित समय में हो ही जायेगी।
की जैसे गर्मी तो फिर आएगी ही,
पेड़ों में आम भी आएंगे।
पर कौन जनता था?
एक दिन बोरियत से ज़्यादा,
दूरियों के फांस गड़ जायेंगे।
गर्मी अब भी आती है,
पेड़ों में आम भी आते हैं,
पर धूप !धूप मेरे छठे माले की खिड़की पे,
झांक कर चली जाती है।
की जैसे शिकायत कर रही हो!
“शीशियों की देखभाल की थी तुमने?,
बस खाने की फ़िराक थी तुमको!
कभी सोचा था कितने मुश्किल से बनते थे,
कितना नमक, मिर्च-मसाला,और हाथ के बल लगते थे।
अब नया ताज़ा मिलता है ना!
भर भर कर,कारखानो से !”
मुझे इतना कुछ वाकई पता नहीं था,
पर याद है,आम का अचार कई दिनों में बनता था।
ठहाकों में कटता था, बाल्टी भर,
घर की औरतों के कह कहों से
बीच-बीच में बुलाहट आती थी:
“जा चद्दर पसार,
खाट लगा कर आ!
छोटे वाले छत पर!”
मुंह फुला के उठती थी,
टी. वी.जो बंद करना पड़ता था
अचार की कामगारी पर।
मुझे वो बोरियत अच्छी लगती थी।
अलसायी दोपहर की ताज़ी सांस अच्छी लगती थी।
बिना बात मेरे लिए किसी की फिकर अच्छी लगती थी
अच्छा लगता था मुझे तुम्हारा दौड़कर लिपट लेना।
की जैसे ये अहसास आजीवन विद्यमान रहेंगे
अचल सम्पत्ति बन कर
और समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!
समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!

#प्रज्ञा 05 Oct 2016, 08:07:33

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