क्षणिका – कबाड़ीवाले

चीर बीनते कबाड़ीवाले
देश की मिट्टी साफ करते हैं!
छांटते हैं पढ़े लिखों का
बेतरतीब फैलाया कचरा
मेटल, टूटी काँच औऱ प्लास्टिक
की पुनरावृत्ति में मदद करते हैं
गंदगी में सराबोर खानाबदोश
ये लोग तिरंगे की इज़्ज़त भी
बहुतों से बेहतर करते हैं!

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मरीचिका

जब आदमी को लगा की वो
दुनिया की सबसे विकसित
उन्नत कोशिकाओं का नमूना बन गया
तब उसने अपने नमूने बनाये

उसने कुछ नई मिसालें बनायीं
जिनको उपलब्धियों का नाम दिया
उपलब्धियों से मुनाफा बढ़ा
मुनाफे से कारोबार
कारोबार के गुरु बाजार में आये
अरबों खरबो की नीयत गिनाये
दो पहिया को चार
चार से दो और
फिर गाड़ी में नल बाथरूम लगाये।

किसीने बहुत उम्दा खाया
जिनको नहीं मिला
उन्होंने काम चलाया
हिस्सेदारी बराबर थी
किसीने कमाया
किसीको लुटाया
विकास हो रहा था
नस्ल कोला पी कर खुश थी।

तुमको इससे क्या!

वो कितने बजे उठती है?
छुट्टी में कितने पकवान बनाती है?
साड़ी पहनती है भी या नहीं?
मंदिर कब कब जाती है?
क्या हनुमान चालीसा जानती है?
टिफिन में क्या देती है?
या बस बस्ते में पैसे रख देती है!

महीने में कितनी बार पार्लर जाती है
खुद के लिए कितने जोड़े खरीदती है
क्या क्या मैचिंग पहनती है
किस ब्रांड के कॉस्मेटिक रखती है
फोन पर किससे बात करती है
किससे चौटिंग करती है
वो ऐसे क्यों हँसती है
वो ऐसे क्यों चलती है!

To be continued…

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में भाग लेते हुए मैंने क्या नया सीखा?

आदरणीय अनिल* जी,

महाराष्ट्र से आकर एक दिन बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में समय व्यतीत करना बहुत सुखद अनुभव रहा।

इस समारोह के लिए पढ़ते और तैयारी करते हुए मुझे भारत सरकार राजभाषा विभाग से जारी “राजभाषा भारती” पत्रिका के बारे में पता लगा। मैंने भारतीय संविधान में राजभाषा के अनुच्छेदों 343 -351 के बारे में थोड़ी और पढ़ाई की , मित्रों से बात करते हुए इस बारे में और जानकारी मिली की राजभाषा के बारे में और क्या-क्या पढ़ सकते हैं।

#सीडैक द्वारा बनाया गया #लीला मोबाइल #ऐप देखा जिसमें #प्रबोध #प्रवीण #प्राज्ञ स्तर पर भारत की चौदह विभिन्न भाषाओं के माध्यम से हिंदी सीखी जा सकती है। यह मोबाइल एप एंड्रॉइड तथा आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है यह जान कर मैंने भी तुरत प्रयोग कर देखा।

मैंने समझा की किस तरह #यूनीकोड क्रांति ने हिंदी की देवनागरी लिपि में लिखने को सहज बना दिया है और तकनीकी तौर पर हिंदी को अनुवाद की भाषा से बाहर निकाल कर हमारे हाथ में डिजिटल अभिव्यक्ति की भाषा भी बना दिया। हिंदी वस्तुतः बरगद का पेड़ है जिसकी शाखाएं सदियों तक जड़ें बनती रहेंगी । हम बनेंगे बीज यथावत जहाँ हैं वहाँ रहते हुए और खूब तरक्की करेगी हिंदी हमारी कोंपलों को हृष्ट पुष्ट करती हुई।

