ट्रैफिक में चाँद से बात

आज रात ऑफिस से निकली तो चाँद चुप चाप सड़क पर भागती गाड़ियों को जाते देख रहा था , मैं और वो आमने सामने थे आज। मुझे निकलने में देर हुई थी। अपने कक्ष में अकेला बैठा कैसा टाइम पास को कुछ देखता होगा न वो भी । उसके पास मोबाइल भी नहीं है न तो मूंगफली । मेरी गाड़ी ट्रैफिक में रुकती है तो पीछे पीछे मूंगफली वाला भी चलता है। आलोक बताते हैं जिस दिन इत्मीनान में चलते मिलें समझलो बड़ा लम्बा लगने वाला है। तो मैं जीपीएस बन्द कर देती हूँ। मूंगफली खाते चाँद को देखती हूँ।अभिज्ञान जब बाइक पर पापा के साथ जाते हैं उसे बड़ा अचरज होता है कि ये मेरे साथ साथ बोरोवली से बड़ी पीसी के घर मलाड कैसे आ गया। अंशुमन चांद को देख कर गाना गाते हैं – चंदा मामा दूर के पुए पकाये गूड के आप खाएं थाली में अंशु को दें प्याली में। बेटा वो चाँद है , उनसे रश्क न करो , उसे देखो बस, हो कोई बात तो बोल दो वहाँ कोई रहता नहीं तो बात कहीं जाएगी नहीं सब रफा दफा हो जाता है ।
इतने में चाँद ने पूछ दिया की बताओ मैं तेज़ घूम रहा हूँ या ये नीली कर मुझसे तेज़ जा रही है? मैंने तस्वीर दो बार देखी बोली मामू छोड़ो न क्यों पंगा लेते हो आदमी की कार है ज्यादा सटक गयी तो तुम्हारे इधर भी रेड लाइट लगा जाएगा फिर करते रहना इत्मीनान। वो चुप हो गये मुस्कराने लगे बोले घर जल्दी जाया करो । मैं तुम्हे देखता तो हूँ पर मेरे हाथ पैर नहीं होते वो बस तुम्हे मिले हैं । मैं बोली की बस क्या अब आप भी। फिर हँसने लगे चाँद । इतने में घर आ गया और बाकी बातें कल के स्क्रम बोर्ड(srum board) के लिए दर्ज हो गयीं।

आम का अचार

रिश्ते,
रिश्तों में नया, ताज़ा कुछ नहीं होता।
उनमें बोरियत होती है।
एक जैसी सुबह
एक जैसी दोपहर,और शाम होती है।
फिर वही चाय,
फिर छुट्टियों में कहाँ घूमने जाएँ!
रिश्ते दादी माँ के हाथ का अचार हो जाते हैं,
जिनके बारे में सोच कर लगता है कि,
सीढ़ी घर की काठ की अलमारी में,
शीशे के बोइयाम हमेशा सजे रहेंगे।
चाहे कोई देखे न देखे।
कभी आम के टिकोले, कभी लहसुन-मिर्ची
कभी कुच्चों के गुच्छे, हमेशा बने रहेंगे
चाहे कोई सोचे न सोचे।
वो ज़रा से ढक्कन का हटना और
रेलवे के शयन कक्ष तक महक जाना,
हमेशा बना रहेगा
चाहे कोई पूछे न पूछे।
की जैसेे वो आम के अचार,
नवीकरणीय ऊर्जा के स्त्रोत हों,
जिनकी अनवरत आपूर्ति
एक निश्चित समय में हो ही जायेगी।
की जैसे गर्मी तो फिर आएगी ही,
पेड़ों में आम भी आएंगे।
पर कौन जनता था?
एक दिन बोरियत से ज़्यादा,
दूरियों के फांस गड़ जायेंगे।
गर्मी अब भी आती है,
पेड़ों में आम भी आते हैं,
पर धूप !धूप मेरे छठे माले की खिड़की पे,
झांक कर चली जाती है।
की जैसे शिकायत कर रही हो!
“शीशियों की देखभाल की थी तुमने?,
बस खाने की फ़िराक थी तुमको!
कभी सोचा था कितने मुश्किल से बनते थे,
कितना नमक, मिर्च-मसाला,और हाथ के बल लगते थे।
अब नया ताज़ा मिलता है ना!
भर भर कर,कारखानो से !”
मुझे इतना कुछ वाकई पता नहीं था,
पर याद है,आम का अचार कई दिनों में बनता था।
ठहाकों में कटता था, बाल्टी भर,
घर की औरतों के कह कहों से
बीच-बीच में बुलाहट आती थी:
“जा चद्दर पसार,
खाट लगा कर आ!
छोटे वाले छत पर!”
मुंह फुला के उठती थी,
टी. वी.जो बंद करना पड़ता था
अचार की कामगारी पर।
मुझे वो बोरियत अच्छी लगती थी।
अलसायी दोपहर की ताज़ी सांस अच्छी लगती थी।
बिना बात मेरे लिए किसी की फिकर अच्छी लगती थी
अच्छा लगता था मुझे तुम्हारा दौड़कर लिपट लेना।
की जैसे ये अहसास आजीवन विद्यमान रहेंगे
अचल सम्पत्ति बन कर
और समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!
समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!

#प्रज्ञा 05 Oct 2016, 08:07:33

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