Meditation experience 20 Sep

बंद पटल पर घास के मैदान देखे, पहाड़ भी दिखे , देवदार के जंगल देखे , प्रकृति ही प्रकृति थी। लगा कि कोशिकाएं इतनी पुरानी हैं कि पेड़ों पहाड़ों से यादें साझा करती हैं। मन तो जैसे सालों पुरानी बहती बूढ़ी नदी के किनारे लगता है जिसके पास जीवन सँवारने के टोटके हैं, जो सदियों से कितने पाषाणों का दंभ केवल गतिमान रहकर तोड़ती आयी है। दूर पर्वत पर ले गया क्षण, वहाँ से छोटी-छोटी नाव देखी, सैलानी दिखे। सारा दृश्य कमरे में बैठे चकित करता गया एक भूरी स्पाइरल सी गुफ़ा बनती गयी, अनुभव करते खुद को बहुत पुराने किसी पर्वत में समाहित होते देखा।

Pragya

I Podcast @KukuFM – Join Shatadal

View this post on Instagram

It takes someone who is innately talented to present a versatile collection of audio shows and podcasts to engage the audience. And Pragya Mishra does the job very well! दर्शकों को बांधे रखने वाले बेमिसाल ऑडियो शोज़ और पॉडकास्ट बनाने के लिए एक बेहद प्रतिभाशाली व्यक्ति की ज़रूरत होती है. और प्रज्ञा मिश्रा इस काम को करने में माहिर हैं! . . #podcast #podcasting #podcasts #radio #podcastinglife #podcastaddict #podcastlove #instagood #audio #music #sound #audios #audiobook #colour #audiobooks #audioporn #audioproduction #audiophile #editingaudios #soundengineer #instagram #headphones #audiomobil #recording #soundengineer

A post shared by Kuku FM (@kuku_fm) on

टीनेज

बंद हो गयी घड़ी हाथ की
जब से देखा तुमको ,
कब आओगे ट्यूशन में तुम
और कब फिर देखूँ तुमको।

कितने तिकड़म मैंने लगाए
फिर सीट बगल में पायी
और तुम थे कि यस सर नो सर
चलता हूँ बाई बाई।

सर ने मुझसे कब क्या पूछा
याद नहीं अब मुझको
तुमने कब कब क्या क्या बोला
रटा हुआ सब मुझको।

चौड़ा माथा, रंग गेहुआँ
गालों का डिम्पल भाया
मुझे नशा सा हुआ तुम्हारा
फुर्सत में तुम्हे बनाया

मोंटेकार्लो की स्वेटर पहने
सपनों में देखा तुमको।
कुछ भी पहनो क्या जचते हो
मैं नींद में रखूँ खुद को।

Pragya Mishra

तुम्हारे लिए

तुमसे बात करने का एहसास
बड़ा वैसा सा होता है
जानते हो कैसा सा होता है
जैसे ताज़ी बिछाई सफेद चादर हो
थकी लेटी लिपट कर तुम्हारे
बालों में उंगलियाँ फिराती सी
दिन भर का कहना सुनना सुनाती सी
बाज़ुओं पे गुदगुदा कर
साथ ज़रा सा हँसी वसी,
घेर कर, इधर सुनो, बोलकर
तुम्हारे सीने में सिमटी सी।

अब कहो! कैसे हो बात ऐसे में,
चलते-फिरते बीच सड़क पर,
सरे आम चेहरा राज़ उगल आए तो?
दुनिया वाले बातें बनायें तो?
कौन सा आओगे मुझे बचाओगे

कर पाओगे ऐलान-ए-मोब्बत कि

“मोहतरमा मेरे खयालों में थीं
इन्हें बख्श दीजिये!
इनके चेहरे से टपकती गुलाबी हया
मेरे घर की रैशनी है
मेरा घर जगमगाने दीजिये ।”