प्रणाम
प्रज्ञा मिश्र

*आदरणीय अनिल सुलभ जी बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष हैं।

रहिमन पानी रखिये

एक एप से थम्ब-नेल बनाते हुए जीवन की अजीब विडंबना पर ध्यान जा रहा है, सभी शृंखलाओं में मुफ़्त तस्वीरें उपलब्ध हैं परन्तु पानी की समस्या से जुड़े सभी तस्वीरों पर शुल्क लगा है, व्यवसाय यही देखता है की मांग कहाँ है। पानी की मांग है। पानी की समस्या पर अंतरष्ट्रीय स्तर या कॉलेजो , स्कूलों के स्तर पर इतने प्रोजेक्ट्स , केस स्टडी की जाती होगी की सभी सैंपल चित्र पर शुल्क है।मुद्दा केवल पानी।
बाकी सब बेमानी।

27 जुलाई 2019- दादा जी महाराष्ट्र आये

दादा जी से मिलना हुआ । मैं बार बार तस्वीर ले रही थी तो कहने लगे:

“ई क्या आदत है तुम लोगों का।”

लेकिन जब नब्बे साल से अधिक का जीवंत समय साथ बैठे हों तो तस्वीर लेना बनता है। बहुत खुशी हुई , दूसरी बार दादा जी मुंबई स्थित हमारे अपार्टमेंट में आये। घर शब्द केवल मुम्बई के लिए कैसे लिख दूँ, आजकल सास भी कुशहर में रह रहीं।

एक मज़ेदार बात यह है कि मेरे दादा जी का नाम रूप नारायण झा और ससुर जी का नाम रूप नारायण मिश्र है । अंतर केवल अंग्रेज़ी की वर्तनी में है। दादा जी Roop लिखते हैं। बाबू जी Rup लिखते हैं। खैर।मैंने विंग की लॉबी में पुणे जाने वाली ओला का इन्तिज़ार करते हुए याद किया की दादा जी 1950 में अपने मामा गाँव गए थे इसलिए वो कहते हैं अगला कौआ जनम नहीं होगा।

1998 के अगस्त की बात है, उनकी बहन से राखी आयी तो मैंने पूछा था , “आपकी भी बहन हैं” , दादा जी गर्व से बोले थे हाँ हैं, फिर मामा गाम की चर्चा हुई थी।
आज पूछने पर बताये अभी उनकी सबसे छोटी बहन हैं, लेकिन राखी शायद वहाँ से अब नहीं आ पाती।

इससे पहले दादा जी 2013 में अभिज्ञान के जन्म के एक साल बाद आये थे। तब उनके आने पर मैंने एक कविता लिखी थी। लिंक देखनी पड़ेगी, शतदल ब्लॉग पर ही है। तब से अब तक में मेरे लिखने और बात रखने में बदलाव आया है। दादा जी से सम्भवत: मुंबई में फिर मिलना होगा। कल उन्होंने मेरी आवाज़ में गाने सुने और कविताएँ सुनी।

मैंने राग यमन में आरोह, अवरोह , पकड़ सुनाने के बाद “तोरी रे बाँसुरिया” बंदिश सुनाई।
उन्होंने कहा “अब ई हमको कैसे पता चलेगा तुम सही गायी की गलत गायी”

फिर बोले कुछ फिल्मी गाने सुनाओ तो आजकल अनिता मैडम की क्लास में मैं और अभिज्ञान किशोर दा का लिखा ‘आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ ‘ सीख रहे , वो सुनाए। फिर दादी माँ की पसंद का मैथिली गीत “जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर ” सुना कर सभा खत्म हुई।

अभी-अभी शाम में भाँजी आराधना ने चुटकी ली , “मामी, सुर लगाने में नाना जी को रात में दूध देना भूल गयीं कल आप ।”
बात इतनी मज़ेदार तरीके से बोली लड़की ने की सोचा उसे डायरी में शामिल कर ही दूँ ।