छोटी सी भेंट – डायरी 2 अक्टूबर

दो अक्टूबर को आशू भैया, निशा भाभी और भतीजी आशी से मिलते हुए नई दिल्ली एयरपोर्ट गए थे। उनका घर रास्ते में था। भैया से खूब प्रशंसा का डोज़ मिला और भाभी से सनेस।

मिलना इतना कम होता है कि आशी को मैंने हर सम्भव याद दिलाये रखने की कोशिश की मैं कौन हूँ और जल्दी आगे मिलना पड़ेगा , बच्चे दूर-दूर बड़े हो रहे , बहुत जल्दी बड़े हो रहे हैं।

आशी की राखी अंशू- मोनू के लिए हर साल आती है। एक समय था जब हम भैया को भेजी गई राखी में पत्राचार और स्वरचित कविताएँ ज़रूर रखते थे।

भाभी जब शादी होकर आयीं तो उन्होंने सब और भी सहेज-सहेज रखा और बहुत उत्साह के साथ चर्चा भी लेती रहीं। पिछले साल से ही यह क्रम टूट गया इसे फिर शुरू करेंगे।

12 ऑक्टोबर 2019

मोबाइल प्रेम

काश की ऐसा होता एक ज़िन्दगी होती तुम्हारी मेरी और मेरे इनबॉक्स में तुम्हारे फिक्र भरे मेसेज की जगह तुम्हारे हाथों से कौर खाना मामूली हर दिन का एक वाक्या होता।

तुम मटर के दाने साथ छुड़ाते खाते भी जाते मैं चट हाथ पर मारती और खाना बनाने से खाने तक का कार्यक्रम दुनिया भर की बातों के साथ होता।

तुम्हारी बातों में जितनी फिक्र मिलती है ठीक वैसे काश जब तब आँख बंद कर के तुम्हारे गले लगने का मौका मिलता।

किताबें साथ पढ़ते कभी कॉफी बनाती कभी तुम चाय बनाते। जिस दिन मन होता क्लासिकस कई फिल्में देखते मैगी साथ खाते।

कभी किसी रोज़ तो तुम ना पसन्द होने पर भी बस मेरे लिए पिज़्ज़ा मंगाते।

तुम मेरे तो हो काश मेरे होते।

मैं तुम्हारी तो हूँ काश तुम्हारी होती।

गलतफहमियों के दौर शायद कुछ कम होते जो हम साथ हरदम होते। हम दम होते।

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