शिक्षा का स्तर

कहते हैं , There is no short cut to success.

यह युक्ति हम सभी पर चरितार्थ होती है, चाहे ज़माना ऑफ लाइन पढ़ाई का हो या ऑनलाइन पढ़ाई का। उकताहट में किसी काम को बीच मे छोड़ कर नया काम शुरु कर देने से ऊर्जा का ह्रास होता है। काम को छोटे छोटे लक्ष्य बना कर पूरा करते रहने से हमें हमारे शरीर में एक प्रकार की सिंचित ऊर्जा का आभास होता है।

यही बात पढ़ाई पर भी चरितार्थ होती है। दिमाग की गहराई का कोई नाप नहीं है, इससे जितनी मेहनत ली जाए उतना कम है। आज के समय में सारे आराम के इंतजाम मनुष्य के दिमाग को कुंद करने की ओर अग्रसर करने वाले हैं। जितना आसान जीवन होगा उतनी कम ब्रेन मेपिंग होगी और हम मनुष्य रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी क्षमता खोते जाएंगे।

चाहे कोई भी दौर हो पढ़ाई का स्तर आसान करने की ये दलील की बच्चे को मनोवैज्ञानिक स्तर पर सुदृढ़ कर रहे हैं, आधी मेहनत है। स्कूल में जो बातें आसान बना दी गयीं हैं माता पिता को उसमें ट्रेन नहीं किया जाता है। भारत में हमें आज भी यही लगता है कि व्याकरण , गणित और विज्ञान में रगड़ के आगे कर लें बच्चे को तो ही काम बनेगा। लेकिन स्कूल वैज्ञानिक पद्धति से तैयार किये गए कोर्स जो कि कहने के लिए बच्चों पर कम बोझ डालने वाले हैं के बारे में अभिभावकों की ट्रेनिंग अक्सर नहीं लेते। बहुत कम विद्यालय ऐसा करते हैं। ऐसे में बड़ी खायी उतपन्न हो रही बच्चों और माँ बाप के बीच। खास कर स्कूल के मामलों को लेकर यदि माँ बाप बहुत ज़्यादा पढ़े लिखे न हों तो औऱ दिक्कत हो जाती है इस हद तक की बच्चे सम्मान भी नहीं देते।

यही नहीं शिक्षा पद्धति को आसान बनाने के चक्कर में हम देखते हैं कि बच्चे आज लिखना ही नहीं चाहते, वर्बल में कितना भी चमका लो हैंडराइटिंग की कोई वैल्यू नहीं। परीक्षा सिस्टम विचित्र ही हो गया है कभी है तो कभी है ही नहीं इससे याद करने की लम्बे पेपर लिखने की क्षमता और मानसिक तैयारी का ह्रास हुआ है। छोटी क्लास से इतना आसान बना कर बच्चा बड़ा करेंगे और नौंवीं के बाद अचानक कोर्स का पहाड़ पटक देते हैं बच्चों पर इससे आत्महत्या दर बढ़ रही है। बच्चा मानसिक रूप से बचपन से बड़े कोर्स कंटेंट के लिए तैयार ही नहीं किया गया। ऐसे रुई फाहों जैसे बच्चों से आप किस मेंटल स्ट्रेंथ की उम्मीद कर सकते हैं, ऐसे बच्चे लाइफ में भी प्रॉब्लम सॉल्विंग से भागते हैं और पढ़ाई को इस कदर आसान बनाते जाना इसका ज़िम्मेदार है।

