दादी माँ की याद में -12 जनवरी की डायरी

छोटे पापा आज वाट्सप पर लगभग खज़ाना शेयर किए हैं 🌹

ये 2005 की तस्वीर है।हम तब खालसा कॉलेज दिल्ली विश्विद्यालय, केमिस्ट्री ऑनर्स सेकंड ईयर में एडमिशन लेकर घर आये थे। सभी लोग उस समय पूर्णियाँ में जुटे थे, और जैसा की बड़े पापा की हमेशा आदत रही है वो आखिर दिन में ग्रुप फ़ोटो करते हैं। तो हम सब उसी लिए छोटा छत पर इकट्ठा हुए थे। …

हम और इलू सबसे आगे बैठे हैं , पीछे माँ , गुनगुन , गूँजन , दादी माँ , दादा जी , बड़ी मम्मी , छोटी मम्मी, पापा , बड़े पापा, और छोटी मम्मी की फ्रेंड की फैमिली भी हैं साथ में।

ये जगह पूर्णियाँ का छोटा छत है। बगल की नीली खिड़की हॉल में खुल रही है। हॉल में इसी खिड़की के बगल में एक पलंग है। दोपहर को दादी माँ अखबार पढ़ते उसी पर लेटी रहती थीं और बीच बीच में हम और चुन्नी टी वी पर जो देखते थे, उस पर वो अपनी प्रतिक्रिया देतीं थीं ।

हम फुल वॉल्यूम में एक गाना अक्सर सुनते रहते –

यारों सब दुआ करो
मिल के फरियाद करो
दिल जो चला गया है
उसे आबाद करो
यारों तुम मेरा साथ दो ज़रा।

दादी माँ पेपर हटा के हम लोगों का मूँह देखती फिर टी वी देखती , और कहती :

“बतही सब कहाँ के नेहतन”
“तुलसी के की भेलै, स्टार प्लस लगभी ,आब बेर भेलौ ,
हमरा देख के छौ”

मूवी भी साथ देखते थे , सीरियल भी। दादी माँ को ट्विंकल खन्ना ऐश्वर्या से ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती थी।

दादी माँ को भाजपा अटल बिहारी जी की वजह से पसंद आने लगा था वर्ना हम ऐसे खानदानी कांग्रेसी हैं कि सर पर इंदिरा जी, राजीव जी, नेहरू जी तस्वीरें देखने के बाद ग्राइप वाटर पिया है। कांग्रेस पार्टी पूर्णियाँ में मेरे घर के लिए राजनीतिक पार्टियों में नहीं थी आज़ादी का प्रतीक थी।

दादी माँ के चहरे की चमक देखिए ज़रा इस तस्वीर में।
क्या स्त्री थीं वे। कैंसर की पीड़ा से होने वाले दर्द को बनमनखी के बात की दवा के दर्द निवारण से दबाया जाता रहा , दादा जी को भी क्या पता था, सब ठीक ही हो जाता था, पर वे रह रह के कहते दुखी होते रहे थे की हम समय पर समझ न सके।
वो कहती थीं “हम कौआ खा क आयल छी, अखन एतैक हड़बड़ी में नै जैबो”।

छोटे शहर में रहने वाले अच्छे अच्छे युवाओं को कैंसर की पहचान नहीं होती फिर वे तो बुज़ुर्ग थे।

हम दादी माँ का पैर हमेशा दबाते थे, 2006 के बाद जैसे उनका शरीर गलने लगा था, मांसपेशियां ढीली पड़ने लगीं थीं, पैर दबाते दबाते खटकता था की कितना ज़ोर लगाना पड़ता था अब देखो कितनी जल्दी ऐसे कैसे बूढ़ी हो रही है।

हम बोले भी , की दादी माँ तुम न अब बहुत जल्दी बूढ़ी हो रही हो, हमेशा थकी और बीमार रहती हो।
बहुत फीकी सी हँसी में खूब जोश के साथ बोलती रही

“आब नै सकै छियो गे, हमरा आब बुझाय छौ”

फिर 2008 में नौकरी में मशगूलियत के बाद गये थे तो सीढ़ी पर दौड़ के पकड़ के बोलीं की “बड्ड दुर्लभ भ गेल छी गे।

उसके बाद वो आजीवन के लिए दुर्लभ हो गयीं।

दादी माँ मेरे जीवन का केंद्र बिंदु होकर चली गयीं, वो कभी भी जाती असमय ही होता ।

वो अपने समय से बहुत आगे की महिला थी हमको समय समय पर उनके बारे में कुछ कुछ लिखते रहना अच्छा लगता है।

हम ब्लॉग भी तो इसीलिए बनाये की ये जो कुछ से कुछ लिखते रहते हैं वो कहीं समेटा हुआ रह सके।

“अच्छा कर रही हो, लिखती रहो , सहेजती रहो , ब्लॉग में एक जगह सहेजा रहेगा तो एक दिन प्रज्ञा की भी किताब छप जाएगी ।”

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