मेरा ब्लॉगिंग सफर

About Blogger

मेरा जन्म 1 अगस्त 1986 को पूर्णियाँ, बिहार के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। पिता जी आकाशवाणी में कार्यरत हैं। परिवार में साहित्यिक वातावरण होने के कारण बचपन से हिंदी कविताओं और कहानियों में रुझान रहा। स्कूली दिनों से ही काव्य पाठ प्रतियोगिताओं के लिए अपनी लिखी कविता पढ़ना अच्छा लगता था। मेरे पिता डॉ. प्रभात झा मैथिली भाषा साहित्य से जुड़े हैं। माता जी स्वर्गीय सरोज स्मृति हिंदी रंगमंच से जुड़ी थीं और हिंदी-संस्कृत की शिक्षिका थीं ।मेरी माँ का अनवरत लिखते रहना मेरे बचपन की बेहतरीन याद है।

कंप्यूटर एप्लिकेशन से स्नातकोत्तर करने के बाद मैं पिछले ग्यारह वर्षों से सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत हूँ। लेखन में रूचि रखती हूँ। मई 2018 से मुंबई के ओपन माइक प्लेटफार्म पर अपनी लिखी कविताओं को साझा करने के साथ हिंदी में अपना योगदान देने की प्रक्रिया में हूँ।

Blog Journey

मेरा ब्लॉगिंग सफर जुलाई 2018 से शुरू हुआ उससे पहले मैं फ़ेसबुक पर और तमाम ऑनलाइन पोर्टल्स पर अपनी कविता भेजती। फिर मित्रों में किसी ने ब्लॉगिंग का सुझाव दिया जिससे रचनाएँ एकत्रित हो सकें और मेरी बात पाठकों तक एक सिरे से जाए।

चूँकि लिखना अब सीधे स्मार्ट फोन पर हो रहा है तो एक प्लेटफार्म पर उसको सहेजने के लिए क्लाउड से बढियाँ रास्ता मुझे ब्लॉग ही लगा। मैं ब्लॉग और अपने जीवन से जुड़े अनुभव लिखती हूँ। कविताएँ लिखती हूँ । केवल लिखने और प्रशंसा के लिए मैं नहीं लिख सकती वो भाव अंदर से आना चाहिए मेरे अंदर उस मैटर को लेकर बेचैनी होनी चाहिए और मेरे आस पास की हर बात उस समय गौण हो जानी चाहिए। ऐसे तैयार होती है एक कविता मेरी। कभी दोपहर। कभी आधी रात ओर सबसे ज्यादा मैं शुक्रगुज़ार हूँ मुंबई के ट्राफिक की। जो मुंबई की घन्टों घन्टों वाली ट्रैफिक न होती तो बेस्ट बस में बैठे मेरे ब्लॉग की गाड़ी न बढ़ी होती।

कहते हैं ये शहर हमसे हमारा सुकूँन ले लेता है लेकिन बदले में देता है नाम, हुनर और कभी न समाप्त होने वाली जिजीविषा। ये एक जारी सफर है। जव तक हूँ शतदल की यात्रा है और बड़े पैमाने पर घूमना है हमें।

About Blog

मेरा ब्लॉग का नाम “शतदल” है। मैं लंबा चौड़ा टेक्निकल नाम नहीं चाहती थी इसलिए प्यारा सा http://www.shatadal.com चयन किया। स्वर्गीय माता जी सरोज स्मृति “शन्नो” के नाम के पर्यायवाची से लिया शतदल।

मेरे ब्लॉग में अधिकांश कविताएँ हैं। कुछ जीवनानुभव से जुड़े लेख। सभी रचनाएं मौलिक हैं। ब्लोगिंग के लिए वर्डप्रेस का प्लेटफ़ॉर्म प्रयोग किया गया क्योंकि इसकी सुविधाएं मुझे टेक्नीकली एडवांस लगतीं हैं। इसका सर्च इंजिन ऑप्टिमाइज़शन चूंकि और प्लेटफ़ॉर्म से बेहतर है तो भविष्य में वेबसाइट का विस्तार करने पर अच्छी पब्लिसिटी भी रहेगी।

मेरे ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य मेरी रचनाओं को सहेजना है। अपने अनुभव लिखते और पब्लिश करते समय मैं ब्लॉग में ज़रूरी टैग डालती हूँ जिससे लोगों को कंटेंट ढूंढने में आसानी हो। ब्लॉग की भाषा हिंदी है। कॉन्टेंट स्त्री विमर्श, अध्यात्म, उत्साह वर्धक, जानकारी इत्यादि के इर्द गिर्द रहता है।