इधर अभिभावक भी कम ज़िम्मेदार नहीं। एकल परिवार में बच्चों को माँ बाप भी इस तरह प्यार करने लगे हैं कि यह उसकी हर बात पूरी की जाती है। कहीं कहीं ज़िद्दी इस तरह बना दिया जाता है कि टीचर के कुछ कहने पर माँ बाप ही टीचर पर टूट पड़ते हैं। सुंदर कांड में तुलसीदास ही बताते हैं कि सचिव, गुरु और बैद्य जो भय आस के कारण प्रिय बोलने कहे तो ऐसे मनुज का ह्रास निश्चित है। यही होने लग रहा है, स्कूल में बच्चों को मनोवैज्ञानिक विकास के नाम पर दो कड़े शब्द नहीं बोले जा सकते । चलिये यह मान लेते हैं कि ठीक भी है क्योंकि हमने ऐसे समाचार भी देखे हैं जहाँ अमानवीय तरीके से पीट कर बच्चों को अधमरा किया गया, या डस्टर से आँख फुट गयी। पर इसका अर्थ यह नहीं होता कि बचपन से बच्चों को ऐसे ही तैयार किया जाए की उनको बस तालियों और बधाई के पोषण की आदत रहे।

चाणक्य नीति में चाणक्य लिखते हैं, अपने बच्चों से 5 वर्ष तक प्रेम करो, 6 वर्ष -12 वर्ष की आयु में डाँट और सख्ती के नियम अपना सकते हैं परंतु 13 वर्ष की आयु के बाद बच्चे को केवल मित्र बना कर पालो। इसमें कुछ वैज्ञानिक सन्देश निहित है इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हमेशा आहे माहे में बच्चा अगर पालेंगे उसको बुराई सुनने की आदत नहीं होगी , हम यह चाहेंगे की टीचर भी उसकी गलतियाँ न उजागर करें तो ऐसा बच्चा बड़ा होकर प्रशंसित होते रहने को अपनी जागीर मानेगा और अपनी बुराई करने वाले को अपना दुश्मन मानेगा। ऐसे में आज कल हम देखते भी हैं, युवा छात्रों द्वारा तैश में आकर शिक्षक की हत्या कर देना या क्षति पहुँचाने का प्रयास करना, सच बताने वाले को नीचा दिखाने की कोशिश करना। यह सब कमज़ोर नस्ल को बढ़ावा देने के लक्षण हैं।

सीधे तौर ओर बात यही है कि कड़ी मेहनत की आदत बचपन से डालनी होगी तभी अपना बच्चा हमारे बाद ऐसे सन्देश लेकर समाज में आगे जाएगा जिसमे मानसिक सुदृढ़ता के साथ जीने की पद्धति होगी, पारिवारिक और समाजिक ज़िम्मेदारी वहन करने का मनोबल होगा। बड़े बड़े प्रोजेक्ट से घबराकर उनको बीच मे छोड़ेंगे नहीं। ऐसे बच्चे एक बेहतर कल बनाएंगे ।

पिता जी ने यह चित्र वाट्सएप्प पर साझा किया आज। हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या।

एक बार की बात है, मेरी मित्र के ग्यारहवीं कक्षा के इकोनॉमिक्स टीचर अंग्रेजी कुछ गड़बड़ बोल जाते थे। लेकिन उनके सम्मान में कोई कमी नहीं थी क्योंकि 2002 में बच्चे थोड़े अधिक संस्कारी हुआ करते थे।

ख़ैर एक दिन कक्षा में पढ़ाते वक़्क्त वे नॉस्टैल्जिक हो गए। उन्होंने जो अंग्रेज़ी में कहा था उसके भावार्थ के साथ मैं यहाँ लिख रहीं हूँ:

“जब मैं तुम्हारी क्लास में था चीज़ें आसान थीं।”

“ये सब मैंने graduation में पढ़ा था। पर देखो समय, आज ये सब तुम 11th में ही पढ़ ले रहे हो।”

औऱ गर्व से कहा :-

“See, level of education has been brought down”

कहने का तातपर्य रहा था की “ऊपर की चीजें अब निचली कक्षा में ही आ गईं।”

लेकिन अर्थ का अनर्थ हो गया था।

प्रीति ने इसकी चर्चा ली, हम कुछ हफ्तों तक याद कर कर हँस लिए।

लेकिन सर ने जो कहा वही चरितार्थ हुआ है।

“Level of education has been brought down”

