बहिन दाय की बातें-वातें

वो चन्द्रालय, पूर्णियाँ, के छोटे छत की सीढ़ियों के पास खड़ीं हैं । कुछ कह रही हैं। कोई देसी फकड़ा जो ठहाके से खत्म हुआ होगा। ये तस्वीर आशू भैया की शादी के समय की होगी। ये कभी साल दो हज़ार आठ नौ या उससे पहले की बात होगी। अब फ्रेम होकर देख रही हैं ईशा को पुणे की घर गलियों में।

ईलू, प्राची,पीकू, पाउ दी,आशू, रानू, चीनू , गुंजन गुनगुन, शानू की प्यारी दादी माँ, टीटू – चिंकी की नानी माँ, बादलों की ओट में उजला सितारा बन कर चाँदप्रभा होंगी । वो कहती थीं , “गे हम बड़क गाछ छियो, आ तू सब भलेहिं हमर ठाएर “।

प्रेमालय और चन्द्रालय को जोड़ते सुखसिंह मैदान के मध्य मन्दिर के आगे सैकड़ों सालों से खड़ा एक वट वृक्ष है।अब वो उसी पेड़ का तना होंगी। पता कैसे करेंगे , शायद वो घना मज़बूत तना लचीला भी होगा ।

दादी माँ वहाँ वटसावित्री का पवित्र धागा बाँधती थी। मैं और चुन्नी, सुपली में सामान लेकर सबकुछ कौतूहल में ताकते थे , लाट साहब के जैसे गर्मी से उकता कर मैं दादी माँ चलो न, दादी माँ चलो न करती रहती थी, कुछ थोड़ा बहुत आसान सामान पकड़ देती। चट-पट वाला ऊपर-नीचे का काम चुन्नी करती थी। बाद में ईलू होशियार हो गयी।

आज तस्वीरों में कितना कुछ ठहरा सा है,इसमें से कहीं निकल कर जाने का मन भी नहीं करता । एक वीडियो सी चलती है , आगे ये हुआ था पीछे ये हुआ था । मैं दिमाग से निकाल कर पिक्चर बनाने की कोशिश में हूँ।

यह तस्वीर ईशा की वाट्सऐप का डिस्प्ले पिक और कुछ दिन पहले का उसका स्टेटस थी , तब उसने मुझसे पूछा ये , “पिक है क्या तुम्हारे पास” । मैं हल्का मुस्करा गयी ।

ये अब सिर्फ तस्वीर नहीं है।

पापा कहते हैं , “बेटा भगवान के पास सुनवाई की बड़ी फेहरिस्त है, वहाँ तुम्हारा नम्बर पता नहीं कब आएगा। पर तुम लोगों की दादी माँ बस हमारे लिए हैं उनसे कहो और पूछो कोई बात हो जब ऐसी जिसका समाधान न मिलता हो। ”

माँ , पापा के बगल में बैठ कर बातें सुनती रहती हैं चुपचाप सीखते रहने के लिए जैसे सन्त के साथ का आनंद हो, जैसे पार्वती सुनती होंगी शिव को। मुस्कराते हुए फिर घर के काम में वैसे ही लगती हुई जैसे उदाहरण देखे थे।

प्रेम में अतिरेक कुछ भी नहीं। शब्द भी नहीं। निःशब्द भी नहीं।

PC : Isha Mishra

आम का अचार

रिश्ते,
रिश्तों में नया, ताज़ा कुछ नहीं होता।
उनमें बोरियत होती है।
एक जैसी सुबह
एक जैसी दोपहर,और शाम होती है।
फिर वही चाय,
फिर छुट्टियों में कहाँ घूमने जाएँ!
रिश्ते दादी माँ के हाथ का अचार हो जाते हैं,
जिनके बारे में सोच कर लगता है कि,
सीढ़ी घर की काठ की अलमारी में,
शीशे के बोइयाम हमेशा सजे रहेंगे।
चाहे कोई देखे न देखे।
कभी आम के टिकोले, कभी लहसुन-मिर्ची
कभी कुच्चों के गुच्छे, हमेशा बने रहेंगे
चाहे कोई सोचे न सोचे।
वो ज़रा से ढक्कन का हटना और
रेलवे के शयन कक्ष तक महक जाना,
हमेशा बना रहेगा
चाहे कोई पूछे न पूछे।
की जैसेे वो आम के अचार,
नवीकरणीय ऊर्जा के स्त्रोत हों,
जिनकी अनवरत आपूर्ति
एक निश्चित समय में हो ही जायेगी।
की जैसे गर्मी तो फिर आएगी ही,
पेड़ों में आम भी आएंगे।
पर कौन जनता था?
एक दिन बोरियत से ज़्यादा,
दूरियों के फांस गड़ जायेंगे।
गर्मी अब भी आती है,
पेड़ों में आम भी आते हैं,

पर धूप !धूप मेरे छठे माले की खिड़की पे,

झांक कर चली जाती है।
की जैसे शिकायत कर रही हो!
“शीशियों की देखभाल की थी तुमने?,
बस खाने की फ़िराक थी तुमको!
कभी सोचा था कितने मुश्किल से बनते थे,

कितना नमक, मिर्च-मसाला,और हाथ के बल लगते थे।

अब नया ताज़ा मिलता है ना!
भर भर कर,कारखानो से !”
मुझे इतना कुछ वाकई पता नहीं था,
पर याद है,आम का अचार कई दिनों में बनता था।
ठहाकों में कटता था, बाल्टी भर,
घर की औरतों के कह कहों से
बीच-बीच में बुलाहट आती थी:
“जा चद्दर पसार,
खाट लगा कर आ!
छोटे वाले छत पर!”
मुंह फुला के उठती थी,
टी. वी.जो बंद करना पड़ता था
अचार की कामगारी पर।
मुझे वो बोरियत अच्छी लगती थी।
अलसायी दोपहर की ताज़ी सांस अच्छी लगती थी।
बिना बात मेरे लिए किसी की फिकर अच्छी लगती थी

अच्छा लगता था मुझे तुम्हारा दौड़कर लिपट लेना।

की जैसे ये अहसास आजीवन विद्यमान रहेंगे 
अचल सम्पत्ति बन कर
और समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!
समय भूल जायेगा मेरे घर का रास्ता
करीबी रिश्तेदार बनकर!

#प्रज्ञा 05 Oct 2016, 08:07:33

 

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