हुनर ,मेहनत की ज़रूरत इतना भी मत तोड़िये

की दिमाग न्यूरल कनेक्शन बनान भूल जाये ।

रिश्ते

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जहाँ ज़िन्दगी से कुछ न मांगो
वहां टिफ़िन में दही के साथ कोई
याद से चम्मच रखने वाले मिल जाये
तो भी अमीर होने का एहसास होता है।
बोला तो नहीं था पर जैसे मालूम था
की हाथ बढ़ा के चेक करेंगे तो रखा ही होगा।

ऐसे ही होते हैं रिश्ते। अगर पूरा जीवन एक शरीर मान लीजिए तो जीवन में बने सभी रिश्ते शरीर का अंग होते हैं। हर अंग महत्त्व पूर्ण है, सबका अपना कार्य क्षेत्र है, अपनी उम्र है, जितना ध्यान दिया गया उतना स्वस्थ चले।

उनमें से कुछ रिश्ते दिल हो जाते हैं।

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बहिन दाय की बातें-वातें

वो चन्द्रालय, पूर्णियाँ, के छोटे छत की सीढ़ियों के पास खड़ीं हैं । कुछ कह रही हैं। कोई देसी फकड़ा जो ठहाके से खत्म हुआ होगा। ये तस्वीर आशू भैया की शादी के समय की होगी। ये कभी साल दो हज़ार आठ नौ या उससे पहले की बात होगी। अब फ्रेम होकर देख रही हैं ईशा को पुणे की घर गलियों में।

ईलू, प्राची,पीकू, पाउ दी,आशू, रानू, चीनू , गुंजन गुनगुन, शानू की प्यारी दादी माँ, टीटू – चिंकी की नानी माँ, बादलों की ओट में उजला सितारा बन कर चाँदप्रभा होंगी । वो कहती थीं , “गे हम बड़क गाछ छियो, आ तू सब भलेहिं हमर ठाएर “।

प्रेमालय और चन्द्रालय को जोड़ते सुखसिंह मैदान के मध्य मन्दिर के आगे सैकड़ों सालों से खड़ा एक वट वृक्ष है।अब वो उसी पेड़ का तना होंगी। पता कैसे करेंगे , शायद वो घना मज़बूत तना लचीला भी होगा ।

दादी माँ वहाँ वटसावित्री का पवित्र धागा बाँधती थी। मैं और चुन्नी, सुपली में सामान लेकर सबकुछ कौतूहल में ताकते थे , लाट साहब के जैसे गर्मी से उकता कर मैं दादी माँ चलो न, दादी माँ चलो न करती रहती थी, कुछ थोड़ा बहुत आसान सामान पकड़ देती। चट-पट वाला ऊपर-नीचे का काम चुन्नी करती थी। बाद में ईलू होशियार हो गयी।

आज तस्वीरों में कितना कुछ ठहरा सा है,इसमें से कहीं निकल कर जाने का मन भी नहीं करता । एक वीडियो सी चलती है , आगे ये हुआ था पीछे ये हुआ था । मैं दिमाग से निकाल कर पिक्चर बनाने की कोशिश में हूँ।

यह तस्वीर ईशा की वाट्सऐप का डिस्प्ले पिक और कुछ दिन पहले का उसका स्टेटस थी , तब उसने मुझसे पूछा ये , “पिक है क्या तुम्हारे पास” । मैं हल्का मुस्करा गयी ।

ये अब सिर्फ तस्वीर नहीं है।

पापा कहते हैं , “बेटा भगवान के पास सुनवाई की बड़ी फेहरिस्त है, वहाँ तुम्हारा नम्बर पता नहीं कब आएगा। पर तुम लोगों की दादी माँ बस हमारे लिए हैं उनसे कहो और पूछो कोई बात हो जब ऐसी जिसका समाधान न मिलता हो। ”

माँ , पापा के बगल में बैठ कर बातें सुनती रहती हैं चुपचाप सीखते रहने के लिए जैसे सन्त के साथ का आनंद हो, जैसे पार्वती सुनती होंगी शिव को। मुस्कराते हुए फिर घर के काम में वैसे ही लगती हुई जैसे उदाहरण देखे थे।

प्रेम में अतिरेक कुछ भी नहीं। शब्द भी नहीं। निःशब्द भी नहीं।

PC : Isha Mishra